शिक्षा और चिकित्सा: पूरे पन्ने के विज्ञापन और मध्यम वर्ग के 'आधी जिंदगी' के सवाल
(पंकज शर्मा "तरुण" - विभूति फीचर्स) विशेष लेख | 20 अप्रैल 2026: सुबह की पहली किरण के साथ जब अखबार द्वार पर आता है, तो उसकी सुर्खियां कम और पूरे पृष्ठ के रंगीन विज्ञापन ज्यादा ध्यान खींचते हैं। हाल ही में एक नामी कोचिंग संस्थान का विज्ञापन देखा, जिसमें सफल छात्राओं की चमकती तस्वीरें यह तो बता रही थीं कि बेटियां पढ़ाई में आगे हैं, लेकिन पन्ना पलटते ही एक निजी अस्पताल के विज्ञापन ने मन में कई अनुत्तरित प्रश्न खड़े कर दिए। लाखों रुपये खर्च कर छपवाए गए ये विज्ञापन अंततः किसकी जेब से वसूले जाते हैं?
कोचिंग की 'दौड़' और खत्म होता बचपन
कोटा और सीकर जैसे शहरों में पूरे भारत से माता-पिता अपने बच्चों को इस उम्मीद में भेजते हैं कि वे नीट (NEET) या जेईई (JEE) जैसी परीक्षाओं में सफल होंगे। लेकिन विज्ञापनों की इस चकाचौंध के पीछे एक स्याह हकीकत भी है। आए दिन हमें ऐसी खबरें पढ़नी पड़ती हैं कि किसी मासूम ने पढ़ाई के अत्यधिक दबाव में आकर फांसी लगा ली।
एक मध्यमवर्गीय पिता बच्चे को पाल-पोसकर बड़ा करता है, महंगे स्कूलों की फीस भरता है और फिर लाखों रुपये कोचिंग को देता है। जब वह बच्चा दबाव नहीं झेल पाता, तो उस परिवार पर क्या गुजरती होगी? इन कोचिंग संस्थानों को इस मर्माहत स्थिति से कोई फर्क नहीं पड़ता; उनका 'कारोबार' निर्बाध गति से दौड़ता रहता है।
नेपाल का 'जेन जी' आंदोलन: क्या भारत के लिए एक सीख है?
पड़ोसी देश नेपाल में हाल ही में हुए परिवर्तनों ने एक नई उम्मीद जगाई है। वहां के नए प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने सुधारात्मक कदम उठाते हुए निजी शिक्षा संस्थानों को विनियमित करने की दिशा में कड़े फैसले लिए हैं। भारत में भी अब ऐसी मांग उठने लगी है। यदि शिक्षा सरकारी और समान हो, तो बच्चों में समानता का भाव पनपेगा और पालकों से शिक्षा के नाम पर होने वाली 'लूट-खसोट' बंद होगी। इससे न केवल शिक्षा का स्तर सुधरेगा, बल्कि मध्यम और निचले तबके का जीवन स्तर भी ऊपर उठेगा।
चिकित्सा जगत: सेवा या लूट का उद्योग?
आज चिकित्सा क्षेत्र को लालची पूंजीपतियों ने 'मानव सेवा' के बजाय 'उद्योग' बना दिया है। एक आम आदमी इन महंगे अस्पतालों के बारे में सोच भी नहीं सकता, और यदि वह यहाँ पहुँचता है, तो जीवन भर की कमाई इन बिलों की भेंट चढ़ जाती है।
हैरानी की बात यह है कि जनहित के लिए शुरू की गई 'आयुष्मान योजना' में भी भ्रष्टाचार की सेंध लग चुकी है। हाल ही में एक परिचित ने बताया कि उसके पिता के इलाज का वास्तविक खर्च 4 लाख रुपये था, लेकिन अस्पताल ने 5 लाख का फर्जी बिल बनाया और आयुष्मान कार्ड के जरिए सरकारी खजाने को चूना लगाया। बदले में मरीज के परिजनों को भी कुछ पैसे देकर चुप करा दिया गया।
समय है 'दीमक' को खत्म करने का
देशप्रेम और सेवा का चोला पहनकर सरकारी खजाने को बेरहमी से लूटने वाले ये संस्थान उस खतरनाक 'दीमक' की तरह हैं, जो देश की नींव खोखली कर रहे हैं। अब समय आ गया है कि सरकार और समाज मिलकर इस भ्रष्टाचार रूपी दीमक पर 'डीडीटी' छिड़कें। यदि सही समय पर कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो शिक्षा और चिकित्सा जैसे बुनियादी क्षेत्र आम आदमी की पहुँच से पूरी तरह बाहर हो जाएंगे, जिसके परिणाम देशहित में कतई नहीं होंगे।

