खाली कक्षाएं, फर्जी हाजिरी और अव्वल छात्र: शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल

Empty classrooms, fake attendance, and top-ranking students: Serious questions for the education system
 
खाली कक्षाएं, फर्जी हाजिरी और अव्वल छात्र: शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल

लेखक: डॉ. रविशंकर कुमार चौधरी | विनायक फीचर्स

शिक्षा व्यवस्था की सफलता का आकलन आखिर किस आधार पर किया जाना चाहिए—विद्यार्थियों की उपस्थिति, परीक्षा परिणामों या उनके वास्तविक ज्ञान और कौशल से? विद्यालयों और महाविद्यालयों में नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए निर्देश जारी किए जाते हैं, शिक्षकों की जवाबदेही तय करने की बात होती है और अच्छे परीक्षा परिणामों को शैक्षणिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन इन प्रयासों के बीच एक बुनियादी सवाल अक्सर अनदेखा रह जाता है: क्या कक्षाओं में वास्तव में पढ़ाई हो रही है?

खाली कक्षाएं, अनियमित अध्यापन और उपस्थिति संबंधी कथित गड़बड़ियों की शिकायतें केवल प्रशासनिक लापरवाही का विषय नहीं हैं। ये शिक्षा व्यवस्था की कार्यप्रणाली और उसकी प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। यदि विद्यार्थी नियमित रूप से कक्षाओं में नहीं पहुंच रहे, शिक्षण प्रभावित हो रहा है और अभिलेखों में दर्ज उपस्थिति वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाती, तो शैक्षणिक गुणवत्ता का आकलन आखिर किस आधार पर किया जा रहा है?

विडंबना यह है कि शिक्षा की उपलब्धियों को अक्सर नामांकन, उपस्थिति और परीक्षा परिणामों के आंकड़ों से मापा जाता है, जबकि वास्तविक कसौटी यह होनी चाहिए कि विद्यार्थियों ने कितना सीखा, उनकी विषयगत समझ कितनी विकसित हुई और वे अपने ज्ञान का व्यावहारिक उपयोग करने में कितने सक्षम हुए।

उपस्थिति का हिसाब या शिक्षा का हिसाब?

विद्यालयों और महाविद्यालयों में विद्यार्थियों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करना जरूरी है। इससे अनुशासन बना रहता है और शिक्षण प्रक्रिया में निरंतरता आती है। लेकिन जब उपस्थिति दर्ज करना ही एक औपचारिकता बन जाए, तब शिक्षा का मूल उद्देश्य पीछे छूटने लगता है।

यदि किसी कक्षा में विद्यार्थी मौजूद नहीं हैं, लेकिन अभिलेखों में उनकी उपस्थिति दर्ज है, तो यह केवल हाजिरी रजिस्टर की गड़बड़ी नहीं, बल्कि पूरी शैक्षणिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ा सवाल है। ऐसे में संस्थान की प्रगति रिपोर्ट, निरीक्षण व्यवस्था और प्रदर्शन का आकलन भी संदेह के दायरे में आ सकता है।

हालांकि, हर खाली कक्षा को फर्जी उपस्थिति का प्रमाण नहीं माना जा सकता। समय-सारिणी में गड़बड़ी, शिक्षक की अनुपस्थिति, विद्यार्थियों की कम उपस्थिति या प्रशासनिक कारणों से भी पढ़ाई बाधित हो सकती है। लेकिन यदि वास्तविक समस्याओं के बावजूद कागजों पर सब कुछ सामान्य दिखाया जा रहा है, तो यह व्यवस्था की कमियों को छिपाने का माध्यम बन सकता है।

इसलिए जरूरी है कि शिक्षा की समीक्षा केवल दर्ज आंकड़ों के आधार पर नहीं, बल्कि वास्तविक परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच के आधार पर की जाए।

शिक्षक हैं, विद्यार्थी हैं, फिर पढ़ाई कहां है?

