शिक्षा ही तय करेगी विकसित भारत का भविष्य, ज्ञान के साथ मानवीय मूल्यों पर भी देना होगा जोर
विवेक रंजन श्रीवास्तव — विभूति फीचर्स
भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। इस लक्ष्य को हासिल करने में शिक्षा की भूमिका निर्णायक होगी। किसी देश की प्रगति केवल आर्थिक समृद्धि, आधुनिक तकनीक, गगनचुंबी इमारतों और चमचमाती सड़कों से नहीं आंकी जा सकती। विकास का वास्तविक पैमाना यह भी है कि वहां के नागरिक कितने विवेकशील, संवेदनशील, आत्मनिर्भर और सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति सजग हैं। इसलिए विकसित भारत के निर्माण के लिए ऐसी शिक्षा व्यवस्था आवश्यक है, जो देश को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के साथ बौद्धिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और नैतिक दृष्टि से भी समृद्ध करे।
शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री हासिल करना नहीं
शिक्षा पर शिक्षाविदों, समाजशास्त्रियों, अर्थशास्त्रियों और राजनेताओं के अलग-अलग विचार हो सकते हैं, लेकिन साहित्यकार का दृष्टिकोण भी इस संदर्भ में विशेष महत्व रखता है। साहित्यकार मनुष्य को केवल आंकड़ों के माध्यम से नहीं देखता, बल्कि उसकी संवेदनाओं, संघर्षों और अंतर्विरोधों को भी समझता है। साहित्य व्यक्ति को दूसरों के दुख-दर्द को महसूस करने, सवाल उठाने और विवेकपूर्ण निर्णय लेने की प्रेरणा देता है। यही कारण है कि विकसित राष्ट्र की शिक्षा प्रणाली में साहित्य और मानवीय मूल्यों का समुचित स्थान होना चाहिए।
एक सशक्त शिक्षा व्यवस्था का अर्थ केवल विद्यालयों और विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ाना या अधिक से अधिक डिग्रियां बांटना नहीं है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य ज्ञान के साथ विवेक, कौशल के साथ चरित्र और व्यक्तिगत सफलता के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास करना है। यदि कोई शिक्षित व्यक्ति अपने ज्ञान का उपयोग भ्रष्टाचार, शोषण या पर्यावरण के विनाश के लिए करता है, तो उसकी शिक्षा अधूरी मानी जाएगी। सच्ची शिक्षा वही है, जो व्यक्ति को अपनी उन्नति के साथ समाज के कल्याण के लिए भी प्रेरित करे।
हर बच्चे को मिले गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अवसर
भारतीय शिक्षा व्यवस्था की प्रमुख चुनौतियों में शैक्षिक अवसरों की असमानता शामिल है। एक ओर आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित विद्यालय हैं, तो दूसरी ओर अनेक शिक्षण संस्थान बुनियादी संसाधनों, पर्याप्त शिक्षकों और आवश्यक सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे हैं। विकसित भारत की परिकल्पना तभी साकार हो सकती है, जब किसी बच्चे की प्रतिभा और भविष्य का निर्धारण उसके परिवार की आर्थिक स्थिति से न हो।
इसके लिए प्रत्येक बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, प्रशिक्षित शिक्षक, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएं और खेलकूद की सुविधाएं उपलब्ध कराना जरूरी है। समानता का अर्थ सभी बच्चों को एक जैसा बनाना नहीं, बल्कि प्रत्येक को अपनी रुचि, क्षमता और प्रतिभा विकसित करने का समान अवसर देना है।
शिक्षा और रोजगार के बीच बने बेहतर तालमेल
शिक्षा और रोजगार के बीच संतुलन स्थापित करना भी समय की आवश्यकता है। लंबे समय तक हमारी परीक्षा प्रणाली अंकों, स्मरण शक्ति और प्रमाणपत्रों पर केंद्रित रही है। इसका परिणाम यह हुआ कि कई विद्यार्थी जानकारी तो अर्जित कर लेते हैं, लेकिन उसे व्यावहारिक जीवन में इस्तेमाल करने में कठिनाई महसूस करते हैं।
शिक्षा में तर्कशक्ति, रचनात्मकता, समस्या समाधान और स्वतंत्र चिंतन को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। विज्ञान, गणित और तकनीक के साथ व्यावसायिक शिक्षा को भी प्रोत्साहित करना जरूरी है। प्रत्येक विद्यार्थी की रुचि और क्षमता अलग होती है। इसलिए विद्यालय स्तर से ही कृषि, हस्तशिल्प, उद्यमिता और तकनीकी कौशल से संबंधित अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए। साथ ही, श्रम के प्रति सम्मान की भावना विकसित करना भी शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए।
हालांकि, शिक्षा को केवल रोजगार प्राप्त करने का साधन बना देना भी उचित नहीं है। मनुष्य केवल आर्थिक इकाई नहीं, बल्कि संवेदनाओं, विचारों और सामाजिक संबंधों से जुड़ा व्यक्तित्व है। साहित्य, इतिहास, दर्शन और कला व्यक्ति को अपनी सभ्यता, संस्कृति और सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ते हैं। विज्ञान हमें शक्ति प्रदान करता है, लेकिन उस शक्ति का उपयोग किस उद्देश्य के लिए किया जाए, इसका निर्धारण विवेक और मानवीय मूल्यों से होता है।
