गुढ़ियारी के तंबू से फ्रांस के मंच तक: पंडवानी को विश्व पटल पर अमर करने वाली तीजन बाई की अनसुनी दास्तान
विशेष संस्मरण और कला यात्रा:
साल 1978 की सर्द दिसंबर का वह आखिरी हफ्ता था। रायपुर रेलवे स्टेशन के दूसरी तरफ बसी एक साधारण सी बस्ती 'गुढ़ियारी' में रिहाइश जहां खत्म होती थी, वहीं एक तालाब के किनारे बांस की बल्ली पर तिकोना तंबू गड़ा था। रोशनी के नाम पर एक लालटेन टंगी थी और भीतर बिखरा था एक टिन का बक्सा, मिट्टी का अस्थायी चूल्हा और थोड़े-बहुत साधारण सौंदर्य प्रसाधन। वहीं चारपाई के सहारे टिका था एक तंबूरा।
यहtemporary डेरा था पांच फीट से कुछ इंच ऊपर कद वाली, श्यामल रंगत और अद्भुत आत्मविश्वास से लबरेज एक छत्तीसगढ़िया महिला का, जिनकी आंखों की चमक और बेबाकी किसी को भी सम्मोहित कर सकती थी। चटख लाल साड़ी, बेमेल ब्लाउज, चांदी के पारंपरिक आभूषण और पान के रंग से रचे होंठ—यह तीजन बाई से पहली मुलाकात का वो ऐतिहासिक मंजर था, जब लोककला मर्मज्ञ निरंजन महावर के सहयोग से उनका एक विशेष इंटरव्यू लिया गया था। उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि आकाशवाणी के पहले चेक पर दस्तखत की जगह अंगूठा लगाने वाली यह निरक्षर महिला एक दशक के भीतर वैश्विक सेलिब्रिटी बन जाएगी।
संघर्षों की भट्टी में तपा बचपन और विरासत
तीजन बाई का जन्म इस्पात नगरी भिलाई से महज 14 किलोमीटर दूर गनियारी गांव में हुआ था। पारधी जाति (एक अंत्यज और घुमंतू समुदाय) से ताल्लुक रखने वाली तीजन पांच भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं। उनके समाज का मुख्य पेशा झाड़ू, चटाई और टोकरी बनाना था। जब उन्होंने परंपराओं को तोड़कर जात-बाहर विवाह किया, तो उन्हें समाज से निष्कासित कर दिया गया, जिसके बाद गांव के बाहर झोपड़ी बनाकर रहना पड़ा। लेकिन प्रकृति ने उनके भाग्य में कुछ और ही लिखा था।
नाना से मिली पंडवानी की दीक्षा: तीजन बाई को पंडवानी की कला अपने ननिहाल से विरासत में मिली। उनके नाना बृजलाल पारधी पंडवानी गाते थे, जिन्हें सुन-सुनकर बालपन में ही तीजन को पूरी कथा कंठस्थ हो गई। महज 13 साल की उम्र में चंदखुरी गांव में उन्हें पहली बार मंच मिला, जहां मानदेय के रूप में मिले 10 रुपये उनकी पहली कमाई बने।
वर्जनाओं को तोड़ा और चुनी 'कापालिक शैली'
एक स्त्री और वह भी पारधी समुदाय से, उसका पवित्र महाभारत कथा का वाचन करना उस दौर के रूढ़िवादी समाज को रास नहीं आया। सामाजिक बहिष्कार, लांछन और पारिवारिक प्रताड़ना का लंबा दौर चला, लेकिन भगवान कृष्ण में अटूट आस्था और तीजन के हठ ने घुटने नहीं टेके।
