उत्तर प्रदेश में पहली बार लैब में तैयार सेल्स से यूरिथ्रल स्ट्रिक्चर का सफल इलाज, अपोलोमेडिक्स ने रचा इतिहास

Successful treatment of urethral stricture using lab-grown cells for the first time in Uttar Pradesh; Apollomedics creates history.
 
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लखनऊ, 6 अगस्त 2026। उत्तर प्रदेश में पहली बार लखनऊ के अपोलोमेडिक्स सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल ने लैब में तैयार किए गए सेल्स (Cell-based Therapy) की मदद से यूरिथ्रल स्ट्रिक्चर (पेशाब की नली के सिकुड़ने) का सफल उपचार कर चिकित्सा क्षेत्र में नई उपलब्धि हासिल की है। इस अत्याधुनिक तकनीक से 30 वर्षीय मरीज का सफल ऑपरेशन किया गया, जिसे अगले ही दिन अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

यह अभिनव प्रक्रिया अपोलोमेडिक्स के डायरेक्टर एवं हेड, यूरोलॉजी एंड किडनी ट्रांसप्लांट डॉ. मयंक मोहन अग्रवाल, एसोसिएट डायरेक्टर यूरोलॉजी डॉ. वेद भास्कर और डॉ. शैलेंद्र गुप्ता की टीम ने संपन्न की। इसमें टिश्यू इंजीनियरिंग तकनीक के माध्यम से मरीज के अपने सेल्स का उपयोग कर सिकुड़ी हुई यूरिथ्रा का उपचार किया गया।

पारंपरिक सर्जरी से कम दर्द, तेज रिकवरी

यूरिथ्रल स्ट्रिक्चर के पारंपरिक उपचार में आमतौर पर बक्कल म्यूकोसा ग्राफ्ट यूरेथ्रोप्लास्टी (BMGU) की जाती है, जिसमें मरीज के मुंह के अंदर से लगभग 5–6 सेंटीमीटर ऊतक निकालना पड़ता है। इससे कई सप्ताह तक खाने-पीने में परेशानी होती है और दर्द भी अधिक रहता है।

दूसरा विकल्प एंडोस्कोपिक या ऑप्टिकल इंटरनल यूरेथ्रोटॉमी है, लेकिन इसमें बीमारी दोबारा होने की संभावना अपेक्षाकृत अधिक रहती है और कई मरीजों को लंबे समय तक स्वयं कैथेटर लगाना पड़ता है।

कैसे हुई नई तकनीक से सर्जरी?

इस आधुनिक उपचार के तहत मरीज के गाल के अंदर से केवल 10×5 मिलीमीटर का छोटा ऊतक (टिश्यू) लिया गया। उसी समय टांके लगाकर घाव बंद कर दिया गया, जिससे मरीज पहले ही दिन सामान्य भोजन कर सका।

इस ऊतक को विशेष कोल्ड-चेन व्यवस्था के साथ पुणे स्थित अत्याधुनिक लैब भेजा गया, जहां टिश्यू इंजीनियरिंग की मदद से दो सप्ताह में लगभग 50 लाख जीवित सेल्स विकसित किए गए। इन सेल्स की उपयोग अवधि केवल 72 घंटे होती है, इसलिए उन्हें नियंत्रित तापमान में वापस लखनऊ लाया गया।

इसके बाद एंडोस्कोपिक तकनीक से इन सेल्स को लिक्विड थ्रोम्बिन के साथ मिलाकर सिकुड़े हुए हिस्से पर लगाया गया। ये सेल्स प्राकृतिक रूप से ऊतक की मरम्मत को बढ़ावा देते हैं और दोबारा निशान बनने या नली के फिर से सिकुड़ने की संभावना को कम करते हैं।

केवल 15–20 मिनट की प्रक्रिया

डॉ. मयंक मोहन अग्रवाल ने बताया कि इस प्रक्रिया में किसी बड़े चीरे की आवश्यकता नहीं होती और पूरी सर्जरी लगभग 15 से 20 मिनट में पूरी हो जाती है। जहां पारंपरिक ओपन सर्जरी में मरीज को दो से तीन सप्ताह तक कैथेटर रखना पड़ता है, वहीं इस तकनीक में इसे लगभग एक सप्ताह में हटाया जा सकता है। मरीज अगले ही दिन अस्पताल से डिस्चार्ज होने की स्थिति में था।

चुनिंदा मरीजों के लिए प्रभावी विकल्प

डॉ. वेद भास्कर के अनुसार, यूरिथ्रल स्ट्रिक्चर संक्रमण, चोट या पहले किए गए उपचार के कारण हो सकता है। यह नई सेल-आधारित तकनीक सभी मरीजों के लिए उपयुक्त नहीं है, लेकिन सही मामलों में इसकी सफलता दर 70 से 80 प्रतिशत तक है, जो पारंपरिक ओपन सर्जरी के बराबर मानी जाती है। साथ ही इसमें दर्द कम, रिकवरी तेज और जटिलताओं का जोखिम भी कम रहता है।

अत्याधुनिक चिकित्सा की दिशा में नई उपलब्धि

अपोलोमेडिक्स सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल के एमडी एवं सीईओ डॉ. मयंक सोमानी ने कहा कि अस्पताल का उद्देश्य मरीजों तक विश्वस्तरीय और आधुनिक उपचार उपलब्ध कराना है। उन्होंने कहा कि लैब में विकसित सेल्स पर आधारित यह तकनीक कम चीरफाड़ वाले उपचार की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जिससे मरीजों को कम दर्द, तेज रिकवरी और जल्द सामान्य जीवन में लौटने का अवसर मिलता है।

यह सफलता उत्तर प्रदेश में पुनर्जनन चिकित्सा (Regenerative Medicine) और टिश्यू इंजीनियरिंग आधारित उपचार के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानी जा रही है।

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