आधुनिक युग की अनिवार्य आवश्यकता : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कुटुम्ब प्रबोधन

An Essential Necessity of the Modern Era: The Rashtriya Swayamsevak Sangh's Family Enlightenment Initiative
 
आधुनिक युग की अनिवार्य आवश्यकता : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कुटुम्ब प्रबोधन

(पवन वर्मा - विनायक फीचर्स)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना से ही उसका मूल उद्देश्य व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण रहा है। संघ का स्पष्ट मत है कि राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमाओं का नाम नहीं, बल्कि वहां रहने वाले समाज की जीवंत चेतना का प्रतीक है। इस समाज की सबसे छोटी, संवेदनशील और महत्वपूर्ण इकाई परिवार है। वर्तमान समय में संघ के पंच परिवर्तन आयामों में सम्मिलित कुटुम्ब प्रबोधन केवल एक सामाजिक अभियान नहीं, बल्कि विघटित होते पारिवारिक और सांस्कृतिक ढांचे को पुनः सुदृढ़ करने का प्रयास है।

आज का युग सूचना क्रांति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), तीव्र शहरीकरण और उपभोक्तावादी प्रतिस्पर्धा का युग है। मनुष्य तकनीकी रूप से जितना समृद्ध हुआ है, उतना ही भीतर से अकेला, तनावग्रस्त और संवेदनहीन भी होता जा रहा है। भौतिक प्रगति के बावजूद परिवारों में संवाद का अभाव, पीढ़ियों के बीच दूरी और मानसिक असंतुलन जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे समय में संघ का कुटुम्ब प्रबोधन विचार भारतीय जीवन मूल्यों की पुनर्स्थापना का एक सशक्त माध्यम बनकर सामने आता है।

यदि वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों का सूक्ष्म अध्ययन करें, तो स्पष्ट होता है कि भारतीय पारंपरिक पारिवारिक व्यवस्था अनेक चुनौतियों से घिरी हुई है। पाश्चात्य व्यक्तिवादी संस्कृति के प्रभाव ने संयुक्त परिवार व्यवस्था को कमजोर किया है। एकल परिवारों के बढ़ते चलन ने बच्चों को दादा-दादी और नाना-नानी के उस सान्निध्य से दूर कर दिया है, जहां कभी कहानियों और अनुभवों के माध्यम से जीवन मूल्यों का सहज संस्कार होता था।

इसके साथ ही डिजिटल माध्यमों का अत्यधिक प्रभाव भी गंभीर चिंता का विषय है। आज घरों में हर व्यक्ति अपने मोबाइल या स्क्रीन की दुनिया में खोया दिखाई देता है। एक ही घर में रहते हुए भी लोग एक-दूसरे के मनोभावों, समस्याओं और संवेदनाओं से कटते जा रहे हैं। संवादहीनता के कारण युवाओं में अवसाद, आत्महत्या की प्रवृत्ति, नशाखोरी और वैवाहिक विघटन जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। इन परिस्थितियों में कुटुम्ब प्रबोधन परिवारों के भीतर आत्मीयता और संवाद की पुनर्स्थापना का संदेश देता है।

संघ का मानना है कि किसी भी राष्ट्र का उत्थान या पतन उसके नागरिकों के चरित्र पर निर्भर करता है। चरित्र निर्माण की पहली पाठशाला परिवार ही होता है। बच्चा घर में जो वातावरण देखता है, वही उसके व्यक्तित्व और व्यवहार का आधार बनता है। यदि परिवार में बड़ों का सम्मान, अनुशासन, सादगी और संस्कार होंगे, तो वही भाव आगे चलकर समाज और राष्ट्र जीवन में भी दिखाई देंगे।

कुटुम्ब प्रबोधन का स्वरूप अत्यंत व्यवहारिक है। इसमें किसी जटिल दर्शन या कर्मकांड की अपेक्षा दैनिक जीवन के सरल आचरणों पर बल दिया गया है। इसके प्रमुख आयाम निम्न प्रकार हैं—

