बूथ कैप्चरिंग से SIR तक: भारतीय चुनाव व्यवस्था में बदलाव की लंबी यात्रा

From Booth Capturing to SIR: The Long Journey of Change in the Indian Electoral System
 
, जब चुनाव का नाम आते ही बूथ कैप्चरिंग, हिंसा, फर्जी मतदान और मतपेटियों की लूट जैसी खबरें सुर्खियों में रहती

(डॉ. राघवेन्द्र शर्मा-विभूति फीचर्स)

भारतीय लोकतंत्र के चुनावी इतिहास में एक दौर ऐसा भी रहा है, जब चुनाव का नाम आते ही बूथ कैप्चरिंग, हिंसा, फर्जी मतदान और मतपेटियों की लूट जैसी खबरें सुर्खियों में रहती थीं। मतदान केंद्रों पर कब्जा कर मतदाताओं को वोट डालने से रोकना, मतदान कर्मियों को धमकाना और बड़ी संख्या में फर्जी मतदान कराना उस दौर की गंभीर चुनावी चुनौतियों में शामिल था।

कई स्थानों पर वास्तविक मतदाताओं का मतदान केंद्र तक पहुंचना मुश्किल बना दिया जाता था। उनके स्थान पर राजनीतिक संरक्षण प्राप्त अपराधी फर्जी मतदान करते थे। कहीं मतपेटियां लूट ली जाती थीं तो कहीं मतपत्रों को नष्ट कर दिया जाता था। इस तरह की घटनाओं ने लंबे समय तक लोकतांत्रिक व्यवस्था की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े किए।

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1957 से शुरू हुई बूथ कैप्चरिंग की चर्चित कहानी

भारत में बूथ कैप्चरिंग की शुरुआती चर्चित घटनाओं में 1957 के आम चुनाव के दौरान बिहार के बेगूसराय जिले के मटिहानी विधानसभा क्षेत्र के रचियाही गांव की घटना का उल्लेख किया जाता है। उस समय कांग्रेस के सरयुग प्रसाद सिंह और कम्युनिस्ट पार्टी के चंद्रशेखर सिंह के बीच मुकाबला था। आरोप है कि स्थानीय बाहुबली कामदेव सिंह अपने हथियारबंद समर्थकों के साथ मतदान केंद्र पर पहुंचा और विरोधी समर्थकों को मतदान से रोकते हुए मतपेटियों पर कब्जा कर लिया। बाद में मतपेटियों को कुएं में फेंक दिए जाने की बात भी सामने आई थी।

इस तरह की घटनाओं ने अपराध और चुनावी राजनीति के बीच बढ़ते गठजोड़ की गंभीर तस्वीर सामने रखी। 1970 और 1980 के दशक में कई क्षेत्रों में चुनावों के दौरान हथियारबंद समूहों द्वारा मतदान केंद्रों पर दबाव बनाने और मतदान प्रक्रिया को प्रभावित करने की शिकायतें बढ़ीं। मतदान अधिकारियों को धमकाने, मतपेटियों पर कब्जा करने और फर्जी मतदान जैसी घटनाओं ने चुनाव आयोग के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी।

चुनावी हिंसा पर सख्ती की शुरुआत

बूथ कैप्चरिंग और चुनावी हिंसा पर अंकुश लगाने के लिए चुनावी कानूनों में भी बदलाव किए गए। 1989 में जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन के जरिए बूथ कैप्चरिंग को गंभीर चुनावी अपराध के दायरे में लाया गया। मतदान केंद्र पर कब्जे या मतदान प्रक्रिया को जबरन प्रभावित किए जाने की स्थिति में मतदान रद्द कर पुनर्मतदान कराने की व्यवस्था को भी मजबूत किया गया।

इसके बाद 1990 में टी.एन. शेषन के मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के बाद चुनाव प्रक्रिया में अनुशासन और निगरानी को लेकर कई कड़े कदम उठाए गए। संवेदनशील क्षेत्रों में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ी और चुनाव कई चरणों में कराने की व्यवस्था को व्यापक रूप मिला। मतदाता पहचान पत्र की व्यवस्था ने भी मतदान प्रक्रिया में फर्जीवाड़े की संभावनाओं को कम करने में भूमिका निभाई।

