युग प्रवर्तक आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
(इंजी. अरुण कुमार जैन – विभूति फीचर्स) आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का व्यक्तित्व केवल जैन समाज तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने सम्पूर्ण राष्ट्र और मानवता को अपने जीवन से दिशा दी। उनका प्रभाव शिक्षा, संस्कृति, सेवा, करुणा और आध्यात्मिक चेतना के हर क्षेत्र में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
नई शिक्षा नीति 2020 के निर्माण के समय एक महत्वपूर्ण प्रसंग सामने आया। नीति प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. के. कस्तूरीरंगन से तत्कालीन राष्ट्रपति महामहिम रामनाथ कोविंद जी ने कहा कि वे इस विषय में मार्गदर्शन हेतु दिगंबर जैन आचार्य श्री विद्यासागर जी से अवश्य मिलें। प्रारंभ में डॉ. कस्तूरीरंगन को यह आश्चर्यजनक लगा कि जिनकी औपचारिक लौकिक शिक्षा सीमित रही हो, वे राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर क्या मार्गदर्शन दे पाएंगे। किंतु राष्ट्रपति की प्रेरणा पर वे अपनी पूरी टीम के साथ आचार्य श्री के पास पहुँचे। दर्शन और संवाद के बाद डॉ. कस्तूरीरंगन ने स्वयं स्वीकार किया कि उनके सभी संशय दूर हो गए और नई शिक्षा नीति के निर्माण में उन्हें सर्वश्रेष्ठ दिशा आचार्य श्री से ही प्राप्त हुई।
आचार्य श्री के प्रभाव का यह पहला उदाहरण नहीं था। वर्ष 2016 में भोपाल में चातुर्मास के दौरान देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी शासकीय यात्रा पर भोपाल आए। आचार्य श्री के वहाँ विराजमान होने का पता चलते ही वे स्वयं उनके दर्शन और मार्गदर्शन हेतु पहुँचे। यही नहीं, वर्ष 2024 में छत्तीसगढ़ के चंद्रगिरि प्रवास के समय भी प्रधानमंत्री प्रातःकाल उनके सान्निध्य और आशीर्वाद के लिए पहुँचे।

18 फरवरी 2024 को दिल्ली के भारत मंडपम में भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक चल रही थी। देशभर से पाँच हजार से अधिक गणमान्य जन उपस्थित थे। उसी दिन प्रातः आचार्य श्री के देवलोक गमन का समाचार आया। कार्यक्रम की शुरुआत ही अश्रुपूरित श्रद्धांजलि से हुई, जिसे संपूर्ण देश और विश्व ने देखा। यह दृश्य उनके विराट व्यक्तित्व का मौन प्रमाण था।
राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, विद्वान, उद्योगपति, साधक—सब उनके दर्शन को आतुर रहते थे। उनके सान्निध्य में पहुँचकर लोग शांति, आनंद और आत्मिक तृप्ति का अनुभव करते थे। जैसे सूर्य का सान्निध्य ऊष्मा देता है और चंद्रमा शीतलता, वैसे ही आचार्य श्री के दर्शन मात्र से मन को शांति प्राप्त होती थी।
1946 में शरद पूर्णिमा के दिन कर्नाटक के सदलगा ग्राम में जन्मे आचार्य श्री का बचपन का नाम विद्याधर था। बाल्यकाल से ही उनमें राष्ट्रप्रेम, सदाचार और धर्म के प्रति गहरी आस्था थी। संसार में रहते हुए भी वे भीतर से पूर्णतः विरक्त थे।