पंडवानी मूल रूप से पुरुषों के वर्चस्व का क्षेत्र था, जहां बैठकर शांत भाव से गाए जाने वाली 'वेदमती शैली' का चलन था। लेकिन तीजन बाई ने इसके विपरीत 'कापालिक शैली' को चुना। इस शैली में कलाकार खड़े होकर, पूरे आंगिक अभिनय और नृत्य के साथ महाभारत की गाथा सुनाता है। हाथ में पकड़ा मोरपंख जड़ा तंबूरा कभी अर्जुन का गांडीव धनुष बन जाता, तो कभी भीम की गदा। बुलंद आवाज, तीव्र पदाघात और मंच पर नाटकीयता के अद्भुत निर्वाह (विशेषकर दुशासन वध और द्रौपदी चीरहरण प्रसंग) ने उन्हें बेजोड़ बना दिया।
हबीब तनवीर की पारखी नजर और वैश्विक उड़ान
अस्सी के दशक में प्रख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर की नजर इस विलक्षण प्रतिभा पर पड़ी और तीजन बाई की कला को एक नया आकाश मिल गया। वे दिल्ली पहुंचीं, जहां तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने उन्होंने प्रस्तुति दी। इसके बाद तो सरहदें छोटी पड़ गईं।
तीजन बाई ने फ्रांस, जर्मनी, मॉरीशस, तुर्की, रोमानिया, स्विट्जरलैंड, माल्टा और ट्यूनीशिया जैसे देशों की यात्रा की। खासकर फ्रांस उनका पसंदीदा देश रहा, जहां वे कई बार गईं। इस वैश्विक प्रदर्शन का असर उनके व्यक्तिगत जीवन पर भी पड़ा; उन्होंने आधुनिक सौंदर्य प्रसाधनों का उपयोग सीखा। बाद के दिनों में उन्हें तुलसीराम देशमुख के रूप में एक सच्चा जीवनसाथी और सह-कलाकार (हार्मोनियम वादक) मिला, जो उनके दफ्तर (भिलाई इस्पात संयंत्र) तक उन्हें साइकिल पर छोड़ने जाते थे।
सम्मानों का शिखर और 'भारत : एक खोज'
तीजन बाई भले ही ताउम्र निरक्षर रहीं, लेकिन वे जीवन के अनुभवों और लोकचेतना के अक्षरों को बखूबी पढ़ती थीं। उनकी कला यात्रा में पुरस्कारों की एक लंबी फेहरिस्त है:
| वर्ष / पड़ाव | सम्मान / उपलब्धि |
| 1988 | पद्मश्री सम्मान |
| 2003 | पद्मभूषण सम्मान |
| 2019 | पद्मविभूषण सम्मान |
| अन्य प्रमुख पुरस्कार | संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, देवी अहिल्या सम्मान, एम.एस. सुब्बलक्ष्मी शताब्दी पुरस्कार, फुकुओका पुरस्कार (जापान) |
इन पदकों से परे, उनकी एक बड़ी उपलब्धि यह भी थी कि प्रसिद्ध फिल्मकार श्याम बेनेगल ने पंडित जवाहरलाल नेहरू की पुस्तक 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' पर आधारित अपने ऐतिहासिक धारावाहिक 'भारत : एक खोज' में महाभारत के प्रसंगों को जीवंत करने के लिए तीजन बाई को ही चुना था।
लोककला को क्लासिक ऊंचाइयां
तीजन बाई ने हमेशा माना कि यदि वे पढ़ी-लिखी होतीं, तो शायद पंडवानी गायिका न बन पातीं। उनके लिए यह कला सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि कठिन जीवन से मुक्ति का मार्ग और मां सरस्वती की साक्षात कृपा थी। उन्होंने महाभारत के प्रसंगों के माध्यम से समाज को यह संदेश दिया कि नारी का अपमान किसी भी गौरवशाली वंश के विनाश का कारण बन सकता है। तीजन बाई ने लोककला को जो क्लासिक ऊंचाइयां दी हैं, वह भारतीय सांस्कृतिक इतिहास का एक अमिट अध्याय है।
