नब्बे की उम्र में भी साहित्य की रोशनी बिखेरते दादा लखमी खिलानी
अशोक मनवानी – विनायक फीचर्स)
साहित्य की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो अपनी लेखनी के साथ-साथ व्यक्तित्व, सरलता और आत्मीय व्यवहार से भी हमेशा याद किए जाते हैं। सिंधी साहित्य के दिग्गज दादा लखमी खिलानी उन्हीं में से एक हैं। 2 अक्टूबर को उन्होंने अपने जीवन के 90 वर्ष पूरे किए। इस अवसर पर उनसे हुई बातचीत में उनकी आवाज़ में वही ऊर्जा और आत्मीयता झलक रही थी, जिसने चार दशकों से अधिक समय से साहित्य जगत को प्रेरित किया है।
इस समय वे अपने पुत्र के साथ बेंगलुरु में रहते हुए भी साहित्य सृजन में लगातार सक्रिय हैं। उनकी कहानियों के अंग्रेज़ी अनुवाद की पुस्तक शीघ्र प्रकाशित होने जा रही है, जो इस तथ्य का प्रमाण है कि उनका साहित्य केवल सिंधी भाषा तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पाठकों तक पहुँचा है।
कहानियाँ और रंगमंच से गहरा नाता
खिलानी दादा की कहानियाँ आज भी स्मृतियों में जीवित हैं। “शिकार काकातुआ”, “अंधी कविता” और “रेत का किला” जैसी कृतियाँ उनके साहित्यिक वैभव की मिसाल हैं। “अंधी कविता” पर भोपाल में हुए नाट्य मंचन ने दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी, वहीं “रेत का किला” का कई बार रंगमंच पर प्रस्तुतीकरण हुआ। मंचन की यादों को साझा करते हुए उन्होंने रंग निर्देशक अशोक बुलानी और कविता इसरानी का स्मरण किया, जो उनके सहयोगियों को सदैव सम्मान देने की उनकी विशेषता को दर्शाता है।

विनायक फीचर्स और दिनेश चंद्र वर्मा का योगदान
उन्होंने वरिष्ठ पत्रकार और विनायक फीचर्स के संस्थापक दिवंगत दिनेश चंद्र वर्मा को भावपूर्ण स्मरण किया। वर्मा जी के प्रयासों से उनकी अनेक कहानियाँ हिंदी अखबारों में प्रकाशित हुईं, जिससे उनका साहित्य व्यापक हिंदी पाठक वर्ग तक पहुँचा। खिलानी दादा मानते हैं कि अगर ऐसे व्यक्तित्व न होते तो सिंधी और हिंदी साहित्य का आपसी रिश्ता इतना गहरा नहीं हो पाता।
जीवनशैली और परिवार
लखमी दादा का जीवन हमेशा बहुआयामी रहा। वे वर्ष के कुछ महीने बेंगलुरु, पुणे और कोलकाता में बिताते हैं। बेटी और बेटे दोनों अपने-अपने कार्यक्षेत्रों में व्यस्त रहते हैं, लेकिन उनके साथ रहकर दादा साहित्य और पारिवारिक जीवन में संतुलन बनाए रखते हैं।
सम्मान और उपलब्धियाँ
लखमी खिलानी को उनकी ऐतिहासिक कृति “गुफा के उस पार” के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त है। यह कहानी-संग्रह जीवन, समाज और संस्कृति की गहराइयों को उद्घाटित करता है। इस सम्मान ने उन्हें न केवल सिंधी साहित्यकारों में विशिष्ट स्थान दिलाया, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी पहचान मजबूत की।
आदिपुर का सांस्कृतिक नवाचार
उन्होंने गुजरात के आदिपुर में सिंधी लेखकों और कलाकारों की कॉलोनी बसाने का अभिनव प्रयास किया। विस्थापन और बिखराव के दौर में यह पहल सिंधी समाज के लिए साझा सांस्कृतिक मंच साबित हुई, जिसने नई पीढ़ी के लेखकों और कलाकारों को प्रोत्साहन दिया।
आत्मीयता और प्रेरणा का स्रोत
खिलानी दादा की सबसे बड़ी विशेषता उनकी आत्मीयता है। 1984 में कोलकाता में केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा आयोजित कहानी लेखन कार्यशाला के अनुभवों से लेकर आज तक, वे नव लेखकों को सहयोग और प्रेरणा देते रहे हैं। उनकी मित्रवत शैली और आत्मीय व्यवहार ने उन्हें साहित्य जगत में अलग पहचान दिलाई है।
आज भी अडिग सृजनशीलता
90 वर्ष की उम्र में भी उनकी रचनात्मकता में वही ताजगी और उत्साह है। उनकी कहानियाँ समाज की संवेदनाओं, संघर्षों और जीवन के विविध अनुभवों का सजीव दस्तावेज़ हैं। वे केवल सिंधी साहित्य के स्तंभ नहीं, बल्कि भारतीय साहित्य की एक अमूल्य धरोहर हैं।
उनका जीवन केवल एक लेखक का नहीं, बल्कि एक संस्कृति, एक पीढ़ी और पूरे समाज के इतिहास का दर्पण है। उनकी आत्मीयता और साहित्यिक योगदान आने वाली पीढ़ियों को सदा प्रेरित करता रहेगा।
(विनायक फीचर्स)
