गांव के मैदान से एशियाई खेलों तक: संजू देवी की कहानी, स्वर्ण के बाद सादगी भरी घर वापसी

भारतीय महिला कबड्डी टीम की जीत में निभाई अहम भूमिका, मुख्यमंत्री ने की 51 लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि की घोषणा
 
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कोरबा। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के केराकछार गांव की रहने वाली संजू देवी ने 2026 एशियाई खेलों में भारतीय महिला कबड्डी टीम के साथ स्वर्ण पदक जीतकर देश और अपने गांव का नाम रोशन किया। गांव के स्थानीय मैदानों से शुरू हुआ उनका सफर एशियाई खेलों के मंच तक पहुंचा और अब उनकी कहानी संघर्ष, प्रतिभा और दृढ़ संकल्प की मिसाल बनकर सामने आई है।

ईरान के खिलाफ खेले गए रोमांचक मुकाबले में भारतीय महिला टीम ने 37-34 से जीत दर्ज कर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इस मुकाबले में संजू देवी ने भी टीम की जीत में अहम भूमिका निभाई।

गांव की मिट्टी से एशियाई मंच तक का सफर

संजू का खेल सफर किसी बड़े खेल प्रशिक्षण केंद्र से नहीं, बल्कि गांव के मैदानों से शुरू हुआ। सीमित संसाधनों के बीच कबड्डी को अपना जुनून बनाने वाली संजू ने लगातार मेहनत और अभ्यास के दम पर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई और आखिरकार भारतीय टीम का हिस्सा बनकर एशियाई खेलों में देश का प्रतिनिधित्व किया।

उनकी उपलब्धि खास इसलिए भी है क्योंकि यह दिखाती है कि छोटे गांवों और कस्बों से निकलने वाली प्रतिभाओं में भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करने की क्षमता है, जरूरत है तो उन्हें सही प्रशिक्षण, संसाधन और अवसर मिलने की।

स्वर्ण जीतकर लौटीं, लेकिन नहीं हुआ बड़ा सार्वजनिक स्वागत

एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने के बाद जब संजू अपने गांव लौटीं तो उनकी घर वापसी बेहद सादगीपूर्ण रही। उनके स्वागत के लिए किसी बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम की खबर सामने नहीं आई। इस बात को लेकर खेल प्रेमियों और सोशल मीडिया पर कई लोगों ने निराशा जताई।बाद में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने संजू देवी को उनकी उपलब्धि के लिए बधाई दी और 51 लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि देने की घोषणा की।

जमीनी खिलाड़ियों को पहचान देने की जरूरत

संजू देवी की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी के स्वर्ण पदक जीतने की कहानी नहीं है। यह उन हजारों खिलाड़ियों की कहानी भी है, जो छोटे शहरों और गांवों में सीमित सुविधाओं के बीच अभ्यास करते हैं और बड़े मंच तक पहुंचने का सपना देखते हैं।संजू की सादगी भरी घर वापसी ने यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि क्या जमीनी स्तर पर खेल प्रतिभाओं को उनकी उपलब्धियों के अनुरूप पर्याप्त पहचान और सम्मान मिल पा रहा है?

एशियाई मंच पर तिरंगा लहराने वाली संजू देवी जैसे खिलाड़ियों की उपलब्धियां आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा हैं। जरूरत इस बात की है कि उनकी सफलता को केवल पदक तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उनके संघर्ष और सफर को भी उतनी ही पहचान मिले।

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