आस्था की स्वतंत्रता और प्रशासनिक पारदर्शिता: धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन में संतुलन का समय

Freedom of Faith and Administrative Transparency: Time for Balance in the Management of Religious Institutions
 
भारत की पावन भूमि पर स्थित मंदिर और अन्य धार्मिक स्थल केवल पूजा-अर्चना के स्थान नहीं हैं। वे हमारी सहस्राब्दियों पुरानी सांस्कृतिक परंपरा

- भूपेन्द्र गुप्ता

भारत की पावन भूमि पर स्थित मंदिर और अन्य धार्मिक स्थल केवल पूजा-अर्चना के स्थान नहीं हैं। वे हमारी सहस्राब्दियों पुरानी सांस्कृतिक परंपरा, सामाजिक ताने-बाने, इतिहास और जन-आस्था के सबसे महत्वपूर्ण केंद्र हैं। ऐतिहासिक और वर्तमान संदर्भों में देखें, तो इन बड़े मंदिरों और धार्मिक ट्रस्टों के पास हजारों करोड़ रुपये की अचल संपत्ति, विशाल भू-भाग और श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित किए जाने वाले दान (Charity) की एक वृहद् व्यवस्था होती है। ऐसे में समय-समय पर यह यक्ष प्रश्न देश के नीति-नियंत्रकों और बुद्धिजीवियों के सामने उठता रहा है कि—क्या इन विशाल संस्थाओं के वित्तीय और प्रशासनिक प्रबंधन को सुचारू रूप से चलाने के लिए कोई एक समान या पारदर्शी राष्ट्रीय व्यवस्था होनी चाहिए?

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मद्रास एक्ट और शिूर मठ केस: ऐतिहासिक विधिक ढांचा

यदि इतिहास के पन्नों को पलटें, तो विशेषकर दक्षिण भारत में मंदिरों के कुशल प्रशासन के लिए 'हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती' (Hindu Religious and Charitable Endowments - HRCE) कानूनों का निर्माण किया गया था। इन कानूनों का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि देवस्थानों की संपत्तियां भू-माफियाओं या निजी हितों से सुरक्षित रहें, मंदिर की आय का उपयोग जन-कल्याण और धार्मिक कार्यों में सही ढंग से हो, तथा पूरे प्रबंधन में एक जवाबदेही (Accountability) बनी रहे।

साल 1951 के 'मद्रास हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती कानून' के लागू होने के बाद देश में एक विधिक सिद्धांत विकसित हुआ। इस सिद्धांत के तहत यह माना गया कि किसी भी धार्मिक संस्थान की मूल आस्था, पूजा-पद्धति, अनुष्ठानों और परंपराओं में रत्ती भर भी हस्तक्षेप किए बिना, उसके शुद्ध रूप से प्रशासनिक (Administrative) और वित्तीय (Financial) पक्षों को नियमन (Regulation) के दायरे में लाया जा सकता है।

इस विषय पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने ऐतिहासिक 'शिरूर मठ मामले' (Shirur Mutt Case) में स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट किया था। शीर्ष अदालत ने व्यवस्था दी थी कि भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक और समुदाय को धार्मिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार देता है, जिसकी रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है। परंतु, जब बात किसी धार्मिक संस्था के 'धर्मनिरपेक्ष प्रशासन' (Secular Administration) जैसे—संपत्ति के प्रबंधन, आय-व्यय के लेखा-जोखा (Accounting) और वित्तीय ऑडिट की आती है, तो राज्य लोकहित में उसे विनियमित या नियंत्रित कर सकता है। यही कानूनी और संवैधानिक सिद्धांत आज के समय में भी उतना ही प्रासंगिक है।

वर्तमान व्यवस्था की विसंगतियां और राष्ट्रीय मानक की आवश्यकता

वर्तमान समय में भारत के अलग-अलग राज्यों में मंदिर और धार्मिक स्थल भिन्न-भिन्न प्रणालियों के तहत संचालित हो रहे हैं। उदाहरण के लिए:

  • कई राज्यों में सरकार द्वारा संचालित 'देवस्थानम बोर्ड' या श्राइन बोर्ड्स कमान संभाल रहे हैं।

  • कुछ स्थानों पर स्वायत्त या स्वतंत्र निजी ट्रस्ट (Independent Trusts) व्यवस्था देख रहे हैं।

  • कई प्राचीन मंदिरों में आज भी परंपरागत या वंशानुगत प्रबंधन व्यवस्था चल रही है।

प्रबंधन के इस बिखराव और एकरूपता की कमी के कारण अक्सर विभिन्न प्रकार के विवाद न्यायालयों के सामने आते हैं। मंदिरों की मूल्यवान संपत्तियों के हस्तांतरण, गुप्त दान (Anonymous Donations) में पारदर्शिता की कमी, ट्रस्टियों की नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद और बड़े प्रशासनिक निर्णयों में एकतरफा रवैये को लेकर लगातार सवाल उठते रहते हैं।

ऐसे में यह विचार अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या केंद्र सरकार को एक ऐसा व्यापक राष्ट्रीय मॉडल या कानून (National Framework) तैयार करना चाहिए, जो सभी धार्मिक संस्थाओं पर सीधे नियंत्रण या सरकारी आधिपत्य स्थापित करने के बजाय केवल वित्तीय पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही के न्यूनतम मानक (Minimum Standards) तय करे।

