राजनीति में स्थाई निष्ठा: क्या यह केवल एक मिथक है? 'आया राम-गया राम' की संस्कृति और बदलता लोकतांत्रिक स्वरूप
सम्मान का अभाव या वैचारिक तानाशाही?
हाल ही में आम आदमी पार्टी (AAP) के सात बड़े नेताओं का भाजपा में शामिल होना राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। दलबदल के असली कारण तो संबंधित नेता ही स्पष्ट कर सकते हैं, लेकिन राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे दो मुख्य कारण होते हैं:
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सम्मान की कमी: जब किसी प्रभावशाली व्यक्तित्व को दल के भीतर उचित सम्मान या स्थान नहीं मिलता।
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वैचारिक दंभ: किसी नेतृत्व की तानाशाही या अहंकारी व्यवहार से त्रस्त होकर व्यक्ति विकल्प तलाशता है।
'आप' का इतिहास देखें तो भ्रष्टाचार मुक्त शासन और आडंबरहीन राजनीति का दावा करने वाली यह टीम समय के साथ सुख-सुविधाओं और सत्ता के मोह में फंसी नजर आई। यही कारण रहा कि समय-समय पर इसके कई संस्थापक सदस्य पार्टी से अलग होते गए।
राजनीतिक हमाम में सब एक समान
यह एक कड़वा सच है कि अवसरवादिता और स्वार्थपरक सोच आज के राजनीतिक चरित्र का हिस्सा बन चुकी है। चाहे भाजपा हो या कांग्रेस, आम आदमी पार्टी हो या क्षेत्रीय दल—राजनीतिक शुद्धता का दावा कोई भी करे, लेकिन हकीकत में सबकी स्थिति कमोबेश एक जैसी ही है।
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मोहभंग की अनिश्चितता: किसी नेता का अपने दल से कब मोहभंग हो जाए, यह परिस्थितियों और व्यक्तिगत हितों पर निर्भर करता है।
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संविधान बनाम दलबदल: हालांकि संविधान में दलबदल रोकने के कड़े प्रावधान हैं, फिर भी लूपहोल्स का फायदा उठाकर दलबदल का सिलसिला जारी रहता है। जनता के लिए यह निर्णय लेना कठिन हो जाता है कि वह किसे 'विश्वासघाती' माने और किसे 'राष्ट्रभक्त'।
समर्पित कार्यकर्ता बनाम दलबदलू 'दिग्गज'
लोकतंत्र का एक विडंबनापूर्ण पक्ष यह भी है कि दलबदल करने वाले प्रभावशाली व्यक्तियों के अक्सर 'दोनों हाथों में लड्डू' होते हैं। ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जहां कई दलों की परिक्रमा करने वाले नेताओं को मुख्यमंत्री जैसे उच्च पदों से नवाजा गया। दूसरी ओर, पार्टी के लिए वर्षों तक पसीना बहाने वाले समर्पित कार्यकर्ता केवल जनसभाओं में दरियां और कुर्सियां बिछाने तक ही सीमित रह जाते हैं।

