दीपोत्सव के पाँच दिन, पाँच दीप और पाँच संकल्प: खुशियों की रोशनी से रोशन हो हर जीवन
डॉ. दीपक गोस्वामी | विभूति फीचर्स त्योहार केवल अपने घर को सजाने, पकवान बनाने और खुशियां मनाने का नाम नहीं हैं। त्योहारों का वास्तविक सौंदर्य तब प्रकट होता है, जब हमारी खुशियां किसी दूसरे के चेहरे पर मुस्कान बनकर उतरती हैं। इस दीपावली अपने घर में दीप जलाएं तो किसी के अंधकारमय जीवन का भी ध्यान रखें। अपनी थाली सजाएं तो किसी भूखे की थाली भरने का संकल्प लें। अपने बच्चों को उपहार दें तो किसी वंचित बच्चे के सपनों को भी पंख दें। अपने आंगन में रंगोली बनाएं तो किसी उदास मन में आशा के रंग भरें। यही दीपोत्सव की आत्मा है, भारतीय संस्कृति की उदारता है और मानवीय जीवन की सबसे सुंदर साधना है।
भारत में पर्व केवल पंचांग की तिथियां नहीं हैं, बल्कि वे पीढ़ियों को जोड़ने वाली सांस्कृतिक स्मृतियां, जीवन को दिशा देने वाले मूल्य और समाज को संवेदनशील बनाने वाले अवसर हैं। धनतेरस से भाई दूज तक चलने वाला पांच दिवसीय दीपोत्सव हमें पांच ऐसे जीवन मूल्य प्रदान करता है, जिन्हें व्यवहार में उतारकर हम उत्सव को केवल पांच दिनों तक सीमित रखने के बजाय पूरे वर्ष सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बना सकते हैं।
हमारी प्राचीन मंगलकामना है- 'सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।' अर्थात सभी सुखी हों और सभी निरोग रहें। यह केवल पूजा में दोहराया जाने वाला मंत्र नहीं, बल्कि ऐसे समाज की परिकल्पना है, जहां किसी की पीड़ा के प्रति हम उदासीन न रहें। आइए, इस बार दीपावली को पांच दिन, पांच दीप और पांच मानवीय संकल्पों के महाअभियान के रूप में मनाएं।
पहला दिन : धनतेरस – आरोग्य, समृद्धि और संवेदना का दीप
धनतेरस अर्थात धनत्रयोदशी भारतीय परंपरा में भगवान धन्वंतरि के प्राकट्य और आरोग्य की मंगलकामना से जुड़ा पर्व है। इस दिन लोग स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और शुभता के प्रतीक के रूप में उपयोगी वस्तुओं की खरीदारी करते हैं।
लेकिन हमें समृद्धि की परिभाषा पर भी विचार करना होगा। क्या सोना-चांदी ही धन है? क्या बड़े भवन और महंगी वस्तुएं ही संपन्नता का प्रतीक हैं? नहीं! स्वस्थ शरीर, शांत मन, सुरक्षित परिवार, सम्मानजनक आजीविका और दूसरों के काम आने की क्षमता भी जीवन की अमूल्य संपदा है।
इस धनतेरस एक नया संकल्प लें। अपने परिवार के स्वास्थ्य के साथ किसी जरूरतमंद के स्वास्थ्य की भी चिंता करेंगे। किसी बुजुर्ग को चिकित्सकीय परामर्श दिलाएंगे, किसी जरूरतमंद को आवश्यक दवा उपलब्ध कराने में सहायता करेंगे और किसी निर्धन परिवार तक पौष्टिक भोजन पहुंचाने का प्रयास करेंगे। घर और आसपास स्वच्छता तथा स्वस्थ जीवनशैली का संदेश फैलाएंगे।
धन का वास्तविक मूल्य उसकी मात्रा से नहीं, बल्कि उसके सदुपयोग से निर्धारित होता है। जिस संपत्ति से किसी की पीड़ा कम हो, वही समृद्धि सार्थक है। पहला दीप हमें यही सिखाता है कि हमारी समृद्धि में किसी जरूरतमंद के कल्याण का भी हिस्सा होना चाहिए।
दूसरा दिन : नरक चतुर्दशी – स्वच्छता, आत्मशुद्धि और बुराइयों से मुक्ति का दीप
नरक चतुर्दशी को छोटी दीपावली भी कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की पौराणिक कथा इस पर्व को अन्याय और आसुरी प्रवृत्तियों पर विजय के प्रतीक के रूप में स्थापित करती है। हम हर वर्ष घरों की सफाई करते हैं, अनुपयोगी वस्तुएं हटाते हैं, दीवारें सजाते हैं और वातावरण को सुंदर बनाते हैं। लेकिन क्या कभी अपने मन की सफाई का भी अभियान चलाते हैं?