धार्मिक स्वतंत्रता बनाम प्रशासनिक पारदर्शिता

इस प्रकार के किसी भी संभावित कानून का प्राथमिक उद्देश्य कभी भी मंदिरों की धार्मिक स्वायत्तता या स्वतंत्रता को सीमित करना नहीं होना चाहिए। मंदिर के भीतर की पूजा-पद्धति क्या होगी, किस धार्मिक परंपरा का पालन किया जाएगा और कौन से आध्यात्मिक निर्णय लिए जाएंगे—यह पूर्ण रूप से संबंधित संतों, पुजारियों और धार्मिक संस्थाओं के अनन्य अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) में ही रहना चाहिए।

लेकिन, इसके समानांतर यह भी उतना ही सच है कि जनता द्वारा दिए जाने वाले दान का हिसाब-किताब, अचल संपत्तियों का सटीक रिकॉर्ड, वार्षिक ऑडिट (Annual Audit), बड़े निवेश और प्रशासनिक नियुक्तियां ऐसी प्रक्रियाएं हैं जिनमें पारदर्शिता का होना सीधे तौर पर सार्वजनिक हित (Public Interest) और देश के कानून से जुड़ा हुआ है।

इस तरह के एक पारदर्शी कानून से हमारी न्यायपालिका (Judiciary) को भी बड़ी राहत मिल सकती है। वर्तमान में अदालतों पर ऐसे मुकदमों का भारी बोझ है, जो मंदिरों के आंतरिक प्रबंधन, चढ़ावे के विवाद और संपत्तियों पर अवैध कब्जों से जुड़े हैं। यदि देश में एक स्पष्ट नियमावली, स्वतंत्र निगरानी तंत्र और पारदर्शी ऑडिट प्रक्रिया पहले से ही कानून द्वारा निर्धारित होगी, तो अदालतों को बार-बार इन प्रशासनिक विवादों में हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

एक आदर्श राष्ट्रीय मॉडल के मुख्य स्तंभ

धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकारों को अक्षुण्ण रखते हुए, एक प्रत्यक्ष सरकारी नियंत्रण के स्थान पर एक 'स्वतंत्र नियामक व्यवस्था' (Independent Regulatory Mechanism) बनाई जा सकती है, जिसके तहत निम्नलिखित बिंदुओं को शामिल किया जा सकता है:

  1. अनिवार्य वार्षिक ऑडिट: देश के सभी बड़े धार्मिक और धर्मार्थ संस्थानों के लिए चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) के माध्यम से वार्षिक वित्तीय ऑडिट अनिवार्य हो।

  2. सार्वजनिक विवरण: आय और व्यय (Income & Expenditure) का विवरण श्रद्धालुओं और जनता के लिए सार्वजनिक डोमेन या वेबसाइट पर उपलब्ध हो।

  3. डिजिटल एसेट रिकॉर्ड: मंदिरों की सभी कीमती जमीनों, आभूषणों और संपत्तियों का एक राष्ट्रीय डिजिटल रिकॉर्ड (Digital Ledger) तैयार किया जाए।

  4. पारदर्शी दान प्रबंधन: ऑनलाइन और ऑफलाइन मिलने वाले दान के लिए रसीद और पारदर्शी बैंकिंग चैनल की व्यवस्था हो।

  5. शिकायत निवारण तंत्र: श्रद्धालुओं और स्थानीय समाज की शिकायतों को सुनने के लिए एक स्वतंत्र और निष्पक्ष शिकायत निवारण मंच हो।

  6. कार्यों का स्पष्ट विभाजन: संस्था के भीतर विशुद्ध धार्मिक/आध्यात्मिक कार्यों और प्रशासनिक/वित्तीय कार्यों के बीच एक स्पष्ट विभाजन रेखा खींची जाए।

बेशक, यह विमर्श भी एक बड़ी संवैधानिक बहस की मांग करता है कि ऐसा पारदर्शी कानून केवल हिंदू मंदिरों तक ही सीमित रहे या देश के सभी धर्मों (जैसे वक्फ बोर्ड, चर्च संस्थाएं आदि) के बड़े धार्मिक संस्थानों पर समान रूप से लागू हो। एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में हर धार्मिक संस्था की गरिमा और स्वतंत्रता का आदर होना चाहिए, लेकिन जहां सार्वजनिक धन और बड़ी संपत्तियां शामिल हों, वहां जवाबदेही से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।

 आस्था और सुशासन एक-दूसरे के पूरक

आज के दौर में जब अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र जैसे राष्ट्रीय और वैश्विक महत्व के धार्मिक स्थलों का पुनरुत्थान हुआ है, तब यह बहस और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। जब करोड़ों लोगों की अगाध श्रद्धा से जुड़े ये महान संस्थान आधुनिक सुशासन, वित्तीय अनुशासन और अचूक पारदर्शिता का सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्तुत करेंगे, तो इससे आम नागरिकों का धार्मिक और प्रशासनिक व्यवस्था, दोनों पर विश्वास और अधिक सुदृढ़ होगा।

आज समय की मांग यह कतई नहीं है कि सरकारें स्वयं आगे बढ़कर मंदिर या अन्य धार्मिक स्थल चलाएं; बल्कि समय की मांग यह है कि हमारी धार्मिक संस्थाएं स्वयं को आधुनिक प्रशासन, वित्तीय शुचिता और सार्वजनिक विश्वास के उच्चतम मानकों पर स्थापित करें। 'आस्था' और 'पारदर्शिता' एक-दूसरे के विरोधी विचार नहीं हैं, बल्कि वे एक-दूसरे के पूरक हैं। एक संतुलित और दूरदर्शी राष्ट्रीय कानून इसी दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है, जो मंदिरों की सदियों पुरानी गरिमा को भी बनाए रखेगा, श्रद्धालुओं के भरोसे को भी बढ़ाएगा और न्यायपालिका को भी अनावश्यक विवादों से मुक्त रखेगा।

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