शिक्षक किसी भी शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ होते हैं। उनकी जिम्मेदारी केवल संस्थान में उपस्थित रहने या उपस्थिति पंजिका पर हस्ताक्षर करने तक सीमित नहीं है। उनका मूल दायित्व विद्यार्थियों को पढ़ाना, उनकी जिज्ञासाओं का समाधान करना और उन्हें ज्ञान तथा कौशल से संपन्न बनाना है।

इसी प्रकार प्रधानाध्यापक, प्राचार्य और विश्वविद्यालय प्रशासन की जिम्मेदारी भी केवल आदेश जारी करने, बैठकें आयोजित करने और रिपोर्ट भेजने तक सीमित नहीं हो सकती। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि निर्धारित समय-सारिणी के अनुसार कक्षाएं चलें, पाठ्यक्रम समय पर पूरा हो, पुस्तकालय और प्रयोगशालाओं का उपयोग हो तथा विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता का नियमित आकलन किया जाए।

यह भी समझना जरूरी है कि शिक्षकों पर गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ, रिक्त पद, विषय विशेषज्ञों की कमी, अव्यावहारिक समय-सारिणी और अपर्याप्त संसाधन जैसी समस्याएं वास्तविक हैं। इनका समाधान किए बिना केवल शिक्षकों को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन संसाधनों की कमी को पढ़ाई की उपेक्षा का स्थायी बहाना भी नहीं बनाया जा सकता।

सरकार और प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि उनकी प्राथमिकता केवल कागजी अनुपालन है या कक्षाओं में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण सुनिश्चित करना।

महाविद्यालयों में खाली कक्षाओं का सवाल

उच्च शिक्षा की स्थिति पर चर्चा करते समय महाविद्यालयों की शैक्षणिक चुनौतियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बड़ी संख्या में विद्यार्थी स्नातक की डिग्री प्राप्त करने के लिए नामांकन कराते हैं, लेकिन नामांकन के बाद उन्हें नियमित कक्षाएं, पर्याप्त शिक्षक, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएं और उचित अकादमिक वातावरण कितना मिलता है, यह गंभीर समीक्षा का विषय है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में बहुविषयक शिक्षा, आलोचनात्मक चिंतन, कौशल विकास और अनुभव आधारित अध्ययन पर जोर दिया गया है। इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए केवल पाठ्यक्रम में बदलाव पर्याप्त नहीं है। नियमित कक्षाएं, पर्याप्त शिक्षक, अध्ययन सामग्री, अकादमिक संवाद और सतत मूल्यांकन भी आवश्यक हैं।

यदि विद्यार्थी महाविद्यालय में केवल परीक्षा फॉर्म भरने या परीक्षा के दिनों में ही दिखाई देते हैं, तो उच्च शिक्षा का उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है। डिग्री प्राप्त करना शिक्षा का एक महत्वपूर्ण परिणाम हो सकता है, लेकिन डिग्री ही शिक्षा नहीं है।

विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में यह समीक्षा होनी चाहिए कि निर्धारित समय-सारिणी के अनुसार कितनी कक्षाएं संचालित हुईं, कितना पाठ्यक्रम पूरा हुआ, विद्यार्थियों को कितने व्यावहारिक अवसर मिले और उनकी विषयगत समझ में कितना सुधार आया।

अव्वल परिणाम, लेकिन ज्ञान का वास्तविक स्तर क्या है?

परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना विद्यार्थियों, शिक्षकों और अभिभावकों के लिए निश्चित रूप से खुशी की बात है। विद्यार्थियों की मेहनत और उपलब्धियों का सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन अच्छे अंक अपने आप में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का संपूर्ण प्रमाण नहीं हैं।

यह जानना भी जरूरी है कि अच्छे अंक प्राप्त करने वाला विद्यार्थी विषय की अवधारणाओं को कितना समझता है, अपने ज्ञान का व्यावहारिक उपयोग कर सकता है या नहीं और उसमें स्वतंत्र चिंतन, तार्किक विश्लेषण तथा समस्याओं का समाधान खोजने की क्षमता कितनी विकसित हुई है।

