विद्रोही जी की कलम से: संघर्ष की कोख से उपजा एक अदम्य कवि-मन
आत्मीय परिजनों, स्नेही मित्रों एवं बाल-गोपाल सहित आप सभी सपरिवार को सादर प्रणाम एवं सुप्रभात!
आज कालचक्र का एक बेहद खूबसूरत संधिकाल है। ज्येष्ठ और आषाढ़ के इस पात्र में, जून का यह अंतिम शनिवार अपने साथ एक अनूठा आध्यात्मिक संयोग लेकर आया है। न्याय के देवता शनिदेव का यह साप्ताहिक दिवस है, लेकिन आज का दिन संकटमोचन हनुमान जी की आराधना के बिना अधूरा है। सृष्टि के प्रारंभ से लेकर आज तक, यदि किसी ने शनिदेव के परम अहंकार को तोड़ा है, तो वह केवल पवनपुत्र हनुमान जी हैं। इस पौराणिक प्रसंग पर आधारित मेरे लिखे दो विशेष छंद आपने इसी मंच पर पहले भी पढ़े होंगे। यदि स्मृतियाँ धुंधली हो गई हों, तो तनिक प्रतीक्षा करें, अगले शनिवार को उन्हें पुनः आपके समक्ष जीवंत करूँगा।
जीवन का पड़ाव: 73वां अकादमिक वर्ष
आगामी 30 जून को जीवन के सफरनामा में एक और पन्ना जुड़ने जा रहा है। यह आपके इस 'विद्रोही' कवि का 73वां अकादमिक जन्मदिन है। यद्यपि, काल-गणना और वास्तविकता के अनुसार मेरा वास्तविक जन्म भाद्रपद कृष्ण जन्माष्टमी से ठीक एक दिन पूर्व, स्वामी कार्तिकेय जयंती के पावन अवसर पर हुआ था।
गोंडा के पुलिस अधीक्षक श्रीमान विनीत जायसवाल (IPS) की धर्मपत्नी, विदुषी प्रोफेसर डॉ. तन्वी जायसवाल जी के साथ यूट्यूब पर साझा किए गए मेरे साक्षात्कार को आप में से कई मित्रों ने सुना और सराहा है। उस संवाद में मैंने अपने अस्तित्व को रेखांकित करते हुए कहा था:
"मैं भूख-प्यास की कोख रहा, आंसू से सींचा गया सदा, मैं हूं पीड़ा का अमर पुत्र, जो पाला गया अभावों में..."
इन स्मृतियों को एक बार फिर ताजा करने के लिए आप यूट्यूब पर जाकर उस साक्षात्कार को पुनः सुन सकते हैं।
मंचीय स्मृतियाँ: काव्य-साधना का एक अनसुना अंतरा
मेरे जीवन के कड़वे मगर शाश्वत सत्यों को बयां करती इस दीर्घ मंचीय कविता के दो अंतरे आप उस साक्षात्कार में सुन चुके हैं। आज, उसी अमर रचना का अगला भाग आपकी सेवा में सादर समर्पित कर रहा हूँ। यह पंक्तियाँ मेरे कॉलेज के दिनों (स्नातक काल) की हैं, जिसने उस दौर के मंचों पर मुझे एक युवा पहचान दी थी:
॥ मूल कविता ॥
नौ रस के सागर में तिरती, जीवन-नौका उस पार कहां? धारा से लड़ती सांसों की, गति की टूटे पतवार जहां। रस्सी-खूंटी से भले अजस्र, प्रवाह रोकते तुम आए, पर मुझे महासागर के वक्ष, चूमना था मैं आज वहां।
असतो मा तमसो मा सद्गमय, मृत्यु तक अमृत खोज मुझको, तुम रहे हमारी घातों में, मैं रहा स्वयं के भावों में। वाणी के यज्ञों में मेरी हवि, प्रबल आग के अक्षर की, करना अरण्य रोदन मुझको, आया न कभी कविताओं में।
मैं दुश्मन के मुंह पर ताला हूं, अपनेपन में मतवाला, मेरी फौलादी छाती से, भयभीत रहा बर्छा-भाला। मैं प्रहरी हूं जागरण गीत, गाने निकला शिर कफ़न बांध, खण्डित पौरुष का मोर नहीं, केशों की सघन घटाओं में।
मैं भूख-प्यास की कोख रहा, आंसू से सींचा गया सदा, मैं हूं पीड़ा का अमर पुत्र, जो पाला गया अभावों में। वाणी के यज्ञों में मेरी हवि, प्रबल आग के अक्षर की, करना अरण्य रोदन मुझको, आया न कभी कविताओं में।
कवि की कलम से (नोट):
मेरे अज़ीज़ दोस्तों, यह काव्य-पाठ लगभग 15-16 मिनट की एक लंबी मंचीय प्रस्तुति है, जो मेरे शुरुआती संघर्षों और साहित्यिक यात्रा की नींव है। अभावों ने कभी इस विद्रोही स्वर को कमजोर नहीं होने दिया, बल्कि अक्षरों को आग जैसी शक्ति दी।
श्री हरि ऊं नमः शिवाय।
