Gen Z और Gen Alpha : अपेक्षाएं, चुनौतियां और विमर्श

युवा पीढ़ी समस्या नहीं, अपार संभावनाओं का स्रोत है; जरूरत उसकी ऊर्जा को सही दिशा और भरोसेमंद व्यवस्था देने की
 
युवा पीढ़ी समस्या नहीं, अपार संभावनाओं का स्रोत है; जरूरत उसकी ऊर्जा को सही दिशा और भरोसेमंद व्यवस्था देने की

हरिश्चंद्र श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता, भाजपा, उत्तर प्रदेश

आज हमें ईमानदारी से यह विचार करने की आवश्यकता है कि Gen Z और Gen Alpha से जुड़ी समस्याओं की वास्तविक जड़ कहां है। यह प्रसन्नता की बात है कि भाजपा का नेतृत्व पार्टी में युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने के साथ-साथ राष्ट्र जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में युवाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में निरंतर प्रयास कर रहा है। विशेष रूप से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा Gen Z और Gen Alpha की समस्याओं को समझने तथा उनके समाधान के लिए व्यापक संवाद और संपर्क की पहल किया जाना एक महत्वपूर्ण कदम है। इस पीढ़ी की चुनौतियों को समझने और उनके समाधान की दिशा में यह प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय है।

समस्या की जड़ कहां है?

वर्तमान समय में Gen Z और Gen Alpha की अनेक चुनौतियों के मूल में इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों से निर्मित वह वैश्विक दुनिया दिखाई देती है, जो हर क्षण इन पीढ़ियों के सामने असंख्य दृश्य, विचार, संवाद और सूचनाएं प्रस्तुत कर रही है।

बचपन से किशोरावस्था और फिर युवावस्था तक पहुंचते-पहुंचते डिजिटल दुनिया ने उनकी आकांक्षाओं, महत्वाकांक्षाओं और कल्पनाशक्ति को अभूतपूर्व गति दी है। यह स्थिति कई बार ऐसी प्रतीत होती है जैसे बाढ़ में उफनती नदी का वेग—असीमित और तीव्र, लेकिन कई बार बिना स्पष्ट दिशा और अनुशासन के।

हालांकि, इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। किशोरों और युवाओं में मौजूद संकल्प, अदम्य उत्साह, साहस और कुछ नया कर गुजरने का जुनून ही समाज में बड़े स्तर पर सृजन और परिवर्तन की शक्ति बन सकता है। इसलिए इस ऊर्जा को दबाने या नष्ट करने के बजाय उसे सकारात्मक दिशा देना आवश्यक है। Gen Z और Gen Alpha को अनुशासित, रचनात्मक और सकारात्मक शक्ति के रूप में विकसित करने की जिम्मेदारी परिवार, समाज और शिक्षा जगत की भी है।

तीन प्रमुख चुनौतियां

1. इंटरनेट और नीतिगत शून्यता

भारत में सार्वजनिक इंटरनेट सेवा की शुरुआत 1995 में VSNL के माध्यम से हुई। इंटरनेट के विस्तार के साथ ही इसके संभावित दुरुपयोग को लेकर चिंताएं भी सामने आती रही हैं। लेखक के अनुसार, डिजिटल सामग्री के प्रभाव और उससे जुड़े जोखिमों के अनुरूप एक प्रभावी और जवाबदेह नियामक ढांचे की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जाती रही है।

आज OTT प्लेटफॉर्म, YouTube और अन्य डिजिटल माध्यमों पर बड़ी मात्रा में सामग्री उपलब्ध है। इनमें मनोरंजन के साथ-साथ हिंसा, अश्लीलता, आक्रोश और नशे को बढ़ावा देने वाली सामग्री भी दिखाई देती है। किशोर और युवा जिस उम्र में अपने व्यक्तित्व और विचारों का निर्माण कर रहे होते हैं, उस समय ऐसी सामग्री का लगातार संपर्क उनके व्यवहार और सोच को प्रभावित कर सकता है।

इंटरनेट आज जीवन की अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है। ऐसे में चुनौती इंटरनेट को रोकने की नहीं, बल्कि उसके उपयोग और डिजिटल सामग्री के लिए ऐसा संतुलित एवं जवाबदेह ढांचा तैयार करने की है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ बच्चों और युवाओं की सुरक्षा का भी ध्यान रखे।

2. शिक्षा व्यवस्था का बढ़ता व्यवसायीकरण

एक समय शिक्षा, शिक्षक और विद्यालय की भूमिका उस कुम्हार जैसी मानी जाती थी, जो मिट्टी के एक सामान्य लोंदे को धैर्य और कौशल के साथ आकार देता है। विद्यालय में बच्चों को पाठ्यक्रम के साथ संस्कार, अनुशासन, खेल भावना, सहयोग और सह-अस्तित्व के मूल्य भी सीखने को मिलते थे।

