गांधी जी के तीन बंदर और लोकतंत्र की सीढ़ियाँ: सुविधा के बहरेपन और मूक-दर्शक बनने के दौर में एक वैचारिक दस्तक
सीढ़ियों के पायदान और आधुनिक राजनीति का यथार्थ
इस अनौपचारिक 'संसद' की सबसे ऊपरी और शक्तिशाली सीट पर घर का सबसे छोटा सदस्य, राजेश बैठा था। उसने अपनी आँखों को हथेलियों से पूरी मजबूती के साथ ढंक रखा था। उसके चेहरे पर एक ऐसा लोकतांत्रिक अहंकार था जो मानो कह रहा हो—"मैं सिर्फ वही देखूँगा जो मेरे अनुकूल है, जो प्रतिकूल है उसे नकार दूँगा।" यह आज के चयनात्मक दृष्टिकोण (Selective Vision) वाले लोकतंत्र का सटीक चेहरा है, जहाँ विसंगतियों को ढंकना ही सबसे बड़ी योग्यता मान ली गई है। ठीक वैसे ही, जैसे गठबंधन सरकारों में सबसे छोटा दल सबसे ज्यादा रसूखदार होकर अपनी शर्तें मनवाता है।
राजेश के ठीक नीचे अनन्या बैठी थी, जिसने अपने कानों पर कसकर हाथ रख रखे थे। उसे अच्छी तरह मालूम था कि जनता की चीखें, महंगाई की मार या विपक्ष के तर्क सुनना प्रशासनिक सुशासन के भ्रम को तोड़ सकता है। उसका यह व्यवहार आज की 'सुविधाजनक बहरेपन की राजनीति' (Defensive Ignorance Politics) का जीवंत उदाहरण था।
सबसे निचले पायदान पर घर की सबसे बड़ी बेटी आरोही मौन धारण किए बैठी थी। उसने अपने मुँह पर हाथ रख रखा था, जो उस लोकतांत्रिक विवशता का प्रतीक था जहाँ गठबंधन को बचाए रखने के लिए बड़े दलों को भी सब कुछ जानते हुए चुप रहना पड़ता है। यह एक ऐसे मूक-दर्शक की स्थिति थी, जो अनुशासन की लक्ष्मण रेखा और अपनी 'कुर्सी' के संकट के डर से अन्याय देखकर भी आवाज नहीं उठा पाती।
समाचार चैनलों का शोर और दादी का 'संविधान'
गर्मियों की छुट्टियों में टीवी रिमोट पर कब्जा जमाए बैठे समाचार चैनल हर पल लोकतंत्र की मनमानी परिभाषाएं गढ़ रहे थे। कोई देश के खतरे में होने का रोना रो रहा था, तो कोई विकास की आंधी में सब कुछ उड़ जाने का दावा कर रहा था। शोर इस कदर बेमानी हो चुका था कि बच्चों ने ऊबकर टीवी बंद किया और सीढ़ियों को ही लोकसभा का रूप दे दिया।
तभी घर की 'संविधान सभा' की एकमात्र जीवित सदस्य, यानी दादी अपना चश्मा उतारते हुए वहाँ पहुँचीं। उन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा, "बच्चों, यह कौन सा नया खेल चल रहा है?" आरोही ने मौन तोड़ते हुए इशारा किया—"गांधी जी के तीन बंदर!"
बापू के संदेश की विकृति और दादी की सीख
दादी ने एक गहरी सांस ली। उनकी आंखों में देश की आजादी और संघर्ष का पूरा इतिहास तैर गया। उन्होंने बच्चों को पास बिठाकर सत्ता के गलियारों में दफन हो चुके कड़वे सच से रूबरू कराया। दादी ने कहा:बच्चों, तुम लोग गांधी जी के बंदरों के मूल संदेश को गलत समझ बैठे हो। वे बुरा न देखने, न सुनने और न बोलने की सीख इसलिए नहीं दे रहे थे कि तुम कायर बन जाओ, या हमारा लोकतंत्र अंधा, बहरा और गूंगा हो जाए। उनका संदेश आंतरिक शुद्धता के लिए था, लेकिन आज की व्यवस्था इसका दुरुपयोग अपने स्वार्थ के लिए कर रही है।"
दादी ने बच्चों को झकझोरते हुए पूछा:
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"राजेश, अगर तू अपनी आँखें बंद रखेगा, तो समाज के गिरे हुए तबके को सहारा कौन देगा?"
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"अनन्या, अगर तूने अपने कान बंद कर लिए, तो अभावों में जी रहे लोगों की सिसकियां कौन सुनेगा?"
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"और आरोही, अगर तूने अपना मुँह बंद रखा, तो सत्ताधीशों की तानाशाही पर अंकुश कौन लगाएगा?"
सजग पीढ़ी' के उदय की आवश्यकता
दादी की इस मर्मभेदी बात ने बच्चों के भीतर एक वैचारिक क्रांति की नींव रख दी। बच्चों ने धीरे-धीरे अपने हाथों को अपनी इंद्रियों से हटाया। राजेश की आँखों में अब यथार्थ को स्वीकार करने की चमक थी, अनन्या के कानों में जनसरोकार की गूंज और आरोही के चेहरे पर सवाल पूछने का साहस था।
दादी ने स्पष्ट किया कि प्रगति की सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए लोकतंत्र का हर पायदान जवाबदेही (Accountability) मांगता है। बुराई को देखना, उसे सुनना और समय आने पर उसके खिलाफ पूरी प्रखरता से आवाज उठाना ही वास्तविक लोकतान्त्रिकता है। अन्यथा, यह समाज सिर्फ बंदरों का अखाड़ा बनकर रह जाएगा, जहाँ इंसानियत गायब होगी।
अब वह युग समाप्त हो चुका है जहाँ नागरिक मूक-बधिर बंदर बनकर रहें। आज के बदलते परिवेश में देश को एक 'सजग पीढ़ी' की जरूरत है, जो लोकतंत्र को केवल कागजी शब्दों में नहीं, बल्कि अपने साहस और मुखर आवाज में जीती हो।
(लेखक: विवेक रंजन श्रीवास्तव, वर्तमान में लंदन में निवासरत हैं।)