इन सवालों का जवाब केवल परीक्षा परिणामों की तालिका से नहीं मिल सकता।

यदि कक्षाओं में पढ़ाई के घंटे कम होते जाएं, शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच संवाद कमजोर पड़ जाए तथा मूल्यांकन केवल परीक्षा उत्तीर्ण कराने की प्रक्रिया बनकर रह जाए, तो अंकों की चमक के बावजूद ज्ञान का आधार कमजोर हो सकता है। इसका असर विद्यार्थियों के उच्च अध्ययन, प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार के अवसरों पर भी पड़ सकता है।

परीक्षा परिणामों में सुधार और शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार के बीच संबंध जरूर है, लेकिन दोनों को एक ही मान लेना उचित नहीं होगा। शिक्षा का वास्तविक मूल्यांकन विद्यार्थियों की समझ, कौशल और सीखने की क्षमता को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

डिजिटल हाजिरी से आगे बढ़कर गुणवत्ता पर ध्यान जरूरी

आज उपस्थिति दर्ज करने और उसकी निगरानी के लिए डिजिटल तकनीक, बायोमेट्रिक प्रणाली, ऑनलाइन समय-सारिणी और डिजिटल निरीक्षण जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं। इनसे पारदर्शिता बढ़ाने और अनियमितताओं पर अंकुश लगाने में मदद मिल सकती है।

लेकिन तकनीक अपने आप गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित नहीं करती। डिजिटल हाजिरी से यह पता चल सकता है कि कोई व्यक्ति निर्धारित समय पर उपस्थित था या नहीं, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि कक्षा में प्रभावी शिक्षण हुआ या विद्यार्थियों ने विषय को सही ढंग से समझा।

यदि पूरा जोर केवल उपस्थिति दर्ज करने पर रहेगा, तो कागजी औपचारिकता की जगह डिजिटल औपचारिकता ले सकती है। इसलिए तकनीक का इस्तेमाल निगरानी के साथ-साथ शैक्षणिक सुधार के लिए भी किया जाना चाहिए।

इसके लिए संस्थानों में नियमित कक्षा संचालन की समीक्षा, आकस्मिक निरीक्षण, विद्यार्थियों से गोपनीय प्रतिक्रिया, पाठ्यक्रम की प्रगति और सीखने के परिणामों का मूल्यांकन जरूरी है। जहां अनियमितता मिले, वहां निष्पक्ष जांच हो। संसाधनों की कमी सामने आए तो आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई जाए और जानबूझकर गलत रिपोर्टिंग साबित होने पर जवाबदेही तय की जाए।

शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए क्या हों प्राथमिक कदम?

शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए सबसे पहले उसकी वास्तविक स्थिति का ईमानदार आकलन जरूरी है। इसके लिए कुछ ठोस कदम उठाए जा सकते हैं।

पहला, नियमित कक्षा संचालन सुनिश्चित किया जाए। प्रत्येक शिक्षण संस्थान में निर्धारित समय-सारिणी के अनुसार कक्षाएं चलें और उनके संचालन का नियमित सत्यापन हो।

दूसरा, शिक्षकों के रिक्त पद भरे जाएं। विषयवार शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ उन्हें अनावश्यक गैर-शैक्षणिक कार्यों से यथासंभव मुक्त रखा जाए, ताकि वे अध्यापन पर अधिक समय दे सकें।

तीसरा, विद्यार्थियों की अनुपस्थिति के कारणों को समझा जाए। आर्थिक कठिनाइयों, परिवहन की समस्या, पारिवारिक जिम्मेदारियों, शिक्षण की गुणवत्ता और संस्थान के वातावरण जैसे पहलुओं की पड़ताल किए बिना केवल दंडात्मक उपाय पर्याप्त नहीं होंगे।

