भेदभाव का पहला परिचय : प्रवेश प्रपत्र

The first encounter with discrimination: the admission form.
 
भेदभाव का पहला परिचय : प्रवेश प्रपत्र

डॉ. सुधाकर आशावादी (विनायक फीचर्स)   प्राथमिक विद्यालय से लेकर उच्च शिक्षा संस्थानों तक जितने भी प्रवेश प्रपत्र भरे गए, उनमें लगभग एक जैसे कॉलम होते रहे हैं— नाम, पिता का नाम, पता, अभिभावक का नाम, धर्म, जाति और वर्ग (सामान्य, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग)।

प्रारंभ में यह स्पष्ट नहीं होता था कि जाति वाले कॉलम को भरना अनिवार्य है या नहीं। फिर भी अधिकांश लोग सभी कॉलम भरते थे—अमुक धर्म, अमुक जाति, अमुक वर्ग। समय के साथ इसका वास्तविक उद्देश्य समझ में आया, जब प्रवेश प्रक्रिया में जाति की भूमिका खुलकर सामने आने लगी

प्रवेश सूची तैयार करते समय सर्वप्रथम लगभग 50 प्रतिशत की एक सामान्य सूची बनाई जाती थी, जिसमें किसी भी जाति या वर्ग का अभ्यर्थी शामिल हो सकता था। इसके बाद अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अभ्यर्थियों के प्रपत्र अलग किए जाते थे। सामान्य वर्ग के प्रपत्र एक ओर रख दिए जाते थे। इस प्रकार प्रवेश समिति एक प्रकार की विघटनकारी प्रयोगशाला में जाति और वर्ग के आधार पर विभाजन करती थी।

भेदभाव का पहला परिचय : प्रवेश प्रपत्र

अंततः अलग-अलग श्रेणियों की प्रवेश सूचियाँ जारी होती थीं—
प्रवेश सूची: सामान्य वर्ग,
प्रवेश सूची: अन्य पिछड़ा वर्ग,
प्रवेश सूची: अनुसूचित जाति,
प्रवेश सूची: अनुसूचित जनजाति
बाद के वर्षों में इसमें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) को भी जोड़ दिया गया।

इसके पश्चात प्रवेश प्रक्रिया आरंभ होती है, जहाँ जातीय आधार पर शुल्क संरचना भी अलग-अलग निर्धारित होती है। सामान्य और पिछड़ा वर्ग के लिए अलग शुल्क, जबकि अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए अलग। इसके बाद छात्रवृत्ति का एक अलग ही खेल शुरू होता है। बैंक खाते खुलवाए जाते हैं। कुछ विद्यार्थी केवल छात्रवृत्ति प्राप्त करने के उद्देश्य से ही प्रवेश लेते हैं। कक्षा से उनका कोई वास्तविक सरोकार नहीं होता। विद्यालय में उनके दर्शन सामान्यतः तीन बार होते हैं—
पहली बार प्रवेश के समय,
दूसरी बार छात्रवृत्ति के फॉर्म भरते समय,
और तीसरी बार परीक्षा के दौरान—वह भी इस बात की कोई गारंटी नहीं कि वे परीक्षा देंगे ही।

यदि संयोगवश परीक्षा दे भी दी और अंक कम आ गए, तो आरोप सीधा अध्यापक पर आता है—कि शिक्षक ने जातिगत पूर्वाग्रह के कारण प्रायोगिक या मौखिक परीक्षा में उचित अंक नहीं दिए। इसे अध्यापक का वैमनस्य और भेदभाव करार दे दिया जाता है।

वस्तुतः समाज को बाँटने में प्रवेश प्रपत्रों में दिया गया जातीय कॉलम एक प्रमुख भूमिका निभाता है। यदि जातीय कॉलम और जाति आधारित छात्रवृत्ति का आकर्षण न हो, तो शायद इस कॉलम की अनिवार्यता भी न रहे। फिर भी यह व्यवस्था निरंतर चलती रहती है।

यही जातीय कॉलम भेदभाव की प्रयोगशाला के आँकड़े तैयार करता है। इन्हीं आँकड़ों के आधार पर भविष्य के भेदभाव की नींव रखी जाती है। यही जातीय नेताओं को राजनीति करने का आधार देता है और ऐसे प्रावधानों को लागू करने का हथियार बनता है, जिनके अंतर्गत झूठी और फर्जी शिकायतों के माध्यम से लोगों को प्रताड़ित किया जा सकता है। विडंबना यह है कि झूठी शिकायतों पर दंड का कोई ठोस प्रावधान नहीं होता। यही इस प्रयोगशाला का परीक्षण-निष्कर्ष है, जिसके आधार पर सियासत फलती-फूलती है। यहाँ तर्क और न्याय के स्थान पर भीड़ का समर्थन और विरोध ही सर्वोपरि हो जाता है।

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