अभिव्यक्ति की आजादी या नफरत का व्यापार? समाज को बांटने वाले तत्वों पर लगे कठोर लगाम
(लेखक: डॉ. सुधाकर आशावादी - विनायक फीचर्स)
आज हमारे समाज में एक ऐसा वर्ग तेजी से सक्रिय हुआ है, जिसका राष्ट्र की शांति, सुशासन और आपसी भाईचारे से कोई सरोकार नहीं है। इस वर्ग का एकमात्र एजेंडा समाज में वैमनस्य और विद्वेष के बीज बोना है। विडंबना यह है कि 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' के पवित्र संवैधानिक अधिकार का ढाल बनाकर ये तत्व भारत की समृद्ध लोक संस्कृति और गौरवशाली परंपराओं को खंडित करने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं।
सोशल मीडिया और भ्रामक सामग्री की बाढ़
डिजिटल क्रांति के इस दौर में जहाँ सूचनाओं का आदान-प्रदान सुगम हुआ है, वहीं सोशल मीडिया पर 'रील' और 'शॉर्ट वीडियो' के जरिए रातों-रात चर्चा में आने की भूख ने खतरनाक मोड़ ले लिया है। बिना किसी ऐतिहासिक प्रमाण या तर्क के, इतिहास को अपनी संकीर्ण मानसिकता के अनुसार तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है।
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परंपराओं पर प्रहार: बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक 'होली' जैसे त्योहारों को जातिगत चश्मे से देखकर बहिष्कार की बातें करना, सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ने की एक सोची-समझी साजिश है।
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तर्कहीन विमर्श: कभी धार्मिक ग्रंथों को कपोल-कल्पित बताना और कभी उन्हीं के आधार पर समाज के एक वर्ग को 'पीड़ित' घोषित कर नफरत फैलाना, आज के दौर का नया चलन बन गया है।
कुतर्क और मानसिक संकीर्णता
आश्चर्यजनक बात यह है कि जो लोग समस्त प्राकृतिक संसाधनों और सुविधाओं का उपभोग कर रहे हैं, वही स्वयं को वंचित बताकर समाज में असंतोष पैदा करने का प्रयास करते हैं। ऐसे कुतर्क न केवल विकास की राह में बाधक हैं, बल्कि राष्ट्रीय एकता की परिकल्पना को भी कमजोर करते हैं। विश्व के किसी भी अन्य देश में ऐसा विरोधाभास और आत्मघाती विमर्श देखने को नहीं मिलता, जैसा वर्तमान में हमारे यहाँ फैलाया जा रहा है।
कठोर दंड की आवश्यकता
सामाजिक समरसता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए अब केवल नसीहत पर्याप्त नहीं है। समय की मांग है कि:
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कानूनी शिकंजा: जातीय या धार्मिक आधार पर भेदभाव को बढ़ावा देने वाले और समाज को बांटने वाले तत्वों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्यवाही का विधान हो।
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दोहरे आचरण पर रोक: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दोहरा मापदंड अपनाने वाले तत्वों पर कानूनी अंकुश लगाना अनिवार्य है।
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उत्तरदायित्व का बोध: किसी भी लोकतंत्र में 'जियो और जीने दो' का सिद्धांत सर्वोपरि होना चाहिए। अधिकारों की आड़ में किसी को भी नफरत फैलाने की आजादी नहीं दी जा सकती।
यदि हमें भारत को एकसूत्र में पिरोकर विकास की नई ऊंचाइयों पर ले जाना है, तो ऐसे विभाजनकारी विमर्श को मान्यता देना बंद करना होगा। मौलिक अधिकारों के साथ-साथ मौलिक कर्तव्यों का निर्वहन ही एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है।

