पहले सड़क बनेगी, फिर पाइपलाइन के लिए खुदेगी
(मुकेश कबीर – विभूति फीचर्स)
हमारे मोहल्ले में सीवेज लाइन का बड़ा टोटा था। इसलिए एक दिन हम सब झुंड बनाकर म्युनिसिपलटी के ऑफिस जा धमके। एक दलाल के माध्यम से सबसे बड़े साब से मिलने का जुगाड़ किया, क्योंकि वहां दलालों के बिना कुछ होता नहीं है। म्युनिसिपलटी में दलाल वही होते हैं, जो हाथ ठेले में मजदूर—मजदूर जितना धक्का मारेगा, ठेला उतना आगे बढ़ेगा। और अगर कोई धक्का देने वाला न हो, तो ठेला बिजली के खंभे की तरह वहीं खड़ा रह जाता है।

इसलिए हमने भी सोचा कि साब को खंभा बनने से रोकने के लिए दलाल की मदद लेना ही बेहतर है। जैसे-तैसे हम साब के सामने पहुंचे और विनती की—“हुज़ूर, हमारे मोहल्ले की सीवेज लाइन बहुत पुरानी हो चुकी है। रोज़ नई-नई दिक्कतें आती हैं। अगर आपकी इनायत हो जाए, तो मोहल्ले वालों की सुबह खुशनुमा हो जाए।”
आजकल साब को ‘हुज़ूर’ ही कहना पड़ता है। आखिर साब लोग खुद को बादशाह समझकर दीवाने-आम में बैठते हैं।
आम आदमी के सामने ये बड़े दमदार होते हैं, लेकिन मंत्री जी के सामने जाते ही दुमदार हो जाते हैं। खैर, हम तो ठहरे आम आदमी। हमारे लिए तो साब का दलाल भी वज़ीर-ए-आज़म से कम नहीं, इसलिए साब तो हुज़ूर होंगे ही।
मेहरबानी रही कि साब ने हमारी बात ध्यान से सुनी। यह बड़ी बात थी—उनकी और उनके मोबाइल की भी। वरना अगर उसी वक्त मोबाइल कुछ अर्ज कर देता, तो साब हमें क्या सुनते! बड़े ऑफिस से बड़े साब का फोन होता तो तुरंत उठकर चल देते, और अगर घर से मैडम का फोन आ जाता, तो साब का सारा वक्त “हाँ…हाँ…ओके…” में निकल जाता।
खैर, साब बोले—
“आप लोग नई सीवेज लाइन कहां डलवाना चाहते हैं?”
हम चौंककर बोले—
“मोहल्ले में, हुज़ूर… और कहां?”
थोड़ा सोचकर साब ने पूछा—
“तुम्हारे मोहल्ले की सड़क नई है या पुरानी?”
हमने कहा—
“हुज़ूर, सड़क तो बहुत पुरानी है।”
इतना सुनते ही साब बोले—
“फिर हम सीवेज लाइन कैसे डालें? पाइपलाइन तो वहीं डाली जाती है, जहां सड़क नई बनी हो। पहले सड़क बनवाइए, फिर आइए।”
हमने समझाने की कोशिश की—
“हुज़ूर, सड़क बनने के बाद पाइपलाइन डालना तो और मुश्किल होगा। पहले लाइन डल जाए, फिर उसके ऊपर सड़क बन जाए—तो दोनों काम सही हो जाएंगे।”
साब बोले—
“अब सही-गलत तुम हमें बताओगे? तुम्हारे कहने से हम सालों पुरानी परंपरा तोड़ दें? हमारे देश में परंपरा है—पहले सड़क बनती है, फिर उसे खोदकर पाइपलाइन डाली जाती है। जैसे तुम्हारी शर्ट के बीच में बटन की लाइन दिखती है न, वैसी ही लाइन सड़क पर भी दिखनी चाहिए। तभी पता चलता है कि नई पाइपलाइन डली है। तभी हमारा काम दिखाई देता है। इसलिए पहले सड़क बनवाइए, फिर इधर आइए।”
हमने हाथ जोड़कर कहा—
“जहांपनाह रहम करें। सड़क बनवाने के चक्कर में साल-दो साल निकल जाएंगे। तब तक दिक्कतें और बढ़ जाएंगी। वैसे भी पाइपलाइन डालने के बाद सड़क खोदने से हर जगह खुदा ही नजर आता है और गिरने-पड़ने का डर भी रहता है। इसलिए पहले ही आपके पास आ गए। आप लाइन बिछा दीजिए, सड़क हम बाद में बनवा लेंगे।”
इस बार साब ने कोई विरोध नहीं किया। बोले—
“एप्लीकेशन दे जाइए, मैं देखता हूं क्या हो सकता है।”
हम एप्लीकेशन देकर आ गए। अब लाख टके का सवाल यही है—पहले सड़क बनेगी या पहले पाइपलाइन डलेगी?
हमारी तो भगवान से यही विनती है कि पहले पाइपलाइन ही बिछ जाए, सड़क बाद में बने—तो सबका भला होगा। अब देखते हैं साब लोग क्या करते हैं—परंपरा तोड़ते हैं या सड़क।
जस्ट वेट… तब तक थोड़ा इंतज़ार का मज़ा लीजिए।
