सुकुमार सेन के दौर से SIR तक: बदलती प्राथमिकताएं और बढ़ती चुनौतियां

मतदाता सूची की शुद्धता के साथ हर पात्र नागरिक के मताधिकार की रक्षा भी जरूरी

 
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विशंकर कुमार चौधरी — विनायक फीचर्स

भारत के चुनावी इतिहास में दो तस्वीरें लोकतंत्र की प्राथमिकताओं और चुनौतियों पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। पहली तस्वीर उस दौर की है, जब देश के पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुकुमार सेन के सामने विभाजन की त्रासदी, विस्थापन, गरीबी और व्यापक निरक्षरता से जूझते भारत में आम चुनाव कराने की चुनौती थी। दूसरी तस्वीर आज की है, जब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) के दौरान नागरिकों की पात्रता, दस्तावेजों के सत्यापन और मतदाता सूची से नाम छूटने की आशंकाओं को लेकर बहस जारी है।

इन दोनों परिस्थितियों के बीच सात दशक से अधिक का अंतर है। देश की प्रशासनिक व्यवस्था, तकनीक और कानूनी प्रक्रियाएं काफी बदल चुकी हैं, लेकिन लोकतंत्र की मूल कसौटी आज भी वही है—हर पात्र नागरिक को मतदान का वास्तविक अवसर मिलना।

सार्वभौमिक मताधिकार: भारतीय लोकतंत्र की ऐतिहासिक नींव

स्वतंत्रता के समय भारत के सामने केवल संविधान बनाने और शासन व्यवस्था स्थापित करने की चुनौती नहीं थी। विभाजन के कारण लाखों लोग विस्थापित हो चुके थे, अनेक रियासतों का भारत में विलय हो रहा था, गरीबी व्यापक थी और शिक्षा का प्रसार सीमित था। इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद संविधान निर्माताओं ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद बनाया।

संविधान के अनुच्छेद 326 में निर्धारित सिद्धांत का मूल भाव यही था कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी का अधिकार संपत्ति, शिक्षा, सामाजिक हैसियत या लिंग के आधार पर सीमित नहीं किया जाना चाहिए। नागरिक की आर्थिक स्थिति और शैक्षणिक योग्यता उसके राजनीतिक अधिकारों के आड़े नहीं आनी चाहिए।

पहले आम चुनाव की जिम्मेदारी देश के प्रथम मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुकुमार सेन को सौंपी गई। 1951-52 के आम चुनाव के लिए लगभग 17.2 करोड़ मतदाताओं की सूची तैयार करना और विशाल भौगोलिक क्षेत्र में चुनाव कराना अपने आप में अभूतपूर्व प्रशासनिक कार्य था। उस समय न आज जैसी डिजिटल तकनीक उपलब्ध थी और न ही नागरिकों के पहचान संबंधी दस्तावेजों का व्यापक तंत्र।

ऐसे में मतदाता सूची तैयार करने के लिए स्थानीय स्तर पर जानकारी जुटाने, नागरिकों तक पहुंचने और व्यापक प्रशासनिक समन्वय की जरूरत थी। सुकुमार सेन और उनकी टीम ने इस चुनौती का सामना किया। पहले आम चुनाव ने यह सिद्ध किया कि गरीबी, निरक्षरता और सामाजिक विषमता के बावजूद भारत के नागरिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने में सक्षम हैं।

इस ऐतिहासिक अनुभव का एक महत्वपूर्ण सबक यह है कि लोकतंत्र की सफलता के लिए नागरिकों पर भरोसा करना और उनकी वास्तविक परिस्थितियों को समझना आवश्यक है। केवल प्रशासनिक नियम बना देना पर्याप्त नहीं; उन नियमों के माध्यम से नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

मतदाता सूची की शुद्धता और मताधिकार की सुरक्षा

मतदाता सूची में नाम दर्ज होना चुनाव में भागीदारी की पहली शर्त है। यदि कोई पात्र नागरिक सूची में शामिल नहीं है, तो उसका मताधिकार व्यवहार में निष्प्रभावी हो सकता है। इसलिए मतदाता सूची की शुद्धता जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी यह सुनिश्चित करना भी है कि पुनरीक्षण के दौरान किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से न छूट जाए।