ईर्ष्या, अहंकार, नशा, छल, कपट, लालच, भेदभाव, कटुता और दूसरों को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति हमारे भीतर जमा वह कचरा है, जो जीवन की सुंदरता को नष्ट कर देता है। इस दिन संकल्प लें कि अपने व्यवहार की कमियों को पहचानेंगे और उन्हें सुधारने का ईमानदार प्रयास करेंगे। सार्वजनिक स्थानों को गंदा नहीं करेंगे। सफाईकर्मियों को केवल काम करने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि समाज के स्वास्थ्य और स्वच्छता में योगदान देने वाला सम्मानित नागरिक मानेंगे। उनके श्रम का उचित मूल्य और मानवीय सम्मान सुनिश्चित करने की आवाज उठाएंगे। याद रखिए, स्वच्छता केवल झाड़ू लगाने से नहीं आती, बल्कि जिम्मेदार नागरिक बनने से आती है। दूसरा दीप हमें सिखाता है कि घर की गंदगी हटाने के साथ-साथ मन की बुराइयों को भी दूर करना आवश्यक है।
तीसरा दिन : दीपावली – प्रेम, प्रकाश और परोपकार का दीप
दीपावली भारतीय संस्कृति का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। यह भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन की स्मृति, लक्ष्मी-गणेश पूजन और शुभारंभ की परंपराओं से जुड़ा है। जैन परंपरा में भगवान महावीर के निर्वाण और सिख परंपरा में बंदी छोड़ दिवस का भी इस समय विशेष धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व है। दीपक की लौ हमें अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश देती है। लेकिन सवाल यह है कि हमारे घर में जलने वाला दीप किसी दूसरे के जीवन तक कितनी रोशनी पहुंचा रहा है?
इस दीपावली किसी जरूरतमंद परिवार तक मिठाई पहुंचाएं। किसी अकेले बुजुर्ग के पास बैठकर उनका हाल पूछें। किसी वंचित बच्चे को उत्सव में शामिल करें। किसी श्रमिक को सम्मानपूर्वक धन्यवाद दें। ऐसे व्यक्ति से संवाद करें, जो परिस्थितियों के कारण अकेलापन महसूस करता है।
आतिशबाजी के स्थान पर सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल उत्सव को प्राथमिकता दें। बच्चों को सिखाएं कि उत्सव का आनंद दूसरों की परेशानी का कारण बनकर नहीं आना चाहिए। प्रेम का अर्थ केवल अपने प्रियजनों के लिए अच्छा सोचना नहीं, बल्कि अपरिचित व्यक्ति के प्रति भी मानवीय संवेदना रखना है। तीसरा दीप हमें सिखाता है कि हमारे घर का उजाला तभी सार्थक है, जब किसी दूसरे के जीवन का अंधकार भी कम हो।
चौथा दिन : गोवर्धन पूजा और अन्नकूट – प्रकृति, अन्नदाता और सहअस्तित्व का दीप
गोवर्धन पूजा भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला की स्मृति से जुड़ी है। विशेषकर ब्रजभूमि में इस पर्व का आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व अत्यंत व्यापक है। अन्नकूट की परंपरा सामूहिकता, अन्न के सम्मान और प्रसाद वितरण की भावना को अभिव्यक्त करती है।
गोवर्धन लीला हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और उसके संरक्षण का संदेश देती है। पर्वत, वन, जल, भूमि, पशुधन और कृषि हमारी जीवन व्यवस्था के आधार हैं। इनके बिना मानव सभ्यता की समृद्धि की कल्पना अधूरी है।
इस दिन संकल्प लें कि जलस्रोतों को प्रदूषित नहीं करेंगे, वृक्षों का संरक्षण करेंगे, पौधारोपण करेंगे और पशु-पक्षियों के लिए भोजन तथा पानी की व्यवस्था में योगदान देंगे। गौसेवा सहित पशुओं की देखभाल को केवल धार्मिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि वास्तविक जिम्मेदारी बनाएंगे। अन्नकूट का संदेश भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। तैत्तिरीय उपनिषद में कहा गया है- 'अन्नं न निन्द्यात्।' अर्थात अन्न का अनादर नहीं करना चाहिए।
भोजन की बर्बादी रोकें। किसान के परिश्रम को समझें। खेत से रसोई तक अन्न पहुंचाने वाले प्रत्येक श्रमिक का सम्मान करें। किसी जरूरतमंद परिवार को भोजन उपलब्ध कराएं और सामूहिक भोज में किसी के साथ भेदभाव न होने दें।प्रकृति का शोषण करके समृद्धि नहीं पाई जा सकती। अन्नदाता का सम्मान किए बिना अन्न की संस्कृति जीवित नहीं रह सकती। चौथा दीप हमें सिखाता है कि प्रकृति की रक्षा, अन्न का सम्मान और प्रत्येक जीव के प्रति करुणा ही सच्ची पूजा है।
पांचवां दिन : भाई दूज – रिश्तों, आत्मीयता और आत्मनिर्भरता का दीप
