Editorial: संकीर्ण स्वार्थों के लिए मर्यादाएं लांघती राजनीति; परिजनों पर अभद्र टिप्पणियां सभ्य समाज के लिए घातक
(डॉ. सुधाकर आशावादी-विनायक फीचर्स) , नई दिल्ली (16 जून 2026):
सनातन काल से ही एक बेहद प्रसिद्ध और अकाट्य कहावत समाज में प्रचलित है—"बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय।" आज के दौर में यह सूक्ति देश के समकालीन राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य पर पूरी तरह सटीक बैठती है। संकीर्ण और तात्कालिक राजनीतिक स्वार्थों को साधने के लिए जिन तत्वों ने राजनीति को अपनी जागीर या बपौती मान लिया है, उन्होंने कभी भी लोकतांत्रिक और राजनैतिक गरिमा का अनुपालन नहीं किया। इसी का दुष्परिणाम है कि आज समाज को जाति, धर्म और वैमनस्यता के आधार पर विघटित (तोड़ना) करने के अनेक घृणित षड्यंत्र रचे जा रहे हैं।
जब खुद पर आई, तो याद आई मर्यादा
देश के जाने-माने लेखक और विचारक डॉ. सुधाकर आशावादी अपने तीखे विश्लेषण में लिखते हैं कि वर्तमान दौर में सोशल मीडिया और मंचों से फर्जी अफवाहें फैलाकर वर्चस्व की गंदी लड़ाई लड़ी जा रही है। लेकिन, विडंबना देखिए कि फर्जी आरोप-प्रत्यारोप की इसी कीचड़ भरी राजनीति को बढ़ावा देने वाले तत्वों के अपने परिवारों पर जब मनगढ़ंत और शर्मनाक किस्सों की बौछार होने लगी, तो यह स्थिति उनके लिए पूरी तरह असहनीय हो गई।
'राजनीति और जंग में सब कुछ जायज़ है' का कुतर्क देने वाले इन चेहरों को अब अचानक गरिमा, मर्यादा और मानवीय मूल्यों की याद सताने लगी है। सत्य तो यह है कि राजनीति में एक-दूसरे के चरित्र पर कीचड़ उछालने का यह आत्मघाती चलन नया नहीं है। मनगढ़ंत आरोप लगाकर जननेताओं को बदनाम करना कुछ संकीर्ण मानसिकता वाले तत्वों का शगल बन चुका है। ऐसे तत्व सार्वजनिक मंचों से झूठ परोसते हैं, और जब मामला अदालत में मानहानि (Defamation) के मुकदमों तक पहुंचता है, तो वे बड़ी ही आसानी से लिखित रूप में माफी माँगकर अपना पिंड छुड़ा लेते हैं।
भाषा का गिरता स्तर और शर्मनाक टिप्पणियां
इतिहास और वर्तमान गवाह हैं कि राजनीति में शुचिता का स्तर कितनी तेजी से रसातल में गया है:
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निंदनीय बयानबाजी: पूर्व में ऐसे कई शर्मनाक किस्से प्रकाश में आ चुके हैं, जहां किसी राजनेता को किसी प्रतिष्ठित जनप्रतिनिधि के अंतःवस्त्रों का रंग तक बताने में लज्जा महसूस नहीं हुई।
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सवालों के घेरे में तंत्र: कभी किसी चुनी हुई महिला जनप्रतिनिधि की अस्मिता को चोट पहुंचाते हुए 'मंडी का रेट' पूछ लिया जाता है, और हैरान करने वाली बात यह है कि ऐसे घृणित प्रश्नकर्ताओं के विरुद्ध समय पर कोई दंडात्मक कदम नहीं उठाया जाता।
अब यह कुप्रथा और भी विकृत रूप ले चुकी है। दूसरों के लिए अपमानजनक और अभद्र शब्दों का प्रयोग करने वाले नेताओं का जो लोग अंध समर्थन करते हैं, अब अराजक तत्वों ने उनके परिवारों को भी नहीं बख्शा है। परिजनों के विरुद्ध फर्जी अफवाहें और शर्मनाक टिप्पणियां की जा रही हैं, जिसे किसी भी सभ्य समाज में कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता।
राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में परिजनों को घसीटना पूरी तरह अस्वीकार्य
डॉ. सुधाकर आशावादी का स्पष्ट मानना है कि इस प्रकार की अपमानजनक और अमर्यादित टिप्पणियों का केवल सार्वजनिक स्तर पर ही विरोध नहीं होना चाहिए, बल्कि अप्रामाणिक और बिना सबूत के किसी के चरित्र पर कीचड़ उछालने वाले तत्वों के विरुद्ध कठोरतम कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिए।
राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता अपनी जगह है और विचारधाराओं की लड़ाई लोकतंत्र का हिस्सा है, परंतु इस लड़ाई में किसी भी नेता, कार्यकर्ता या आम नागरिक के निर्दोष परिजनों और महिलाओं के विरुद्ध अभद्र टिप्पणियां किसी भी स्तर पर स्वीकार्य नहीं की जा सकतीं।
समय की मांग: दलगत राजनीति से ऊपर उठना जरूरी
आज समय आ गया है कि जब सभी राजनीतिक दल और जागरूक नागरिक दलगत राजनीति, जातिगत संकीर्णता और आपसी मतभेदों से ऊपर उठें। मनगढ़ंत आरोप लगाने वाले, फेक न्यूज फैलाने वाले या किसी भी सभ्य व्यक्ति या परिवार के विरुद्ध सोशल मीडिया पर अफवाहों का बाजार गर्म करने वाले असामाजिक तत्वों के विरुद्ध ऐसी कठोर दंडनीय कार्यवाही की जाए, जो एक नजीर (उदाहरण) बने। जब तक कानून का भय स्थापित नहीं होगा, तब तक कोई भी व्यक्ति किसी की मर्यादा को तार-तार करने का दुस्साहस बंद नहीं करेगा।