मातृभाषा के साथ अन्य भाषाओं का ज्ञान भी जरूरी
भाषा के प्रश्न पर भी संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। मातृभाषा बच्चे की सहज अभिव्यक्ति और सीखने का स्वाभाविक माध्यम है, जबकि अंग्रेजी सहित अन्य भाषाओं का ज्ञान वैश्विक संवाद, उच्च शिक्षा और रोजगार के अवसरों को व्यापक बनाता है। इसलिए ऐसी बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जिसमें विद्यार्थी अपनी भाषा और साहित्य से जुड़े रहने के साथ दूसरी भाषाओं में भी दक्षता हासिल कर सकें।
अपनी भाषा और साहित्य से जुड़ाव सांस्कृतिक आत्मविश्वास को मजबूत करता है, जबकि दूसरी भाषाओं का ज्ञान व्यक्ति की दृष्टि को व्यापक बनाता है। इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करके ही शिक्षा को अधिक प्रभावी और समावेशी बनाया जा सकता है।
विद्यार्थियों में लोकतांत्रिक चेतना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
एक संतुलित शिक्षा प्रणाली का दायित्व विद्यार्थियों में लोकतांत्रिक चेतना विकसित करना भी है। संविधान, समानता, स्वतंत्रता, न्याय, अधिकारों और कर्तव्यों की जानकारी केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। विद्यालयों में संवाद, वाद-विवाद और सामूहिक निर्णय जैसी गतिविधियों के माध्यम से विद्यार्थियों को असहमति का सम्मान करना सिखाया जाना चाहिए।
प्रश्न पूछने वाले विद्यार्थी को हतोत्साहित करने के बजाय उसकी जिज्ञासा को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। सवाल करने, तर्क करने और प्रमाण के आधार पर निष्कर्ष निकालने की क्षमता ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण को मजबूत बनाती है। इसी तरह नैतिक शिक्षा का प्रभाव तभी दिखाई देगा, जब शिक्षक और शिक्षण संस्थान अपने आचरण से ईमानदारी, अनुशासन, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का उदाहरण प्रस्तुत करेंगे।
पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य, खेलकूद और कला को भी शिक्षा का अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए। इससे विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास होगा और वे जीवन की चुनौतियों का सामना अधिक आत्मविश्वास के साथ कर सकेंगे।
परीक्षा प्रणाली में सुधार समय की मांग
अंकों की अंधी दौड़ विद्यार्थियों में तनाव और असफलता का भय पैदा करती है। किसी बच्चे की संपूर्ण योग्यता का आकलन केवल कुछ घंटों की परीक्षा के आधार पर नहीं किया जा सकता। विद्यार्थियों की समझ, रचनात्मकता, व्यावहारिक क्षमता और समस्या समाधान की योग्यता को भी महत्व मिलना चाहिए।
इसके लिए परियोजना कार्य, प्रयोग, रचनात्मक गतिविधियों, व्यावहारिक कौशल और निरंतर मूल्यांकन को परीक्षा प्रणाली का हिस्सा बनाना जरूरी है। साथ ही, शिक्षकों को पर्याप्त प्रशिक्षण, सम्मान और कार्य करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाले कर्मचारी नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य के निर्माता हैं। उनकी गुणवत्ता और कार्य परिस्थितियों में सुधार के बिना शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव संभव नहीं है।
2047 के भारत के लिए कैसी पीढ़ी तैयार करनी है?
वर्ष 2047 में भारत की स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे होंगे। उस समय तक हम कैसी पीढ़ी तैयार करना चाहते हैं, यह सवाल आज की शिक्षा व्यवस्था के सामने है। क्या हमारा लक्ष्य केवल अधिक वेतन पाने वाले पेशेवर तैयार करना है, या ऐसे जिम्मेदार नागरिक भी बनाना है, जो अपने ज्ञान और कौशल का उपयोग समाज की समस्याओं के समाधान में कर सकें?
विकसित भारत वही होगा, जहां वैज्ञानिक को नवाचार की स्वतंत्रता मिले, किसान समृद्ध हो, श्रमिक के श्रम का सम्मान किया जाए और साहित्यकार की कलम समाज का निर्भीक आत्ममंथन कर सके। ऐसा भारत तभी बनेगा, जब शिक्षा का प्रकाश महानगरों और संपन्न वर्गों तक सीमित न रहे, बल्कि समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े बच्चे तक पहुंचे।
संतुलित शिक्षा प्रणाली का सार यही है कि उसमें ज्ञान हो, लेकिन अहंकार नहीं; कौशल हो, लेकिन संवेदनहीनता नहीं; आधुनिकता हो, लेकिन सांस्कृतिक विरासत से विच्छेद नहीं; और प्रतिस्पर्धा हो, लेकिन सहयोग का अभाव नहीं।
जब शिक्षा ज्ञान को रोजगार से, विज्ञान को विवेक से, आधुनिकता को मानवीयता से और व्यक्तिगत सफलता को सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ सकेगी, तभी विकसित भारत का सपना वास्तविकता में बदल सकेगा।
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