भाई दूज को यम द्वितीया भी कहा जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार यमराज अपनी बहन यमुना के यहां गए थे। इसी कथा से यह पर्व भाई-बहन के स्नेह और मंगलकामना से जुड़ा है। ब्रजभूमि में मथुरा के विश्राम घाट पर इस दिन यमुना स्नान की विशेष परंपरा है। लेकिन इस पर्व का संदेश केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह रिश्तों में विश्वास, संवाद, सम्मान और आत्मीयता को पुनर्जीवित करने का अवसर भी है।
इस दिन अपने भाई-बहन से मिलें, परिवार के बुजुर्गों को समय दें, माता-पिता का आशीर्वाद लें और उन रिश्तों को भी संभालें, जिनमें समय के साथ दूरियां आ गई हैं। किसी अकेली महिला, वृद्ध व्यक्ति या असहाय परिवार का हाल पूछें। जहां संवाद टूट गया है, वहां पहल करें। अपनी गलती स्वीकार करने और क्षमा मांगने का साहस रखें।
इस अवसर पर आर्थिक आत्मनिर्भरता का एक संकल्प भी जोड़ें। स्थानीय कुम्हार से मिट्टी के दीपक खरीदें। छोटे दुकानदारों, कारीगरों, महिला उद्यमियों और स्थानीय उत्पादकों को प्रोत्साहित करें। किसी बेरोजगार को रोजगार का अवसर दिलाने में सहायता करें और श्रमिकों को उचित पारिश्रमिक दें। सम्मानजनक रोजगार व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनने का अवसर देता है। पांचवां दीप हमें सिखाता है कि रिश्तों में अपनापन, समाज में सम्मान और जीवन में आत्मनिर्भरता ही स्थायी खुशहाली का आधार है।
पांच दिन की रोशनी, पूरे वर्ष की जिम्मेदारी
पांच दिन बीत जाएंगे। सजावट उतर जाएगी। मिठाइयों की थालियां खाली हो जाएंगी। दीपक बुझ जाएंगे और हम फिर अपनी सामान्य दिनचर्या में लौट आएंगे। लेकिन क्या हमारी संवेदना भी त्योहार के साथ समाप्त हो जानी चाहिए? नहीं! दीपोत्सव का वास्तविक उद्देश्य केवल पांच दिनों का उत्सव मनाना नहीं, बल्कि जीवनभर मानवीय मूल्यों को जीवित रखना है।
आइए, इस बार पांच दीपों के साथ पांच प्रतिज्ञाएं भी लें-
1. स्वास्थ्य का संकल्प: स्वयं स्वस्थ रहेंगे और जरूरतमंदों के स्वास्थ्य की चिंता करेंगे।
2. स्वच्छता का संकल्प: घर, मन, व्यवहार और सार्वजनिक वातावरण को स्वच्छ रखेंगे।
3. प्रेम का संकल्प: किसी को अकेला नहीं छोड़ेंगे और दूसरों की प्रसन्नता का कारण बनेंगे।
4. प्रकृति एवं अन्न का संकल्प: जल, जंगल, जमीन, पशु-पक्षियों और अन्न का सम्मान करेंगे।
5. आत्मीयता एवं आत्मनिर्भरता का संकल्प: रिश्ते संभालेंगे, स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देंगे और जरूरतमंदों को अवसर उपलब्ध कराएंगे।
इन संकल्पों को निभाने के लिए किसी बड़े धन की आवश्यकता नहीं है। कभी किसी को समय देना, किसी की बात सुन लेना, किसी भूखे को भोजन करा देना और किसी निराश व्यक्ति को हिम्मत दे देना भी बहुत बड़ा मानवीय कार्य है। एक दीपक दूसरे दीपक को जलाता है तो उसकी लौ कम नहीं होती। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को प्रसन्नता देता है तो उसकी अपनी खुशी घटती नहीं, बल्कि और समृद्ध होती है। यही जीवन का अद्भुत सत्य है- खुशियां जमा करने की वस्तु नहीं, बल्कि बांटने की अनुभूति हैं।
आइए, इस दीपावली अपने घर की चौखट पर ही नहीं, किसी जरूरतमंद के जीवन की चौखट पर भी दीप जलाएं। मिठाइयां बांटें, मुस्कानें बांटें, अवसर बांटें, सम्मान बांटें, ज्ञान बांटें और सबसे बढ़कर प्रेम बांटें। हमारा उत्सव ऐसा हो, जिसमें अमीर के घर की रोशनी देखकर गरीब की आंखें नम न हों, बल्कि उसे भी लगे कि यह पर्व मेरा है, यह समाज मेरा है और इस खुशहाली में मेरा भी हिस्सा है। क्योंकि जिस समाज में एक व्यक्ति की खुशी दूसरे व्यक्ति की चिंता बन जाए, वहां समृद्धि अधूरी है। और जिस समाज में एक व्यक्ति की खुशी दूसरे व्यक्ति की खुशी बन जाए, वही वास्तविक सभ्य, संवेदनशील और संस्कारवान समाज है।
आइए, इस दीपोत्सव को खुशियों की पोटली बांटने का राष्ट्रीय मानवीय अभियान बनाएं।
दीप जले घर-घर में, उजियारा हर मन में हो।
कोई भूखा, कोई अकेला न रहे,
अपनापन हर जीवन में हो।
हर हाथ को सम्मान मिले,
हर श्रम को उचित स्थान मिले।
हर बच्चे को अवसर मिले,
हर परिवार में खुशियों का संसार खिले।
शुभ दीपावली! मंगलमय दीपोत्सव!

