हमको राजा जी माफ करना! रील के चक्कर में बने 'सेलिब्रिटी' और जब याद आई कानून के लंबे हाथों की
(सुधाकर आशावादी का व्यंग्य)
'लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई...' किसी शायर का यह मिसरा आज के डिजिटल युग के उतावले कलाकारों पर बिल्कुल सटीक बैठता है। क्षणिक आवेश और 'लाइक-शेयर' की भूख में कोई कब क्या कर बैठे, इसका अहसास उस वक्त भले न हो, लेकिन जब सीसीटीवी फुटेज खंगाले जाते हैं, फिंगरप्रिंट और आधुनिक बायोमेट्रिक तकनीकों के जरिए पहचान की जाती है, तब समझ आता है कि पुलिस और कानून के हाथ वाकई कितने लंबे होते हैं।
सड़कों पर अवतरित हुई 'आधुनिक कला संस्कृति'
पिछले दिनों देश की राजधानी में एक सांस्कृतिक विरोध-प्रदर्शन सह 'रीलिंग समारोह' का आयोजन हुआ। नाम भले ही इसे कोई राजनीतिक या सामाजिक आंदोलन दिया गया हो, लेकिन स्वरूप इसका विशुद्ध रूप से सोशल मीडिया प्रदर्शन का ही था।
देश की युवा पीढ़ी की स्वच्छंदता और आधुनिकता का खुलेआम प्रदर्शन देखने को मिला। पारिवारिक संस्कारों से सराबोर (या शायद उनसे दूर) कुछ युवक-युवतियों ने मर्यादा की सीमाओं को लांघकर नए-नए नारों का मंचन किया:
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समोसे वाली 'तेरहवीं': कमाल की रचनात्मकता थी! कोई परीक्षा का पर्चा लीक हुआ, परीक्षा दोबारा भी हो गई और उसका परिणाम भी आ गया, लेकिन कुछ 'उदीयमान कलाकारों' को तो गड़े मुर्दे उखाड़कर उसकी प्रतीकात्मक तेरहवीं ही मनानी थी। तेरहवीं भी ऐसी जहाँ पारंपरिक व्यंजनों—लड्डू, कचौरी, रायता या दम आलू की जगह केवल समोसों का वितरण हुआ।
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मर्यादा का चीरहरण: अधिक व्यूज पाने की चाहत में ऐसे-ऐसे अनूठे संवाद बोले गए और ऐसी वेशभूषा धारण की गई मानो सार्वजनिक सड़क पर ही किसी विवादित फिल्म का फिल्मांकन चल रहा हो।
रील वायरल हुई और 'सेलिब्रिटी' बन गए कलाकार
कलाकारों की मेहनत रंग लाई और रील धड़ाधड़ वायरल हो गई। वायरल होते-होते वह उनके घर-परिवार, नाते-रिश्तेदारों, पड़ोसियों और अंततः सुरक्षा एजेंसियों के मोबाइल स्क्रीन तक जा पहुँची।
जब पुलिस ने उनके इस 'उत्कृष्ट अभिनय' की सराहना शुरू की और सार्वजनिक स्थलों तथा मेट्रो स्टेशनों से लेकर उनके घर की गलियों तक 'नागरिक अभिनंदन' (पूछताछ) की आहट सुनाई दी, तब इन नए-नए बने सेलिब्रिटीज के पसीने छूटने लगे। अब उन्हें चिंता सता रही है कि कहीं उनकी यह प्रसिद्धि पुलिसिया एफआईआर या केस डायरी का हिस्सा न बन जाए।
गलती म्हारे से हो गई
अब वही 'क्रांतिकारी' रील-मेकर्स परेशान घूम रहे हैं। कैमरे के सामने अब नए संवाद बोले जा रहे हैं, मगर इस बार लहजा बदला हुआ है। आँखों से टसुए बहाए जा रहे हैं और गिड़गिड़ाकर गुहार लगाई जा रही है—"कोई पुलिस को हमारे घर का पता मत बताना!"
पृष्ठभूमि में बस एक ही गाना बजता सुनाई दे रहा है—'हमको राजा जी माफ करना, गलती म्हारे से हो गई! अब समझ यह नहीं आता कि असली गलती क्षणिक प्रसिद्धि के भूखे उन नौजवानों से हुई या फिर उन अभिभावकों से, जिन्होंने 'स्वतंत्रता' के नाम पर संस्कारों को सोशल मीडिया के एल्गोरिदम पर कुर्बान होने के लिए खुला छोड़ दिया!
