कोष से कल्याण तक: मध्य प्रदेश बजट में सुशासन का शास्त्रीय सूत्र
(राहुल कोठारी — विनायक फीचर्स) ‘कोषमूलो हि धर्मश्च राज्यं चापि प्रतिष्ठितम्’ — Mahabharata के शांतिपर्व का यह श्लोक बताता है कि राज्य और धर्म, दोनों का आधार सुदृढ़ कोष है। यह केवल प्राचीन राजधर्म का दार्शनिक सूत्र नहीं, बल्कि आधुनिक शासन-व्यवस्था का भी शाश्वत मार्गदर्शक सिद्धांत है। जिस राज्य का राजकोष सुदृढ़, अनुशासित और दूरदर्शी हो, वही सुशासन, सामाजिक न्याय और आर्थिक समृद्धि का स्थायी प्रतिमान स्थापित कर सकता है।
मध्यप्रदेश का 2026–27 का 4.38 लाख करोड़ रुपये का बजट इसी शास्त्रीय दर्शन की समकालीन अभिव्यक्ति है। मुख्यमंत्री Mohan Yadav के नेतृत्व में प्रस्तुत यह बजट विकास की व्यापक दृष्टि का घोषणापत्र प्रतीत होता है, जिसमें आर्थिक अनुशासन, सामाजिक संवेदनशीलता और निवेशोन्मुख नीति का संतुलित समन्वय दिखाई देता है।
विराट आकार, व्यापक दृष्टि और आर्थिक आत्मविश्वास
4,38,317 करोड़ रुपये का यह बजट राज्य की आर्थिक क्षमता और प्रशासनिक आत्मविश्वास का उद्घोष है। यह विस्तार केवल व्यय वृद्धि नहीं, बल्कि सुदृढ़ राजस्व आधार और वित्तीय अनुशासन का संकेत देता है। राजकोषीय घाटे को नियंत्रित रखते हुए पूंजीगत व्यय में वृद्धि करना विकास और संतुलन के सामंजस्य का परिचायक है।
Arthashastra का सूत्र स्मरणीय है— ‘कोषपूर्वाः सर्वारम्भाः’ अर्थात सभी कार्यों का प्रारंभ कोष से होता है। जब कोष सशक्त होता है, तभी योजनाओं को गति और स्थायित्व मिलता है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इसी सिद्धांत को व्यवहार में परिणत करते हुए पहले आर्थिक आधार को मजबूत किया और फिर योजनाओं का विस्तार सुनिश्चित किया।
कर नीति में संतुलन और संवेदनशीलता
Manusmriti का प्रसिद्ध श्लोक आज भी प्रासंगिक है—
‘यथा मधु समादत्ते रक्षन् पुष्पाणि षट्पदः,
तद्वद् राज्ञा समादेयं राष्ट्राद् बलिमदुःखितम्।’
जैसे मधुमक्खी फूलों को क्षति पहुँचाए बिना मधु ग्रहण करती है, वैसे ही शासक को प्रजा से कर लेना चाहिए, बिना उन्हें कष्ट दिए। मध्यप्रदेश की कर नीति इसी संतुलन का परिचय देती है। डिजिटलीकरण, पारदर्शिता और कर प्रशासन में सुधार के माध्यम से राजस्व वृद्धि पर बल दिया गया है, बिना करदाताओं पर अतिरिक्त बोझ डाले। इससे निवेश-अनुकूल वातावरण निर्मित होता है और नागरिकों का विश्वास सुदृढ़ होता है।
लाड़ली बहना: आर्थिक स्वाभिमान का विस्तार
‘लाड़ली बहना’ योजना के अंतर्गत लाखों महिलाओं को प्रतिमाह आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है, जो इस वित्तीय वर्ष भी जारी रहेगी। यह पहल महिला सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम है।
इसके प्रभाव बहुआयामी हैं—
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परिवारों की आय-संरचना में स्थिरता
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ग्रामीण बाजारों में क्रय-शक्ति की वृद्धि
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आर्थिक निर्णयों में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी
यह केवल आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि सामाजिक सम्मान की स्थापना है।
किसान खुशहाल: अन्नदाता का सुदृढ़ीकरण
Mahabharata में कहा गया है—
‘अर्थो हि मूलं पुरुषार्थानाम्’
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चार पुरुषार्थों में ‘अर्थ’ आधार है। कृषि प्रधान राज्य में अर्थ का मूल स्रोत किसान है। बजट में सिंचाई विस्तार, फसल बीमा सुदृढ़ीकरण, समर्थन मूल्य व्यवस्था और कृषि यंत्रीकरण जैसे प्रावधान किसानों की आय और उत्पादन क्षमता को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। किसान की समृद्धि राज्य की समग्र आर्थिक संरचना को मजबूत करती है।
पूंजीगत व्यय: दीर्घकालिक विकास की आधारशिला
सड़क, पुल, औद्योगिक कॉरिडोर, जल संसाधन और नगरीय अधोसंरचना में निवेश पर विशेष बल दिया गया है।
Chanakya की नीति प्रासंगिक है—
‘तस्मान्नित्योत्थितो राजा कुर्यादर्थानुशासनम्।’
अर्थात शासक को निरंतर उद्यमशील रहकर अर्थव्यवस्था का अनुशासन करना चाहिए। अधोसंरचना में निवेश रोजगार सृजन, औद्योगिक विस्तार और निवेश आकर्षण को गति देता है।
समावेशी विकास की परिकल्पना
गरीब, युवा, अन्नदाता और नारी—इन चार वर्गों को केंद्र में रखकर विकास की रूपरेखा तैयार की गई है। सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ, कौशल विकास, कृषि समर्थन और महिला सशक्तिकरण—यह संतुलित चतुर्भुज मॉडल समावेशी विकास का संकेत देता है।
शास्त्रीय सिद्धांतों का आधुनिक अनुप्रयोग
महाभारत, मनुस्मृति और अर्थशास्त्र में वर्णित राजकोषीय सिद्धांत आज भी प्रासंगिक हैं। सुदृढ़ कोष से सुशासन संभव है; संतुलित कर नीति से प्रजा संतुष्ट रहती है; आर्थिक अनुशासन से समृद्धि आती है। मध्यप्रदेश का यह बजट इन सिद्धांतों का आधुनिक रूपांतरण प्रस्तुत करता है—जहाँ बहना निहाल है, किसान खुशहाल है, युवा आशावान है और उद्योगों को खुला आकाश प्राप्त है।
अंततः—
‘कोषमूलो हि धर्मश्च राज्यं चापि प्रतिष्ठितम्।’
यह शाश्वत वाक्य आज भी सत्य है, और मध्यप्रदेश का यह बजट उसी सत्य का समकालीन प्रमाण प्रस्तुत करता है।

