स्ट्रोक (ब्रेन अटैक) के इलाज में हर सेकंड है कीमती: 'BE FAST' फॉर्मूले से बचाएं जान, मेदांता के डॉक्टरों ने दी बड़ी सलाह

Every second counts in stroke (brain attack) treatment: Save lives using the 'BE FAST' formula—key advice from Medanta doctors.
 
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लखनऊ, 11 जुलाई 2026: भारत में तेजी से बदलती जीवनशैली और बढ़ते मानसिक तनाव के बीच ब्रेन स्ट्रोक (Stroke) एक महामारी का रूप लेता जा रहा है। आंकड़ों के अनुसार, देश में हर साल लगभग 18 से 20 लाख लोग स्ट्रोक का शिकार होते हैं। स्ट्रोक न केवल मृत्यु का एक बड़ा कारण है, बल्कि यह दुनिया भर में स्थायी विकलांगता (Permanent Disability) का दूसरा सबसे बड़ा कारक भी है।

इस गंभीर चिकित्सीय आपातकाल (Medical Emergency) के प्रति जनता को जागरूक करने के लिए मेदांता हॉस्पिटल, लखनऊ में एक विशेष जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में न्यूरोलॉजी और न्यूरोसर्जरी विभाग के शीर्ष विशेषज्ञों ने स्ट्रोक की समय पर पहचान, त्वरित इलाज और आधुनिक पुनर्वास (Rehabilitation) तकनीकों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

स्ट्रोक के इलाज में सबसे अहम है 'गोल्डन ऑवर'

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मेदांता लखनऊ के न्यूरोलॉजी विभाग के डायरेक्टर डॉ. अनूप कुमार ठक्कर ने समय के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि स्ट्रोक आने पर मस्तिष्क की कोशिकाएं प्रति मिनट लाखों की संख्या में मरने लगती हैं, इसलिए इसके इलाज में हर सेकंड कीमती है।

डॉ. ठक्कर ने स्ट्रोक के लक्षणों को पहचानने के लिए 'BE FAST' फॉर्मूला समझाया:

  • B (Balance): अचानक शरीर या चलने का संतुलन बिगड़ना।

  • E (Eyes): आंखों से धुंधला दिखना या अचानक रोशनी चले जाना।

  • F (Face Drooping): चेहरे का एक तरफ टेढ़ा हो जाना या मुस्कान का बिगड़ना।

  • A (Arm Weakness): हाथ या पैर में अचानक कमजोरी या सुन्नपन आना।

  • S (Speech Difficulty): बोलने में हकलाहट, आवाज का साफ न निकलना या शब्द भूल जाना।

  • T (Time to call): बिना समय गंवाए तुरंत अस्पताल पहुंचना।

डॉ. ठक्कर ने बताया कि स्ट्रोक के शुरुआती साढ़े चार घंटे (4.5 Hours) सबसे महत्वपूर्ण होते हैं, जिसे 'गोल्डन ऑवर' कहा जाता है। इस अवधि में अस्पताल पहुंचने पर आईवी थ्रोम्बोलाइसिस (IV Thrombolysis) थेरेपी के जरिए नसों के थक्के को पिघलाकर विकलांगता के खतरे को बेहद कम किया जा सकता है। अच्छी बात यह है कि मेदांता लखनऊ में आधुनिक एडवांस तकनीकों के माध्यम से कुछ मामलों में 24 घंटे तक भी थ्रोम्बोलाइसिस से मरीज का सफल उपचार किया जा सकता है।

ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 'ड्रिप एंड शिप' मॉडल की आवश्यकता

देश के दूर-दराज के इलाकों में न्यूरोलॉजी सुविधाओं की कमी पर चिंता व्यक्त करते हुए विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि हर जिला अस्पताल में बुनियादी सीटी स्कैन (CT Scan), ब्लड प्रेशर और शुगर जांच के साथ आईवी थ्रोम्बोलाइसिस की सुविधा अनिवार्य होनी चाहिए। डॉ. ठक्कर ने कहा कि प्राथमिक उपचार के बाद गंभीर मरीजों को 'ड्रिप एंड शिप' (Drip and Ship) व्यवस्था के तहत तुरंत उच्चीकृत (Higher) मेडिकल सेंटर या बड़े कॉरपोरेट अस्पताल में रेफर कर दिया जाना चाहिए।

मेदांता के मेडिकल डायरेक्टर एवं यूरोलॉजी विभाग के डायरेक्टर डॉ. राकेश कपूर ने कहा स्ट्रोक पूरी तरह से एक मेडिकल इमरजेंसी है, जहां हर एक सेकंड मरीज की जिंदगी और मौत का फैसला करता है। सही समय पर मिला सटीक इलाज न सिर्फ मरीज की जान बचाता है, बल्कि उसे ताउम्र की विकलांगता से भी दूर रखता है। जागरूकता, संतुलित दिनचर्या और त्वरित डॉक्टरी मदद ही इस बीमारी से बचने का सर्वोत्तम मार्ग है।"

45% तक कम हो सकते हैं मामले: लाइफस्टाइल में सुधार है जरूरी

चिकित्सकों के अनुसार, स्ट्रोक के मुख्य जोखिम कारकों में उच्च रक्तचाप (High BP), मधुमेह (Diabetes), धूम्रपान (Smoking) और मोटापा (Obesity) शामिल हैं। पश्चिमी देशों का उदाहरण देते हुए डॉक्टरों ने बताया कि केवल ब्लड प्रेशर (BP) को नियंत्रित रखकर स्ट्रोक के मामलों में लगभग 45 प्रतिशत तक की कमी देखी गई है। ऐसा करने से दिल की बीमारियों (Heart Diseases) का खतरा भी स्वतः कम हो जाता है।

इलाज का अहम हिस्सा है पुनर्वास (Rehabilitation)

जागरूकता सत्र के दौरान डॉक्टरों ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि स्ट्रोक से ठीक होने के बाद मरीज को सामान्य जीवन में वापस लाने के लिए पुनर्वास केंद्र (Rehabilitation Centers) बेहद जरूरी हैं। ऐसे मरीजों को नियमित फिजियोथेरेपी (Physiotherapy), स्पीच थेरेपी (Speech Therapy) और मानसिक स्वास्थ्य परामर्श दिया जाना चाहिए। इस क्षेत्र में तकनीकी विकास के लिए आईआईटी कानपुर (IIT Kanpur) जैसे अग्रणी तकनीकी संस्थानों और मेडिकल कॉलेजों के संयुक्त सहयोग से नई रोबोटिक व एआई तकनीकों को बढ़ावा देने की वकालत भी की गई।

कार्यक्रम का समापन "हर जीवन की रक्षा, हर सेकंड की कीमत" के संकल्प के साथ हुआ, जिसमें सभी से अपील की गई कि स्ट्रोक का मामूली लक्षण भी दिखने पर बिना झाड़-फूंक या घरेलू इलाज में वक्त गंवाए, मरीज को सीधे स्ट्रोक-रेडी (Stroke-Ready) अस्पताल लेकर जाएं।

इस महत्वपूर्ण जागरूकता कार्यक्रम में मेदांता के डॉ. रवि शंकर (डायरेक्टर न्यूरोसर्जरी), डॉ. रतीश जुयाल (डायरेक्टर न्यूरोलॉजी), डॉ. कमलेश सिंह भैसोरा (डायरेक्टर न्यूरोसर्जरी) और डॉ. रोहित अग्रवाल (डायरेक्टर इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी) सहित शहर के कई वरिष्ठ चिकित्सक और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

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