शिक्षक और विद्यालय विद्यार्थियों की प्रतिभा को पहचानकर उसे निखारने तथा उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। लेकिन आर्थिक और सामाजिक बदलावों के साथ शिक्षा के स्वरूप में भी व्यापक परिवर्तन आया है।

आज शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ता व्यावसायीकरण चिंता का विषय है। कोचिंग संस्थानों का विस्तार, डिग्री-केंद्रित शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था से जुड़ी अनियमितताएं इस चुनौती को और गंभीर बनाती हैं। जब शिक्षा का केंद्र सीखने और व्यक्तित्व निर्माण के बजाय केवल प्रतिस्पर्धा तथा आर्थिक लाभ बन जाता है, तो विद्यार्थी के मानसिक और भावनात्मक विकास पर भी असर पड़ सकता है।

यही Gen Z की एक बड़ी त्रासदी के रूप में सामने आती है—अपनी पहचान की तलाश, दिशाहीनता और भविष्य को लेकर असुरक्षा। परीक्षा में असफलता, नौकरी न मिलना या डिजिटल दुनिया से जुड़ी निराशा जैसी परिस्थितियों में युवाओं के मानसिक संकट की खबरें सामने आती रहती हैं। यह केवल किसी एक व्यक्ति की समस्या नहीं, बल्कि परिवार, शिक्षा व्यवस्था और समाज के सामने खड़ा सामूहिक प्रश्न है।

3. भविष्य की अनिश्चितता और उपभोक्तावादी दबाव

वैश्वीकरण और बदलती अर्थव्यवस्था ने रोजगार और करियर के स्वरूप में व्यापक परिवर्तन किया है। शिक्षा लगातार महंगी हो रही है, रोजगार के अवसरों में प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है और युवाओं के सामने भविष्य को लेकर अनिश्चितता भी बनी हुई है।

दूसरी ओर समाज में उपभोक्तावादी संस्कृति और प्रदर्शन की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। महंगे स्मार्टफोन, ब्रांडेड कपड़े, लग्जरी वाहन और जीवनशैली का प्रदर्शन अब सोशल मीडिया के माध्यम से पहले से कहीं अधिक दिखाई देता है।

एक व्यक्ति को देखकर दूसरे व्यक्ति की आकांक्षा बढ़ती है। जब आकांक्षाएं उपलब्ध संसाधनों से बड़ी हो जाती हैं और उन्हें पूरा करने के अवसर सीमित होते हैं, तो निराशा और आक्रोश पैदा हो सकता है। युवाओं के एक वर्ग के सामने यह दबाव आज वास्तविक चुनौती बन चुका है।

समाधान की राह क्या हो?

Gen Z और Gen Alpha की चुनौतियों का समाधान केवल नियम बनाने या युवाओं को दोष देने से संभव नहीं होगा। इसके लिए शिक्षाविदों, मनोवैज्ञानिकों, समाजशास्त्रियों, अभिभावकों, तकनीकी विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं को मिलकर काम करना होगा।

सबसे पहले इस पीढ़ी को समझना होगा। उनसे संवाद करना होगा, उनकी बात सुननी होगी और उनकी आकांक्षाओं तथा चिंताओं को गंभीरता से लेना होगा। डिजिटल दुनिया से जुड़े अवसरों और खतरों के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। शिक्षा में केवल रोजगार नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, मानसिक मजबूती, रचनात्मकता, कौशल और जिम्मेदारी को भी महत्व देना होगा।

युवाओं को यह विश्वास दिलाना होगा कि असफलता जीवन का अंत नहीं, बल्कि सीखने का एक अवसर है। उन्हें केवल नौकरी खोजने वाला नहीं, बल्कि नए अवसर और रोजगार पैदा करने वाला बनने के लिए भी प्रेरित किया जाना चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि Gen Z और Gen Alpha समस्या नहीं हैं। वे भारत की सबसे बड़ी संभावनाओं में से एक हैं। उनके भीतर ऊर्जा है, तकनीक की समझ है, नए विचार हैं और बदलाव की क्षमता है। आवश्यकता केवल इतनी है कि इस ऊर्जा को सही दिशा मिले, उनकी आकांक्षाओं को अवसर मिलें और उन्हें एक ऐसी व्यवस्था पर भरोसा हो जो उनकी बात सुने और उनके भविष्य को सुरक्षित एवं सार्थक बनाने में साथ खड़ी हो।

यदि समाज और व्यवस्था इस चुनौती को अवसर में बदलने में सफल होते हैं, तो यही युवा पीढ़ी भारत के सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी परिवर्तन की सबसे बड़ी शक्ति बन सकती है।

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