निर्वाचन आयोग के सामने दोहरी जिम्मेदारी है। उसे मृत व्यक्तियों के नाम, दोहरी प्रविष्टियों और अन्य अपात्र प्रविष्टियों की पहचान करनी है। साथ ही, प्रत्येक पात्र नागरिक के मताधिकार की रक्षा भी करनी है। निष्पक्ष पुनरीक्षण की कसौटी इन दोनों उद्देश्यों के बीच संतुलन कायम करना है।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। मतदाता सूची को दुरुस्त करना और किसी पात्र मतदाता को सूची से बाहर कर देना एक ही बात नहीं है। इसी तरह, किसी नाम का मसौदा सूची में शामिल न होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि संबंधित व्यक्ति का नाम अंतिम सूची से भी हटा दिया गया है। फिर भी, यदि किसी पात्र नागरिक का नाम छूट जाता है, तो उसके पास सुधार, दावा और अपील की सुलभ, पारदर्शी तथा समयबद्ध व्यवस्था होनी चाहिए।

बिहार में SIR और उठे सवाल

जून 2025 में निर्वाचन आयोग ने बिहार से शुरू होने वाली विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के लिए निर्देश जारी किए। इस प्रक्रिया के तहत मतदाताओं के विवरण का नए सिरे से सत्यापन किया गया। निर्धारित समय में गणना प्रपत्र वापस नहीं पहुंचने सहित विभिन्न कारणों से कुछ मतदाताओं के नाम मसौदा सूची में शामिल नहीं हो सके।

बिहार में 24 जून 2025 की मतदाता सूची में लगभग 7.89 करोड़ मतदाता दर्ज थे। निर्वाचन आयोग की ओर से प्रस्तुत विवरण के अनुसार, 1 अगस्त 2025 को प्रकाशित मसौदा सूची में करीब 7.24 करोड़ मतदाता शामिल थे। इस तरह लगभग 65 लाख नाम मसौदा सूची में नहीं थे।

14 अगस्त 2025 को सर्वोच्च न्यायालय ने सूची से बाहर रह गए मतदाताओं की सूची और नाम शामिल न किए जाने के कारण सार्वजनिक करने का निर्देश दिया। बाद में न्यायालय ने दावों के साथ आधार कार्ड प्रस्तुत करने की अनुमति देने का निर्देश भी दिया।

इन आंकड़ों के संदर्भ में बहस केवल नामों की संख्या तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। असली सवाल यह है कि सूची से बाहर रह गए प्रत्येक पात्र नागरिक को अपनी बात रखने का वास्तविक अवसर मिला या नहीं। क्या उसे समय पर सूचना मिली? क्या उसके लिए जरूरी दस्तावेज जुटाना आसान था? क्या दावा और आपत्ति दर्ज करने की प्रक्रिया ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों, गरीबों, बुजुर्गों, प्रवासियों और वंचित नागरिकों के लिए सुलभ थी?

इन सवालों को उठाना निर्वाचन आयोग की मंशा पर बिना प्रमाण आरोप लगाना नहीं है। ये लोकतांत्रिक प्रक्रिया की गुणवत्ता और नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा से जुड़े बुनियादी प्रश्न हैं।

दस्तावेजों के सत्यापन में संवेदनशीलता जरूरी

निर्वाचन आयोग का दायित्व मतदाता सूची को अद्यतन रखना और अपात्र प्रविष्टियों को हटाना है। लेकिन प्रशासनिक शुद्धता का उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब पात्र नागरिकों के नाम सुरक्षित रहें और किसी त्रुटि को सुधारने के लिए प्रभावी व्यवस्था उपलब्ध हो। मतदाता सूची की शुद्धता और मताधिकार की सुरक्षा एक-दूसरे के विरोधी लक्ष्य नहीं, बल्कि निष्पक्ष चुनाव व्यवस्था के दो अनिवार्य आधार हैं।

आधुनिक प्रशासन में पहचान और पात्रता का सत्यापन आवश्यक हो सकता है। हालांकि, दस्तावेजों की मांग करते समय यह भी ध्यान रखना होगा कि संबंधित नागरिक के पास उन्हें उपलब्ध कराने की क्षमता और पर्याप्त अवसर है या नहीं।

