चुनाव सुधार: भ्रामक प्रचार पर रोक समय की मांग
डॉ. सुधाकर आशावादी – विनायक फीचर्स) महाराष्ट्र, हरियाणा और बिहार में हुए हालिया चुनावों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि देश का मतदाता अब पूरी तरह जागरूक हो चुका है। जनता अब अव्यावहारिक वादों या अकल्पनीय सुविधाओं के लालच में नहीं आती। मतदाता अपने क्षेत्र की स्थिति, अतीत के अनुभव और सुशासन के आधार पर ही निर्णय लेते हैं, न कि भावनाओं के प्रवाह में।
इतिहास बताता है कि उत्तर प्रदेश और बिहार लंबे समय तक अराजकता व अव्यवस्था से जूझते रहे। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के शासनकाल के दौरान सुरक्षा की स्थिति बेहद खराब थी, जिसके चलते जनता ने परिवर्तन का मार्ग चुनते हुए उन्हें सत्ता से बाहर किया। इसी प्रकार बिहार में राष्ट्रीय जनता दल के शासनकाल में फैले जंगलराज से परेशान जनता ने नीतीश कुमार को सुशासन के लिए अवसर दिया और यह विश्वास कई वर्षों से कायम है।

आज का मतदाता जाति व धर्म की सीमा से ऊपर उठकर सक्रिय भागीदारी कर रहा है। उसने नकारात्मक राजनीति, झूठे व भ्रामक प्रचार और अस्तित्वहीन राजनीतिक दलों की विचारधारा को पूरी तरह नकार दिया है। जनता ने स्पष्ट संदेश दिया है कि लोकतंत्र में मतदाता किसी भी वंशवादी, संकीर्ण सोच वाले या अराजक राजनीति करने वाले दल का बंधक नहीं है।
चुनाव सुधारों की तात्कालिक आवश्यकता
समय, परिस्थितियों और तकनीकी प्रगति के अनुसार चुनाव प्रक्रिया में सुधार होना आवश्यक है। दुर्भाग्य है कि कुछ राजनीतिक दल अपने स्वार्थों के कारण नियमित रूप से चुनाव सुधारों का विरोध करते रहे हैं। बिहार और बंगाल जैसे राज्यों में मतदाता सूचियों को सही करने की प्रक्रिया का विरोध केवल इसलिए किया गया, ताकि फर्जी वोटों का बड़ा नेटवर्क उजागर न हो सके।
अब जब देशभर में विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) की प्रक्रिया चल रही है और पश्चिम बंगाल में अवैध घुसपैठियों को हटाने की कार्रवाई भी जारी है, कई दलों में बेचैनी देखी जा रही है।
जनादेश का दोहरा मूल्यांकन क्यों?
दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत को लोकतंत्र की विजय कहने वाले वही दल, बिहार में सुशासन के पक्ष में दिए गए प्रचंड जनादेश पर सवाल उठा रहे हैं। यह दोहरा रवैया समझ से परे है और जनभावना का अपमान भी।
