आश्रय नहीं, अपनापन चाहते हैं बुजुर्ग
The elderly don't want shelter, they want belonging
Sun, 10 Aug 2025
(डाॅ. फ़ौज़िया नसीम शाद – विभूति फीचर्स)
भारतीय संस्कृति में बुजुर्ग हमेशा ज्ञान, अनुभव और धैर्य के प्रतीक माने गए हैं। परिवार के लिए उनका स्थान मार्गदर्शक और संबल का रहा है। लेकिन बदलते समय में यह तस्वीर धुंधली होती जा रही है। आधुनिकता और भौतिकवाद की दौड़ ने रिश्तों में वह ऊष्मा कम कर दी है, जो कभी भारतीय परिवारों की पहचान थी। आज व्यक्ति का दृष्टिकोण ‘मैं’ और ‘मेरा’ तक सीमित हो गया है, जिसके कारण वृद्धजन, जो कभी परिवार का केंद्र थे, अब अकेलेपन और उपेक्षा का सामना कर रहे हैं। यह खामोशी, उनके जीवन की सबसे बड़ी चीख बन चुकी है।

पश्चिमी जीवनशैली और व्यक्तिवाद के प्रभाव ने हमारे सामाजिक ढांचे में गहरे बदलाव किए हैं। जहां स्वतंत्रता और निजी जीवन की चाह ने युवाओं को आत्मनिर्भर बनाया है, वहीं रिश्तों की नज़दीकियां भी घटाई हैं। आज के युवा अपने जीवन में किसी भी हस्तक्षेप को पसंद नहीं करते, जिसके परिणामस्वरूप वृद्धावस्था में माता-पिता के साथ मानसिक दूरी और सामाजिक अलगाव बढ़ता जा रहा है।
हिन्दू धर्मशास्त्रों में जीवन को चार आश्रमों में विभाजित किया गया है—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। गृहस्थ आश्रम को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है, जबकि वानप्रस्थ का उद्देश्य सांसारिक मोह से दूर होकर आत्मिक शांति की ओर बढ़ना है। लेकिन आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। बुजुर्ग अब अपने घर-परिवार, बच्चों, बहुओं और पोते-पोतियों के बीच रहना चाहते हैं, न कि वृद्धाश्रमों में।
दुख की बात यह है कि आज कई संतानें केवल आर्थिक सहायता भेजकर अपने दायित्वों से मुक्त मान लेती हैं, जबकि उनके माता-पिता की असली ज़रूरत है – अपनापन, सम्मान और साथ। इस उपेक्षा के पीछे कई कारण हैं – पश्चिमी जीवनशैली का अंधानुकरण, फिल्मों और मीडिया का प्रभाव, समाज में बढ़ती हिंसा और स्वार्थ, जिसने प्रेम, त्याग और सहयोग जैसे मानवीय मूल्यों को कमजोर कर दिया है।
सोचने की बात यह है कि जो युवा आज अपने बुजुर्गों से दूरी बना रहे हैं, क्या वे स्वयं कभी वृद्ध नहीं होंगे? और जब होंगे, तो क्या वे अपने बच्चों की उपेक्षा सह पाएंगे? अगर इसका उत्तर “नहीं” है, तो अब वक्त है सोच बदलने का। बुजुर्गों को केवल आर्थिक मदद नहीं, बल्कि भावनात्मक सहारा और आत्मीय उपस्थिति भी देना उतना ही ज़रूरी है।
अगर हम यह बदलाव ला पाएं, तो न केवल पारिवारिक ढांचा मजबूत होगा, बल्कि जीवन की सांध्य बेला भी गरिमामयी और सार्थक बन सकेगी। यह आवाज़ किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस पूरी पीढ़ी की है, जिसने अपना जीवन अपनों के लिए समर्पित किया, और अब अपने ही घर में परायापन महसूस कर रही है।
हमारा आज का व्यवहार ही कल हमें लौटाया जाएगा। अगर यह विचार युवा पीढ़ी के दिल को छू जाए, तो यही इस लेख का असली उद्देश्य और सफलता होगी।