भारत में आज भी ऐसे लोग हैं जिनके नाम, पते और पारिवारिक विवरण पुराने अभिलेखों से मेल नहीं खाते। विस्थापन, पलायन, विवाह के बाद स्थान परिवर्तन, नामों की वर्तनी में अंतर और पुराने दस्तावेजों की अनुपलब्धता जैसी परिस्थितियां सत्यापन की प्रक्रिया को जटिल बना सकती हैं।

ऐसे मामलों में प्रशासन को केवल कागजात के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय वैकल्पिक सत्यापन उपायों, उचित सूचना और सुनवाई की व्यवस्था पर भी ध्यान देना चाहिए। किसी पात्र नागरिक को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर दिए बिना उसके विरुद्ध प्रतिकूल निर्णय लिया जाता है, तो यह प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि दस्तावेजों की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। आवश्यकता ऐसी प्रक्रिया की है, जो गलत प्रविष्टियों की पहचान भी करे और वास्तविक मतदाताओं को अनावश्यक कठिनाइयों से भी बचाए।

पारदर्शिता से मजबूत होगा लोकतांत्रिक विश्वास

भारतीय लोकतंत्र की शक्ति केवल नियमित चुनाव कराने में नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया में जनता का विश्वास बनाए रखने में भी निहित है। निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है। उसकी स्वतंत्रता जितनी महत्वपूर्ण है, उसकी पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक है।

जब मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर व्यापक सवाल उठते हैं, तब आयोग को स्पष्ट आंकड़ों, सार्वजनिक कारणों और प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था के माध्यम से उनका उत्तर देना चाहिए। राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी भी है कि वे प्रमाणों के आधार पर अपनी आपत्तियां दर्ज करें और पात्र मतदाताओं को जरूरी सहायता उपलब्ध कराएं। वहीं, न्यायपालिका यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है कि कानूनी प्रक्रिया के साथ नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा भी हो।

सुकुमार सेन के नेतृत्व में हुए पहले आम चुनाव और आज के एसआईआर की तुलना करते समय ऐतिहासिक परिस्थितियों के अंतर को ध्यान में रखना आवश्यक है। सात दशक पहले की प्रशासनिक व्यवस्था और वर्तमान की कानूनी तथा तकनीकी प्रणाली एक जैसी नहीं हैं। इसलिए उस दौर की हर प्रक्रिया को आज पर हूबहू लागू करना संभव नहीं है। फिर भी, उस समय से मिले लोकतांत्रिक सबक आज भी प्रासंगिक हैं—व्यापक जनभागीदारी, प्रशासनिक निष्पक्षता और नागरिकों के मताधिकार के प्रति संवेदनशीलता।

पहले आम चुनाव ने दुनिया को दिखाया कि भारत जैसा विशाल और विविधतापूर्ण देश सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर लोकतांत्रिक व्यवस्था चला सकता है। यह उपलब्धि केवल चुनाव कराने वाले अधिकारियों की नहीं थी, बल्कि उन करोड़ों नागरिकों की भी थी, जिन्होंने पहली बार लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लिया।

आज चुनौती का स्वरूप बदल गया है, लेकिन जिम्मेदारी उतनी ही बड़ी है। निर्वाचन आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि मतदाता सूची की शुद्धता के प्रयास में किसी पात्र नागरिक का अधिकार अनजाने में भी बाधित न हो। सरकारों और राजनीतिक दलों को भी अपने दावों और आपत्तियों को प्रमाणों के आधार पर प्रस्तुत करना चाहिए।

सुकुमार सेन के दौर की ऐतिहासिक विरासत को याद करने का उद्देश्य न तो अतीत का महिमामंडन करना है और न ही वर्तमान की हर प्रक्रिया को खारिज करना। इसका उद्देश्य लोकतंत्र की मूल भावना को समझना है।

मतदाता सूची केवल नामों का सरकारी रजिस्टर नहीं, बल्कि नागरिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था के बीच विश्वास का दस्तावेज है। इसलिए निर्वाचन आयोग के सामने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने दस्तावेज जुटाए गए या कितने नाम हटाए गए। असली कसौटी यह है कि क्या प्रत्येक पात्र भारतीय को अपना मताधिकार सुरक्षित रखने और उसका इस्तेमाल करने का वास्तविक अवसर मिला?

लोकतंत्र की मजबूती का आकलन इसी कसौटी पर होना चाहिए।

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