First Born : Privilege or Prejudice
(लेखिकानीतू माथुर) तुम बड़ी हो और समझदार भी, कम से कम मैं तुमसे तो ये उम्मीद रखती हूँ कि तुम मेरी मुश्किल समझोगी बेटा, मेरे बाद इस परिवार में तुम ही सबसे बड़ी हो, इसलिए ये कोशिश भी तुम्हें ही करनी पड़ेगी”, रजनी ने अपना चश्मा नीचे करते हुए सामान्य तरीके से अपनी बात और उसमें छुपी हुई जिम्मेदारी अपनी बड़ी बेटी मेघा को बातों बातों में सौंप दी। बात आज की नहीं है, मेघा जब अपना कम ख़ुद से करना सीख गई तभी से रजनी और उसके पति श्याम, मेघा के पिता ये मानने लगे कि अब उन्हें घर के कुछ काम मेघा को भी सौपनें चाहिए, क्यूकी वो उनकी पहली संतान हैं और ये उसका फर्ज है। मेघा अपने परिवार में अपने माता पिता और दो छोटे भाई बहनों के साथ रहती थी। उसकी छोटी बहन किरण और भाई रवि के होने के बाद तो अपने माँ बाप की नज़रों में जैसे वो बहुत बड़ी समझदार बन गई थी और अचानक मानो प्यार की हिस्सेदारी में भी पीछे रह गई थी। मेघा किरण को तैयार कर दो, रवि का टिफिन बना दो, उनका स्कूल में ध्यान रखो और घर में उन्हें पढ़ाओ आदि ना जाने कितने कामों की लिस्ट रोज़ रजनी और श्याम के मुंह से निकलती थी। मेघा अपना बचपन अपने खेल पढ़ाई जैसे भूल हो गई थी। घर में छोटे भाई बहनों की पसंद पर ध्यान दिया जाता था और मेघा की खुशी और पसंद को बड़ी सहजता से नज़रअंदाज़ कर दिया जाता था, मानों उसकी पसंद कोई मायने ही नहीं रखती हो। अपने लिए अगर मेघा कभी किसी ड्रेस या खिलौने के लिए कहती तो उसे ये कहके रोक दिया जाता कि , अब वो बड़ी है उसके खेलने की उम्र निकल गई है और उनके छोटे भाई बहन और घर के खर्चे में ही सारे पैसे निकल जाते हैं, माँ बाप अपने ही त्याग की फ़हरिस्त में मुंह छिपा लेते थे तो उसके आगे कुछ भी कहना व्यर्थ लगता था।
किसी तरह से दिन बीते और मेघा ने 12 कक्षा में ना सिर्फ़ स्कूल बल्कि अपने जिले में टॉप नंबरों से पास हो कर दिखाया। जिला प्रशासन से मिली छात्रवृत्ति से उसने आईएएस की तैयारी की और फिर अगले चार साल में ही उसका चयन प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर एक बड़े जिले में हो गया। अब उस पर ना सिर्फ घर बल्कि पूरे देश के विकास की जिम्मेदारी थी। बचपन में घर की सारी जिम्मेदारियों ने उसके नन्हे कदमों और कंधों को जो ताक़त दी थी आज वही ताक़त कई गुना बढ़कर उसने अपने देश के भविष्य को सशक्त बनाने में लगानी है। मेघा के माता पिता ख़ुश तो थे मगर मन में एक टीस थी कि उनके बाक़ी दोनों बच्चे पढ़ाई या किसी भी तरह से उतने सक्षम नहीं बन सके थे। जब प्यार नाप तोल कर किया गया हो तो वो प्यार नहीं सौदा है। वो प्यार दुलार जो मेघा को मिलने चाहिए उसे बचपन से ही बांट कर किरण और रवि को कई गुना ज़्यादा दे दिया था, जिससे वो दोनों बहुत ही ग़ैर जिम्मेदार और बिगड़ने लगे थे। पढ़ाई और बाक़ी गतिविधियों में उनका ध्यान नहीं रहता था, सारा दिन मस्ती मज़ाक में ही उनका दिन निकल जाता था। कहते हैं कि पौधे में जरूरत से ज़्यादा पानी देने से भी वो गल जाते हैं, उनको पूरी तरह से बढ़ने में खाद, पानी, हवा, रोशनी सब संतुलन में देना पड़ता है, किरण और रवि का हाल भी कुछ ऐसा ही था।
खैर, इसे ही अपनी किस्मत मानकर मेघा ने बिना किसी से शिकायत के घर में माँ बाप का सहयोग किया, अपनी पढ़ाई पूरी की और इन सबके बावज़ूद सबसे ख़ास बात ये थी कि ये सब उसने अपने चेहरे की मुस्कान को बनाये रखते हुए किया था। जो काम साफ़ दिल और सही नियत से किया जाये उसका फल भी सुखद होता है। मेघा ने अपनी किस्मत को कोसे बिना अपने सामर्थ्य के अनुसार परिवार के लिए तन मन धन से साथ दिया और ख़ुद के लिए भी एक अच्छा भविष्य और बेहतर ज़िंदगी की कोशिश में जुट गई। अपने निस्वार्थ प्रेम, सम्मान और सुलझे विचारों से परिपूर्ण व्यक्तित्व से वो देश , समाज और परिवार के लिए एक गौरव की मिसाल बनी है। प्रशासनिक अधिकारी की इस नई पहचान से आज वो सभी के लिए प्रेरणास्रोत बन गई है।
अपने त्याग को महत्वाकांक्षा में बदल कर मेघा ने अपने लिए एक नई राह चुन ली थी। लेकिन यहाँ कुछ सवाल हैं जो होने चाहियें और इनके जवाब भी बदलने चाहिए….
क्या पहली संतान का प्यार दूसरी संतान में ख़त्म हो जाना चाहिए?
एक सही उम्र में आने पर सभी बच्चों को घर की ज़िम्मेदारी में हिस्सा नहीं लेना चाहिए?
क्या त्याग ही बड़ी औलाद की समझदारी की परख है?
माँ बाप के लिए अपनी सभी संतान समान होनी चाहिए, प्यार और घर की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ बड़ी औलाद का ही नहीं , ये घर के सभी सदस्यों का दायित्व है। पहले उसे प्यार का अधिकारी बनायें फिर दायित्व का।
-नीतू माथुर
