खाद्य तेल : बीज से बाजार तक शुद्धता का संकट
(डॉ. दीपक गोस्वामी – विभूति फीचर्स)
पीली सरसों से ढके खेत जब धरती पर सुनहरी चादर बिछाते हैं तो भारत की कृषि समृद्धि का अद्भुत दृश्य सामने आता है। लेकिन इसी सुनहरी फसल के पीछे एक कड़वा सवाल भी खड़ा है—जिस देश की मिट्टी सरसों, मूंगफली, सोयाबीन और सूरजमुखी जैसी तिलहन फसलों से समृद्ध है, वही देश खाद्य तेल के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर क्यों है?
भारत में खाद्य तेल की खपत बहुत अधिक है और घरेलू उत्पादन मांग की पूरी पूर्ति नहीं कर पाता। परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाला कोई भी बड़ा बदलाव सीधे भारतीय रसोई और घरेलू बजट को प्रभावित करता है। पाम तेल के सबसे बड़े उत्पादक देशों की जैव ईंधन संबंधी नीतियां हों या वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव, उसका असर भारत के खाद्य तेल बाजार पर दिखाई देता है।
यह केवल व्यापार का विषय नहीं है। खाद्य तेल की उपलब्धता और कीमत का सीधा संबंध किसान, उपभोक्ता और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा से है।
पहला संकट बीज से शुरू होता है
हमारे सामने सबसे पहली चुनौती गुणवत्तापूर्ण बीज और उसकी उत्पादकता की है। कृषि अनुसंधान संस्थानों ने अधिक उत्पादन, रोग प्रतिरोध और सूखा सहनशीलता वाली अनेक उन्नत किस्में विकसित की हैं, लेकिन प्रयोगशाला और खेत के बीच अभी भी बड़ा अंतर दिखाई देता है।
सरसों की कई उन्नत किस्मों में अधिक उत्पादन की क्षमता है, लेकिन देश की वास्तविक औसत उत्पादकता अभी भी उस संभावित क्षमता से काफी नीचे है। इसका अर्थ साफ है—समस्या केवल नई किस्म विकसित करने की नहीं, बल्कि उस किस्म को सही बीज के रूप में किसान तक पहुंचाने और उसकी पूरी कृषि तकनीक को खेत में लागू कराने की भी है।
सोयाबीन में भी यही स्थिति दिखाई देती है। कम अवधि, रोग प्रतिरोध और सूखा सहनशीलता जैसी विशेषताओं वाली किस्में उपलब्ध हैं, लेकिन किसान के खेत में उनका वास्तविक प्रदर्शन कई बार अनुसंधान केंद्रों में प्राप्त परिणामों से काफी अलग होता है।
किसान को केवल किस्म का नाम बता देना पर्याप्त नहीं है। उसे प्रमाणित बीज, सही बुवाई का समय, उचित बीज दर, उर्वरक प्रबंधन, सिंचाई और फसल सुरक्षा की तकनीक भी उपलब्ध करानी होगी।
सूरजमुखी से किसान क्यों दूर हुआ?
सूरजमुखी की कहानी भी महत्वपूर्ण है। उन्नत संकर किस्मों में बेहतर उत्पादन और तेल प्रतिशत की संभावना होने के बावजूद देश में लंबे समय में इसका क्षेत्रफल घटा है।
सवाल सीधा है—किसान उस फसल की ओर क्यों जाएगा, जिसके लिए उसे बाजार, उचित मूल्य और जोखिम से सुरक्षा का भरोसा न हो?
