पर्यावरण संरक्षण: केवल प्रकृति नहीं, समूचे जीव जगत की रक्षा का मार्ग

Environmental protection: A way to protect not just nature, but the entire living world
 
पर्यावरण संरक्षण: केवल प्रकृति नहीं, समूचे जीव जगत की रक्षा का मार्ग

(निखिलेश महेश्वरी – विनायक फीचर्स)

आज दुनिया जिन मुद्दों पर सबसे अधिक चिंतित है, उनमें पर्यावरण संरक्षण सर्वोपरि है। लेकिन मूल प्रश्न यह है—प्रकृति को बचाना किससे है और संकट पैदा किसने किया? धरती के सभी जीव-जंतु प्रकृति के नियमों के अनुसार चलते हैं, केवल मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसने लालच, असीम इच्छाओं और अतिउपभोग के कारण प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन किया। परिणामस्वरूप वायु, जल, ध्वनि, मिट्टी और जंगल—सभी प्रदूषण की चपेट में आ गए और समूचा जैव संसार खतरे में पड़ गया।

u8909

समाधान कहाँ है?

इस प्रश्न का उत्तर भारत की प्राचीन पर्यावरण-दृष्टि में मिलता है। भारतीय संस्कृति प्रकृति को “माता” मानकर उसके साथ सौहार्द्रपूर्ण जीवन का मार्ग दिखाती है। यदि मनुष्य अपनी जीवनशैली को प्रकृति-सम्मत बनाए, आवश्यकताओं को सीमित करे और उपभोग पर संयम अपनाए, तभी पर्यावरण संतुलन संभव है। क्योंकि प्रकृति बचेगी तभी पृथ्वी बचेगी और पृथ्वी बचेगी तभी मानवता सुरक्षित होगी।

पश्चिमी विकास मॉडल ने बढ़ाया संकट

आज जो वैश्विक संकट दिख रहा है, उसके मूल में पश्चिम का उपभोग आधारित विकास मॉडल है, जहाँ नदियाँ, पर्वत, जंगल और पशु—सभी को केवल उपयोग की वस्तु समझा गया। यही कारण है कि दुनिया के जी-7 देश पृथ्वी के लगभग 80% संसाधनों का इस्तेमाल करते हैं, जबकि प्रदूषण का दोष विकासशील देशों पर डालते हैं। जब तक विकसित देश अपनी जीवनशैली में संतुलन नहीं अपनाएँगे, तब तक पर्यावरणीय समस्याएँ खत्म नहीं होंगी।

रासायनिक खेती और जंगलों का क्षरण

रासायनिक उर्वरकों ने मिट्टी की उर्वरता को गहराई से नुकसान पहुँचाया है। कई वर्षों तक रासायनिक खेती करने से मिट्टी के पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं, और हमारे भोजन में पौष्टिकता घट जाती है। दूसरी ओर प्राकृतिक जंगलों का तेजी से समाप्त होना भी चिंता का बड़ा विषय है। कृत्रिम वृक्षारोपण आंकड़ों को भले सुधार दे, लेकिन जैव विविधता के स्तर पर नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती।

उपभोगवाद ने पशु-प्रजातियों को संकट में डाला

आज विलासिता और सजावट के नाम पर असंख्य पशु नष्ट किए जा रहे हैं। चमड़ा, हाथीदांत, तेल और हड्डियों से बनने वाले उत्पादों के कारण अनेक प्रजातियाँ विलुप्ति की कगार पर हैं। यह आधुनिक उपभोगवादी मानसिकता का वास्तविक परिणाम है।

भारतीय संस्कृति: हर जीव के अस्तित्व का सम्मान

भारतीय दर्शन जीव-जगत को पृथ्वी के संतुलन का अनिवार्य हिस्सा मानता है। यहाँ पेड़ों, नदियों, पर्वतों, यहाँ तक कि साँपों तक की पूजा की परंपरा रही है। नागपंचमी से लेकर पंचवटी तक—हर उदाहरण बताता है कि हर जीव प्रकृति के ताने-बाने में महत्वपूर्ण है। जनमेजय के सर्प-यज्ञ को रोकने वाले आस्तिक मुनि का संदेश भी था कि किसी भी प्रजाति का विनाश समूचे पर्यावरणीय संतुलन को बिगाड़ देता है।

गाँव-आधारित विकास—गांधीजी की दृष्टि

महात्मा गांधी हमेशा कहते थे कि विकास का असली आधार गाँव होना चाहिए। पश्चिमी मॉडल ने शहरों को तो चमका दिया, पर गाँव, किसान और वनवासी पिछड़ते चले गए। इससे समाज और पर्यावरण — दोनों का संतुलन टूट गया। सच तो यह है कि पर्यावरण संकट गरीबों के कारण नहीं, बल्कि धनी समाज की विलासिता के कारण बढ़ा है। भारतीय परंपरा “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः”—अर्थात् संयमयुक्त उपभोग—का संदेश देती है। यहाँ मनुष्य को प्रकृति का स्वामी नहीं बल्कि संरक्षक माना गया है।

प्रकृति को लौटाना ही जीवन का धर्म

भारतीय दर्शन कहता है—“जीवन में जितना लो, उससे अधिक लौटाओ।”
भगवद्गीता की एक प्रार्थना इस भाव को स्पष्ट करती है

“जीवने यावदादानं स्यात्, प्रदानं ततोऽधिकम्।”
अर्थात् जीवन में हम जितना प्राप्त करें, उससे अधिक देने का संकल्प रखें।

यदि मनुष्य यह दृष्टि अपनाए तो पृथ्वी आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रह सकती है।

छोटे कदम, बड़ा प्रभाव

1. पानी बचाना

पीने योग्य जल सीमित है। गांधीजी का प्रयागराज वाला प्रसंग हमें सिखाता है कि एक लोटा पानी भी अनमोल है। उन्होंने कहा था—“जरूरत से अधिक जल लेना किसी और का हिस्सा छीनना है।”

2. प्लास्टिक का विकल्प अपनाएँ

पॉलिथीन आज कचरा प्रबंधन की सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है। इसका समाधान है—

  • पुनर्चक्रण

  • प्लास्टिक का कम उपयोग

  • जैविक विकल्पों को बढ़ावा

3. वृक्षारोपण और जैविक कृषि

भारतीय परंपरा हमेशा वृक्षों के समूह-रूप—पंचवटी, त्रिवेणी—के निर्माण पर ज़ोर देती थी, ताकि पक्षियों और जीव-जंतुओं को वर्ष भर भोजन और आश्रय मिल सके। इस प्रकार वृक्षारोपण केवल पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि सभी जीवों के कल्याण का माध्यम रहा है।

भारतीय मॉडल: समग्र विकास की दिशा

भारत का चिंतन समग्रता पर आधारित है। आज आवश्यकता है कि हम ऐसा विकास मॉडल प्रस्तुत करें जिसमें—

  • पर्यावरण,

  • समाज,

  • और अर्थव्यवस्था

तीनों का संतुलन हो।

यदि हम अपनी प्रकृति-सम्मत परंपराओं को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर आगे बढ़ें, तो निश्चित ही एक सुरक्षित, स्वस्थ और पर्यावरण-अनुकूल भविष्य का निर्माण कर सकते हैं।

Tags