जून 1968 की भीषण गर्मी में अजमेर में उन्हें गुरु आचार्य श्री ज्ञानसागर जी से दिगंबर मुनि दीक्षा प्राप्त हुई। युवावस्था में ही वैराग्य, तप और साधना उनका जीवन बन चुके थे। गुरु आज्ञा उनके लिए सर्वोपरि थी। एक बार ब्रह्मचारी अवस्था में बिच्छू के डंक के बावजूद उन्होंने पूरी रात मंत्र जाप कर वेदना सहन की और किसी उपचार को स्वीकार नहीं किया।
दीक्षा के बाद उन्होंने अपने वृद्ध गुरु की, जो गठिया रोग से पीड़ित थे, पूर्ण निष्ठा से सेवा की। राजस्थान की भीषण गर्मी में भी वे बंद कक्ष में गुरु के साथ रात्रि बिताते रहे। अंततः गुरु ने सल्लेखना लेकर आचार्य पद उन्हें सौंपा और स्वयं उनके शिष्य बन गए।
1972 से आचार्य पद पर आसीन होकर उन्होंने 52 वर्षों तक त्याग, तपस्या, साधना और जनकल्याण के ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किए, जिन पर अनेक ग्रंथ लिखे जा सकते हैं। उनके आहार में न नमक था, न शक्कर, न फल-सब्ज़ी, फिर भी उनकी काया स्वर्ण-सी तेजस्वी थी। वे नंगे पाँव चलते, चटाई तक का उपयोग नहीं करते और दिन में केवल एक बार खड़े होकर आहार ग्रहण करते थे—यह अपरिग्रह और इंद्रिय विजय की पराकाष्ठा थी।
उन्होंने कभी स्थायी आश्रम या निजी तीर्थ नहीं बनाए। जहाँ उनके चरण पड़े, वही भूमि तीर्थ बन गई। अनेक उपेक्षित और अज्ञात तीर्थ उनके सान्निध्य से विश्व पटल पर प्रतिष्ठित हुए—कुंडलपुर, मड़िया जी, रामटेक, मुक्तगिरि, नैणागिरी, सागर, बीना बार, अमरकंटक, नेमावर, चंद्रगिरि जैसे स्थान इसका उदाहरण हैं।
गोवंश के प्रति उनकी करुणा से देशभर में 150 से अधिक गौशालाएँ संचालित हो रही हैं। ‘दयोदय’ प्रकल्प ने सूखा-पीड़ित क्षेत्रों में लाखों पशुओं को नया जीवन दिया। ‘श्रमदान’ और ‘चलचरखा’ जैसे अभियानों से आदिवासी परिवारों को नशामुक्ति और स्वावलंबन मिला। जेलों में बंद कैदियों ने हथकरघा सीखकर नया जीवन पाया।
उनके सान्निध्य से पाँच सौ से अधिक युवाओं ने सांसारिक वैभव छोड़कर दीक्षा ली और संत बने। बेटियों की शिक्षा के लिए प्रतिभास्थली जैसे संस्थानों ने कम लागत में श्रेष्ठ संस्कारयुक्त शिक्षा का मार्ग खोला। भाग्योदय और पूर्णायु अस्पतालों के माध्यम से सस्ती और सुलभ चिकित्सा जन-जन तक पहुँची।
उनकी लेखनी से ‘मूकमाटी’, ‘नर्मदा का नरम कंकर’, ‘तोता रोता क्यों’, सैकड़ों हाइकू जैसे अद्भुत साहित्यिक ग्रंथ निकले, जो भारतीय साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। “इंडिया नहीं, भारत बोलो” और हिंदी के गौरव का संदेश भी उन्हीं का उद्घोष था।
आज जब संसार हिंसा, स्वार्थ और दिखावे से ग्रस्त है, आचार्य श्री का जीवन हमें अपरिग्रह, सेवा, करुणा और साधना का मार्ग दिखाता है। यदि मानवता उनके पथ को अपनाए, तो विश्व प्रेम, शांति और समृद्धि का तीर्थ बन सकता है।
तप, त्याग, साधना और करुणा के सजीव प्रतीक, युग प्रवर्तक परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के चरणों में संपूर्ण सृष्टि का कोटि-कोटि नमन।