कृषि में किसान केवल उत्पादन क्षमता नहीं देखता। वह लागत, बाजार, मौसम और कीमत का जोखिम भी देखता है। यदि किसी फसल में उत्पादन अच्छा हो सकता है लेकिन उसकी बिक्री सुनिश्चित नहीं है तो किसान दूसरी फसल चुनना अधिक सुरक्षित समझता है।
दूसरा संकट है कीमत का भरोसा
किसान के सामने दूसरी बड़ी चुनौती उसकी उपज की कीमत को लेकर है। सरकार समर्थन मूल्य घोषित करती है, लेकिन यदि प्रभावी खरीद व्यवस्था सीमित रहे तो घोषित मूल्य हमेशा किसान की वास्तविक आय की गारंटी नहीं बन पाता।
फसल आने के समय बाजार में सस्ता आयातित तेल उपलब्ध हो तो घरेलू तिलहन पर दबाव और बढ़ सकता है। किसान की लागत बढ़ती रहती है, लेकिन बाजार मूल्य उसके नियंत्रण में नहीं होता।
इसलिए तिलहन उत्पादन बढ़ाने की किसी भी रणनीति में केवल उत्पादन बढ़ाने की बात पर्याप्त नहीं है। किसान को यह भरोसा भी देना होगा कि उसकी उपज के लिए स्थिर और उचित बाजार उपलब्ध रहेगा।
मौसम का जोखिम भी कम नहीं
सोयाबीन और मूंगफली जैसी फसलें वर्षा की अनिश्चितता से प्रभावित होती हैं। कभी कम बारिश तो कभी अत्यधिक बारिश उत्पादन को प्रभावित कर देती है। दूसरी ओर सूरजमुखी जैसी फसलों में पक्षियों और अन्य जैविक जोखिमों की समस्या भी सामने आ सकती है।
फसल बीमा किसानों को जोखिम से सुरक्षा देने का एक माध्यम है, लेकिन यदि नुकसान के बाद सहायता या बीमा राशि मिलने में लंबा समय लग जाए तो तत्काल आर्थिक संकट का समाधान कठिन हो जाता है।
किसान को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें मौसम और बाजार का पूरा जोखिम अकेले उसके कंधों पर न हो।
आयात नीति में संतुलन जरूरी
खाद्य तेल के मामले में आयात नीति का प्रभाव भी बेहद महत्वपूर्ण है। यदि घरेलू सरसों की आवक के समय आयातित पाम तेल या अन्य खाद्य तेल सस्ता उपलब्ध हो जाए तो घरेलू तिलहन की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
इसलिए खाद्य तेल की आयात नीति को केवल उपभोक्ता को सस्ता तेल उपलब्ध कराने के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। इसमें किसान, उपभोक्ता और देश की दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता, तीनों के हितों के बीच संतुलन जरूरी है।
किसान को बुवाई के समय यह पता होना चाहिए कि फसल आने के आसपास व्यापार नीति और आयात व्यवस्था में किस तरह के बदलाव संभव हैं। बार-बार होने वाले अप्रत्याशित नीतिगत बदलाव किसान के निवेश और फसल चयन के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।
सबसे चिंताजनक है मिलावट का संकट
उत्पादन और आयात की चुनौतियों के बीच खाद्य तेल की शुद्धता का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
एक तरफ किसान खेत में शुद्ध सरसों या अन्य तिलहन पैदा करता है और उसका प्रसंस्करण कर तेल तैयार किया जाता है। दूसरी ओर बाजार में सस्ता उत्पाद उपभोक्ता को आकर्षित करता है। यदि किसी तेल को दूसरे तेल के नाम पर बेचा जाए या पैकेजिंग और लेबलिंग के जरिए ग्राहक को भ्रमित किया जाए तो नुकसान केवल उपभोक्ता का नहीं होता।
इसका सीधा असर शुद्ध तेल तैयार करने वाले किसान और छोटे उत्पादकों पर भी पड़ता है।
शुद्धता की कीमत होती है, लेकिन मिलावट बाजार को कृत्रिम रूप से सस्ता बना देती है। परिणाम यह होता है कि उपभोक्ता को शुद्ध तेल महंगा दिखाई देता है और ईमानदारी से गुणवत्तापूर्ण उत्पादन करने वाले किसान तथा छोटे उत्पादक प्रतिस्पर्धा में कमजोर पड़ जाते हैं।
इसलिए मिलावट को केवल खाद्य अपराध मानना पर्याप्त नहीं है। यह उपभोक्ता के विश्वास और किसान की अर्थव्यवस्था दोनों को प्रभावित करती है।
गांव के पास हो तेल का प्रसंस्करण
समाधान का पहला महत्वपूर्ण रास्ता है—गांव तक प्रमाणित उन्नत बीज की समयबद्ध उपलब्धता।
कृषि विश्वविद्यालय और अनुसंधान संस्थान नई किस्में विकसित करें, लेकिन सफलता का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि प्रमाणित बीज किसान के खेत तक पहुंचे और उसकी उत्पादकता में वास्तविक सुधार दिखाई दे।
दूसरा महत्वपूर्ण कदम है—गांवों के आसपास ही तिलहन का प्रसंस्करण।