EVM से बदली मतदान की तस्वीर

कागजी मतपत्रों के दौर में बड़ी संख्या में मतपत्रों पर एक साथ मुहर लगाकर फर्जी मतदान करना अपेक्षाकृत आसान था। इसी चुनौती के बीच भारत में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल बढ़ा और धीरे-धीरे देश की चुनाव प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

ईवीएम के इस्तेमाल ने मतदान प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित और तेज बनाने में मदद की। इसके साथ सुरक्षा बलों की तैनाती, सीसीटीवी निगरानी और अन्य तकनीकी उपायों ने मतदान केंद्रों की निगरानी को भी मजबूत किया। बूथ पर कब्जे और सामूहिक फर्जी मतदान की पुरानी घटनाएं आज पहले की तुलना में बेहद दुर्लभ दिखाई देती हैं।

अब चुनौती मतदाता सूची की शुद्धता की

चुनावी व्यवस्था में एक चुनौती के कम होने के बाद मतदाता सूची की शुद्धता और अद्यतन स्थिति का प्रश्न महत्वपूर्ण हो गया। लंबे समय तक मतदाता सूचियों के नियमित सत्यापन और संशोधन की जरूरत महसूस की जाती रही। मृत व्यक्तियों के नाम, दूसरे स्थानों पर जा चुके मतदाताओं के पुराने विवरण और अन्य प्रकार की विसंगतियां मतदाता सूची की विश्वसनीयता से जुड़ा सवाल बनती रही हैं।

इसी संदर्भ में SIR यानी Special Intensive Revision (विशेष गहन पुनरीक्षण) जैसी प्रक्रियाओं को मतदाता सूची के व्यापक सत्यापन और सुधार के उपाय के रूप में देखा जा रहा है। इसका उद्देश्य पात्र मतदाताओं के नाम सुनिश्चित करना और अपात्र या गलत प्रविष्टियों की पहचान करना है।

हालांकि, मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद भी सामने आते रहे हैं। एक पक्ष इसे चुनावी सूची को अधिक शुद्ध और विश्वसनीय बनाने की प्रक्रिया मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इसके क्रियान्वयन, दस्तावेजी आवश्यकताओं और संभावित रूप से छूट जाने वाले पात्र मतदाताओं को लेकर सवाल उठाता है। ऐसे में इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता, स्पष्ट नियम और पात्र नागरिकों के लिए प्रभावी आपत्ति एवं सुधार व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

लोकतंत्र की असली कसौटी निष्पक्ष चुनाव

भारतीय चुनाव व्यवस्था ने बूथ कैप्चरिंग और हिंसक चुनावी तौर-तरीकों से लेकर तकनीक आधारित मतदान और मतदाता सूची के व्यापक पुनरीक्षण तक लंबी यात्रा तय की है। इस यात्रा का मूल उद्देश्य एक ही रहा है—हर पात्र नागरिक का मत सुरक्षित रहे और चुनावी जनादेश निष्पक्ष तरीके से सामने आए।

आज आवश्यकता इस बात की है कि चुनाव सुधारों पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर तथ्य, पारदर्शिता और संस्थागत विश्वसनीयता को प्राथमिकता दी जाए। ईवीएम हो या मतदाता सूची का पुनरीक्षण, हर व्यवस्था के प्रति जनता का विश्वास तभी मजबूत होगा, जब प्रक्रिया स्पष्ट, सत्यापन योग्य और सभी पक्षों के लिए समान रूप से विश्वसनीय हो।

लोकतंत्र केवल मतदान का अधिकार नहीं, बल्कि उस अधिकार की निष्पक्ष सुरक्षा का भी नाम है। बूथ कैप्चरिंग के दौर से लेकर आधुनिक चुनावी तकनीक और मतदाता सूची के पुनरीक्षण तक की यात्रा इसी लोकतांत्रिक शुद्धिकरण की निरंतर प्रक्रिया को दर्शाती है।

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