गीता जयंती : निष्काम कर्मयोग का संदेश और उज्जैन की आध्यात्मिक धड़कन
Geeta Jayanti: The message of selfless Karma Yoga and the spiritual heartbeat of Ujjain
Sun, 30 Nov 2025
(पवन वर्मा – विनायक फीचर्स)
भारतवर्ष के प्रत्येक सनातन साधक और संस्कृति-प्रेमी के लिए श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक ग्रंथ नहीं, जीवन के पथ को आलोकित करने वाला कालजयी प्रकाश है। गीता का यह अनन्त संदेश – “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” – हमें यह सिखाता है कि मनुष्य का अधिकार केवल अपने कर्म पर है, परिणाम पर नहीं।
इस महान उपदेश की अनुभूति मध्यप्रदेश की पवित्र नगरी उज्जैन में सहज ही मिलती है। यह वही भूमि है जहाँ काल का प्रवाह स्थिर-सा प्रतीत होता है और जहाँ से धर्म, ज्ञान तथा कर्तव्य का प्रकाश युगों-युगों से मानवता का मार्गदर्शन करता आया है।
यहीं स्थित सान्दीपनि आश्रम में बालक कृष्ण ने वह शिक्षा प्राप्त की, जिसने आगे चलकर गीता के स्वरूप में संपूर्ण विश्व को अमृत-तत्व प्रदान किया। इसलिए जब मध्यप्रदेश में गीता जयंती के भव्य आयोजन की बात आती है, तो स्वाभाविक रूप से उसकी आत्मा उज्जैन से जुड़ जाती है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में प्रदेश में एक से तीन दिसंबर तक त्रिदिवसीय गीता महोत्सव आयोजित किया जा रहा है।
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मध्यप्रदेश में गीता जयंती : उज्जैन की परंपरा का विस्तार
इस वर्ष 1 दिसंबर को राज्य के 55 जिलों, 10 संभागों और 313 विकासखंडों में गीता के 15वें अध्याय का सामूहिक पाठ एक साथ सम्पन्न होगा। अनुमान है कि तीन लाख से अधिक गीता-प्रेमियों के एकस्वर chanting से प्रदेश आध्यात्मिक ऊर्जा से आलोकित होगा।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव स्वयं उज्जैन की इस समृद्ध परंपरा के प्रतिनिधि हैं और वे इस उत्सव को केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और मानसिक नव जागरण का रूप दे रहे हैं।
स्कूलों और कॉलेजों में आयोजित हो रहे—
गीता क्विज
श्लोक पाठ
गीता वितरण
जनसाधारण में प्रतियों का प्रसार
—इन सभी प्रयासों का उद्देश्य गीता को पुस्तकों की अलमारियों से निकालकर जीवन की दिनचर्या का हिस्सा बनाना है।
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आधुनिक जीवन में गीता का अपरिहार्य महत्व
गीता की प्रासंगिकता आज और अधिक स्पष्ट होती है। इसका संदेश—
“योगस्थः कुरु कर्माणि।”
अर्थात समभाव में स्थित होकर कर्म करना, आज की युवा पीढ़ी के लिए मानसिक स्थिरता और संतुलन का आधार बन सकता है।
प्रतिस्पर्धा, अस्थिरता, तनाव और अवसाद से जूझते आधुनिक समाज के लिए गीता का यह ज्ञान वैकल्पिक नहीं बल्कि आवश्यक है।
आज जिस “माइंडफुलनेस" को विश्व आधुनिक मनोविज्ञान का हिस्सा मान रहा है, गीता उस चेतना को हजारों वर्ष पहले ही स्थापित कर चुकी है।
विद्यालयों में गीता पाठ बच्चों में—
धैर्य
आत्मविश्वास
चिंतन-शक्ति
निर्णय क्षमता
—का विकास करता है।
और जैसा कि गीता कहती है— “न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।” ज्ञान से श्रेष्ठ पवित्रता कहीं नहीं।
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उज्जैन : कृष्ण की शिक्षा-भूमि और गीता का मूलाधार
सान्दीपनि आश्रम केवल एक गुरुकुल नहीं, बल्कि वह धात्री-भूमि है जहाँ कृष्ण ने वेद, शास्त्र, शस्त्र, नीति, संवाद, अनुशासन और जीवन-दर्शन का समन्वित ज्ञान प्राप्त किया।
इसी ज्ञान ने आगे चलकर उन्हें गीता का उपदेशक बनाया। इसलिए गीता का बीज वास्तव में उज्जैन में रोपा गया और कुरुक्षेत्र में वह विशाल वटवृक्ष के रूप में खड़ा हुआ।
इसलिए जब मध्यप्रदेश सरकार उज्जैन को गीता जयंती के केंद्र में रखती है, तो यह संस्कृति के मूल स्वरूप को पुनः स्थापित करने जैसा है।
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आज के समय में गीता और भी अधिक आवश्यक क्यों
आज का समाज भ्रम, अवसाद, संघर्ष और मानसिक तनाव से गुजर रहा है। ऐसे समय में गीता का संदेश—
“उद्धरेदात्मनाऽत्मानं।”
यानि मनुष्य स्वयं अपने को ऊपर उठाए—
आत्मबल एवं आत्मविश्वास का अद्भुत सूत्र प्रस्तुत करता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विश्व नेताओं को गीता भेंट किया जाना भी इसी बात का संकेत है कि यह ग्रंथ किसी एक धर्म तक सीमित नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता का मार्गदर्शक है।
मध्यप्रदेश में गीता जयंती का आयोजन वास्तव में सांस्कृतिक नवजागरण का प्रतीक है।
तीन लाख लोगों का सामूहिक पाठ, प्रदेशव्यापी गतिविधियाँ और व्यापक जनसहभागिता यह संकेत देती है कि गीता नए युग की सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत बन रही है।
अंततः गीता का यह शाश्वत संदेश—
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति…”
स्मरण कराता है कि जब संसार में भ्रम और अधर्म का विस्तार होता है, तब सत्य का प्रकाश अवश्य उदय होता है। आज वह प्रकाश गीता है और उसका स्रोत उज्जैन। इस वर्ष मध्यप्रदेश में मनाई जा रही गीता जयंती केवल एक उत्सव नहीं— एक आध्यात्मिक पुनर्जागरण का आरंभ है।