किसान केवल बीज बेचने वाला न रहे। यदि स्थानीय स्तर पर तेल निकालने की छोटी और आधुनिक इकाइयां विकसित हों तो किसान को तेल के साथ-साथ खली से भी मूल्य प्राप्त हो सकता है। किसान उत्पादक संगठन और समूह आधारित मॉडल इस दिशा में उपयोगी हो सकते हैं।
इससे परिवहन लागत घट सकती है, स्थानीय रोजगार बढ़ सकता है और कृषि उपज में मूल्यवर्धन का बड़ा हिस्सा ग्रामीण अर्थव्यवस्था में रह सकता है।
कीमत में पारदर्शिता जरूरी
तीसरा कदम है—मूल्य की पारदर्शिता और प्रभावी खरीद व्यवस्था।
केवल समर्थन मूल्य घोषित करना पर्याप्त नहीं है। किसान को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें बाजार मूल्य में असामान्य गिरावट आने पर उसे संरक्षण मिल सके।
जहां बाजार मूल्य समर्थन मूल्य से नीचे चला जाए, वहां मूल्य अंतर की भरपाई जैसी व्यवस्थाओं पर गंभीरता से विचार किया जा सकता है। इससे किसान को बाजार के उतार-चढ़ाव से कुछ सुरक्षा मिल सकती है।
मिलावट के खिलाफ तकनीक बने हथियार
पांचवां और सबसे निर्णायक कदम है—मिलावट के खिलाफ तकनीक आधारित निगरानी।
जिलों में नियमित रूप से खाद्य तेल के नमूने लिए जाएं और आधुनिक परीक्षण सुविधाओं का विस्तार किया जाए। दोषी पाए जाने वाले निर्माताओं और कारोबारियों के खिलाफ कानून के अनुसार प्रभावी कार्रवाई हो।
इसके साथ शुद्ध स्थानीय तेल को डिजिटल पहचान देने की व्यवस्था भी विकसित की जा सकती है। उदाहरण के लिए एक क्यूआर कोड के माध्यम से उपभोक्ता यह जान सके कि तेल किस उत्पादक समूह से आया, किस स्थान पर उसका प्रसंस्करण हुआ, उत्पादन कब हुआ और उसकी गुणवत्ता की जांच किस स्तर पर हुई।
कल्पना कीजिए कि जब आप सरसों के तेल की एक बोतल खरीदें तो उसके लेबल पर केवल ब्रांड का नाम न हो, बल्कि यह भी पता चल सके कि उसमें इस्तेमाल सरसों किस किसान उत्पादक समूह से आई, उसका प्रसंस्करण कहां हुआ और गुणवत्ता परीक्षण कब किया गया।
तब उपभोक्ता केवल तेल नहीं खरीदेगा—वह विश्वास खरीदेगा।
सफलता का पैमाना क्या हो?
सरकार की ओर से खाद्य तेल क्षेत्र में घरेलू उत्पादन बढ़ाने और तिलहन की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न योजनाएं और पहल संचालित की जा रही हैं। लेकिन किसी भी योजना की सफलता का मूल्यांकन केवल स्वीकृत राशि, लगाए गए पौधों या आयोजित कार्यक्रमों की संख्या से नहीं होना चाहिए।
असली सवाल ये होने चाहिए—
क्या किसान की आय बढ़ी?
क्या घरेलू तिलहन उत्पादन बढ़ा?
क्या आयात पर निर्भरता कम हुई?
क्या किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य मिला?
और क्या उपभोक्ता को शुद्ध एवं सुरक्षित खाद्य तेल मिल रहा है?
भारत की खाद्य तेल समस्या का समाधान किसी एक योजना या किसी एक संस्था के पास नहीं है। इसका उत्तर बीज से लेकर खेत, खेत से प्रसंस्करण केंद्र, प्रसंस्करण केंद्र से बाजार और बाजार से उपभोक्ता की रसोई तक पूरी आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाने में छिपा है।
हमें ऐसा भारत बनाना होगा जहां किसान अच्छी गुणवत्ता का बीज बोए, उसे उपज का उचित मूल्य मिले, गांव या उसके आसपास ही प्रसंस्करण की सुविधा उपलब्ध हो, शुद्ध तेल को प्रमाणित बाजार मिले और उपभोक्ता विश्वास के साथ उसे खरीद सके।
क्योंकि खाद्य तेल केवल रसोई की जरूरत नहीं है। यह किसान की आय, उपभोक्ता के स्वास्थ्य, ग्रामीण रोजगार, विदेशी मुद्रा और राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता—इन सभी को जोड़ने वाली आर्थिक कड़ी है।
आज हमारे सामने अवसर भी है और चुनौती भी। यदि हम बीज की गुणवत्ता सुधारें, कृषि अनुसंधान को खेत तक पहुंचाएं, किसान को बाजार और मूल्य का भरोसा दें, स्थानीय प्रसंस्करण को बढ़ावा दें, आयात नीति को अधिक पूर्वानुमेय बनाएं और मिलावट पर प्रभावी कार्रवाई करें, तो भारत खाद्य तेल के क्षेत्र में अपनी आयात निर्भरता को काफी हद तक कम करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
शुद्ध तेल की शुरुआत बाजार की बोतल से नहीं, खेत के बीज से होती है।