चौथा, उपस्थिति संबंधी गड़बड़ियों की निष्पक्ष जांच हो। फर्जी हाजिरी या गलत रिपोर्टिंग की शिकायतों पर कार्रवाई ठोस प्रमाणों के आधार पर की जाए, न कि केवल संदेह या मनमाने निरीक्षण के आधार पर।

पांचवां, परीक्षा परिणामों के साथ वास्तविक सीखने का आकलन भी हो। विद्यार्थियों की विषयगत समझ, लेखन क्षमता, तार्किक चिंतन, व्यावहारिक ज्ञान और कौशल को महत्व दिया जाए।

छठा, अभिभावकों और स्थानीय समुदाय की भागीदारी बढ़ाई जाए। विद्यार्थियों, शिक्षकों, अभिभावकों और संबंधित अकादमिक समितियों को शैक्षणिक जवाबदेही की प्रक्रिया में प्रभावी भूमिका दी जाए।

सातवां, संस्थानों का मूल्यांकन व्यापक आधार पर हो। यह न देखा जाए कि कितने विद्यार्थी उत्तीर्ण हुए, बल्कि यह भी आकलन किया जाए कि नियमित शिक्षण में कितना सुधार हुआ और विद्यार्थियों को सीखने के कितने अवसर मिले।

शिक्षा को आंकड़ों से निकालकर कक्षा तक लाना होगा

शिक्षा व्यवस्था के सामने चुनौती केवल अधिक विद्यालय खोलने, नामांकन बढ़ाने या अधिक विद्यार्थियों को डिग्री दिलाने की नहीं है। असली चुनौती विद्यालयों और महाविद्यालयों को ज्ञान, कौशल और व्यक्तित्व विकास के वास्तविक केंद्रों में बदलने की है।

ऐसी व्यवस्था की कल्पना कीजिए, जहां शिक्षक समय पर कक्षा में पहुंचे, विद्यार्थी सीखने के उत्साह के साथ आएं, पुस्तकालयों में अध्ययन हो, प्रयोगशालाओं में प्रयोग किए जाएं और परीक्षाएं वास्तविक ज्ञान का मूल्यांकन करें। यह कोई असंभव सपना नहीं है। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक ईमानदारी, पर्याप्त संसाधन और समाज की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।

शिक्षा में सुधार का अर्थ केवल भवनों का निर्माण, नियुक्तियों की घोषणा या परीक्षा परिणामों का प्रचार नहीं है। इन सभी प्रयासों की सार्थकता तभी है, जब उनका लाभ विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता में दिखाई दे।

विद्यार्थियों में प्रतिभा की कमी नहीं है। उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, बेहतर अवसर और ऐसा वातावरण चाहिए, जहां उनकी जिज्ञासा को प्रोत्साहन मिले और उनकी मेहनत का उचित मूल्यांकन हो।

खाली कक्षाएं, फर्जी हाजिरी और केवल अंकों के आधार पर अव्वल होने का दावा—ये तीनों मिलकर शिक्षा की सफलता की कहानी नहीं लिख सकते। यदि कक्षा में पढ़ाई नहीं हो रही, तो उपस्थिति के आंकड़े कितने भी प्रभावशाली क्यों न हों, शिक्षा का उद्देश्य अधूरा ही रहेगा।

आखिरकार, राज्यों को यह तय करना होगा कि उनका लक्ष्य केवल परीक्षा में उत्तीर्ण विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाना है या ज्ञानवान, कुशल, विवेकशील और आत्मनिर्भर नागरिक तैयार करना। इसी अंतर से शिक्षा व्यवस्था के भविष्य की दिशा तय होगी।

शिक्षा का असली प्रमाण हाजिरी रजिस्टर में दर्ज संख्या नहीं, बल्कि विद्यार्थी के भीतर विकसित हुआ ज्ञान है। जब तक यह सोच नीतियों, प्रशासन और शैक्षणिक संस्थानों की कार्यसंस्कृति का हिस्सा नहीं बनती, तब तक सुधार के दावे कागजों पर चमकते रहेंगे और कक्षाओं में शिक्षा अपनी जगह तलाशती रहेगी।

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