मंगल संवाद और वैचारिक विमर्श

परिवार के सदस्यों के बीच नियमित और सकारात्मक संवाद कुटुम्ब प्रबोधन का प्रमुख आधार है। सप्ताह में कम से कम एक दिन पूरा परिवार बिना मोबाइल और टीवी के साथ बैठे, यह आग्रह किया जाता है। इस दौरान बुजुर्ग अपने अनुभव, परिवार का इतिहास, महापुरुषों की प्रेरक कथाएं और सांस्कृतिक मूल्यों की चर्चा करें। इससे नई पीढ़ी में आत्मगौरव, राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक चेतना का विकास होता है।

स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण और पारिवारिक समय

कुटुम्ब प्रबोधन इस बात पर बल देता है कि दिन में कम से कम एक समय का भोजन पूरा परिवार साथ बैठकर करे। भोजन केवल शारीरिक आवश्यकता नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव का भी माध्यम है। परिवार के साथ बिताया गया यह समय मानसिक सुरक्षा और आत्मीयता की भावना को मजबूत करता है।

सादगीपूर्ण जीवन और उपभोक्तावाद का विरोध

आज समाज दिखावे और अनावश्यक उपभोग की प्रवृत्ति से प्रभावित है। सोशल मीडिया आधारित प्रतिस्पर्धा ने लोगों को कृत्रिम जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित किया है। कुटुम्ब प्रबोधन सादगी, संयम और संतोष के मूल्यों पर बल देता है। यह विचार व्यक्ति को अनैतिक साधनों से दूर रखते हुए सामाजिक नैतिकता को मजबूत करता है।

स्वावलंबन और श्रम के संस्कार

बच्चों को अपने छोटे-छोटे कार्य स्वयं करने की प्रेरणा देना भी इस अभियान का महत्वपूर्ण भाग है। अपनी थाली स्वयं धोना, अपना कमरा व्यवस्थित रखना और श्रम का सम्मान करना, ऐसे संस्कार हैं जो व्यक्ति के भीतर विनम्रता और आत्मनिर्भरता विकसित करते हैं।

सामाजिक समरसता और पड़ोसी धर्म

आज शहरी जीवन में पड़ोसियों के बीच आत्मीयता समाप्त होती जा रही है। कुटुम्ब प्रबोधन परिवार की सीमा को केवल रक्त संबंधों तक सीमित नहीं रखता। यह पड़ोसियों के साथ संवाद, सहभोजन और आत्मीय संबंधों को भी सामाजिक समरसता का आधार मानता है। इससे जाति, वर्ग और क्षेत्रीय भेदभाव स्वतः कम होते हैं।

भारतीय संस्कृति का मूल भाव “वसुधैव कुटुम्बकम्” रहा है। संपूर्ण विश्व को परिवार मानने की यह भावना तभी संभव है जब व्यक्ति अपने परिवार के प्रति कर्तव्य और संवेदनशीलता का निर्वाह करे। संघ का कुटुम्ब प्रबोधन इसी भाव को जीवन में उतारने का प्रयास है।

आज विश्व के अनेक विकसित देश टूटते परिवारों, अकेलेपन और सामाजिक विघटन की समस्याओं से जूझ रहे हैं। ऐसे समय में भारतीय संयुक्त परिवार व्यवस्था और सांस्कृतिक मूल्यों की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय समाज अपनी पारिवारिक परंपराओं और संस्कारों को पुनः जागृत करे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कुटुम्ब प्रबोधन किसी प्रकार की कट्टरता या कर्मकांड नहीं, बल्कि संतुलित और संस्कारित जीवन पद्धति का संदेश है। यह आधुनिकता का विरोध नहीं करता, बल्कि उसे भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के साथ संतुलित करने का प्रयास करता है।

आज जब समाज वैचारिक प्रदूषण, नैतिक पतन और सांस्कृतिक विघटन के दौर से गुजर रहा है, तब परिवारों को मजबूत बनाए रखना ही सबसे बड़ा सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्व है। परिवार सुरक्षित रहेगा तो समाज सुरक्षित रहेगा, समाज सुरक्षित रहेगा तो संस्कृति और राष्ट्र दोनों सुरक्षित रहेंगे। यही कुटुम्ब प्रबोधन का मूल संदेश है।

(विनायक फीचर्स)

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