शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी पार्वती ने किया था कठिन तप, सखियों के साथ वन में चली गई थीं माता

माता पार्वती के कठोर तप और अटूट प्रेम की गाथा है हरतालिका तीज
 
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अंजनी सक्सेना - विभूति फीचर्स)

“भाद्रपदे शुक्लपक्षे तृतीयायां हस्तसंयुता।
हरतालिका व्रतं नाम सर्वपापप्रणाशनम्॥
सौभाग्यं संततिं देहि सर्वकामांश्च देहि मे।”

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला हरतालिका तीज व्रत भारतीय सनातन परंपरा में नारी के प्रेम, संकल्प, तपस्या और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह वही व्रत है, जिसके माध्यम से माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी।

वर्ष 2026 में हरतालिका तीज 14 सितंबर, सोमवार को मनाई जाएगी। यह व्रत भाद्रपद शुक्ल तृतीया को रखा जाता है और इस दिन भगवान शिव तथा माता पार्वती की पूजा का विधान है।

प्रकृति के श्रृंगार के बीच मनाया जाता है यह पर्व

भादों के महीने में जब चारों ओर हरियाली छा जाती है, वर्षा की फुहारों से वातावरण सुगंधित हो उठता है और प्रकृति अपने सौंदर्य के चरम पर होती है, तब हरतालिका तीज का पर्व आता है।अविवाहित युवतियां इस व्रत को मनचाहे वर की कामना से करती हैं, जबकि विवाहित महिलाएं दांपत्य जीवन की सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के साथ व्रत रखती हैं। धार्मिक परंपरा में इस दिन गौरी स्वरूपा माता पार्वती की विशेष पूजा की जाती है।

हरतालिका तीज का मूल संदेश केवल वैवाहिक सुख तक सीमित नहीं है। यह पर्व संकल्प, धैर्य, प्रेम और अपनी इच्छा के प्रति दृढ़ रहने की प्रेरणा भी देता है।

भगवान शिव को पाने के लिए पार्वती ने किया कठोर तप

हरतालिका तीज की कथा माता पार्वती और भगवान शिव के दिव्य मिलन से जुड़ी है। धार्मिक ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए अत्यंत कठिन तपस्या की थी।कथा के अनुसार, पार्वती के पिता हिमालय उनके विवाह को लेकर चिंतित थे। इसी दौरान नारद जी ने भगवान विष्णु से उनका विवाह कराने का प्रस्ताव रखा। जब पार्वती को इस संबंध की जानकारी मिली तो वह अत्यंत दुखी हुईं, क्योंकि वह मन से भगवान शिव को अपना पति मान चुकी थीं।

माता की मनःस्थिति को समझते हुए उनकी सखियां उन्हें राजमहल से दूर एक घने वन में ले गईं। इसी कारण इस व्रत का नाम हरतालिका पड़ा। धार्मिक व्याख्या में ‘हरत’ का अर्थ हरण करना और ‘आलिका’ का अर्थ सखी बताया जाता है।

वन में माता पार्वती ने बालू से शिवलिंग बनाया और भगवान शिव की आराधना शुरू कर दी। उन्होंने कठोर तप किया और भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन पूरी निष्ठा के साथ भगवान शिव का ध्यान किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करने का वर दिया।

इसी कथा के कारण हरतालिका तीज को माता पार्वती के अटूट संकल्प और भगवान शिव के प्रति उनकी भक्ति का पर्व माना जाता है। हरतालिका की कथा में सखी द्वारा पार्वती को वन ले जाने और उनके तप की परंपरा का उल्लेख भी मिलता है।

मिट्टी और बालू से बनाई जाती हैं शिव-पार्वती की प्रतिमाएं

हरतालिका तीज की पूजा में भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा बनाने की परंपरा विशेष मानी जाती है। कई स्थानों पर व्रती महिलाएं मिट्टी या बालू से शिव-पार्वती की प्रतिमाएं बनाकर उनका पूजन करती हैं।पूजा के दौरान माता पार्वती को सुहाग की सामग्री अर्पित की जाती है। सिंदूर, चूड़ी, बिंदी, कंगन, बिछिया, वस्त्र और अन्य श्रृंगार सामग्री से गौरी का पूजन किया जाता है। भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करने की परंपरा है। महिलाएं स्वयं भी श्रृंगार करके पूजा में शामिल होती हैं। इसके बाद हरतालिका तीज की कथा सुनी जाती है और कई स्थानों पर रातभर भजन-कीर्तन एवं जागरण किया जाता है।

कठिन माना जाता है हरतालिका का निर्जला व्रत

हरतालिका तीज का व्रत कठिन व्रतों में गिना जाता है। परंपरागत रूप से कई महिलाएं इस दिन अन्न और जल दोनों का त्याग कर निर्जला व्रत रखती हैं। हालांकि व्रत रखने की क्षमता व्यक्ति की शारीरिक स्थिति पर निर्भर करती है और स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होने पर कठोर निर्जला व्रत से बचना उचित है।

पूजा के लिए प्रातःकाल का समय विशेष माना जाता है। दिल्ली में 2026 के लिए प्रातःकालीन पूजा का समय करीब सुबह 6:05 बजे से 7:06 बजे तक बताया गया है। अलग-अलग शहरों में सूर्योदय के अंतर के कारण मुहूर्त बदल सकता है।

हरतालिका तीज का संदेश

हरतालिका तीज को केवल उपवास और पूजा का पर्व मानना इसकी व्यापक भावना को सीमित कर देना होगा। माता पार्वती की कथा धैर्य, आत्मविश्वास, निष्ठा और संकल्प की शक्ति का संदेश देती है।पार्वती ने अपने मन में भगवान शिव को पति रूप में स्वीकार किया और परिस्थितियां विपरीत होने के बावजूद अपने संकल्प से पीछे नहीं हटीं। उनकी तपस्या इस बात का प्रतीक बन गई कि दृढ़ इच्छा और समर्पण के सामने कठिन परिस्थितियां भी रास्ता छोड़ सकती हैं।

भारतीय परंपरा में ऐसे व्रतों के माध्यम से महिलाओं की आस्था, पारिवारिक मूल्यों और सांस्कृतिक परंपराओं की निरंतरता को भी देखा जाता है। हरतालिका तीज इसी परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जिसमें शिव-पार्वती के दांपत्य संबंध को आदर्श मानकर सुखी वैवाहिक जीवन की कामना की जाती है।

आज के समय में भी यह पर्व अपनी धार्मिक आस्था के साथ-साथ प्रेम, विश्वास, धैर्य और रिश्तों में समर्पण के संदेश के कारण विशेष महत्व रखता है। माता पार्वती की तपस्या की यह कथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाती रही है और हरतालिका तीज इसी अटूट आस्था को आगे बढ़ाने वाला पर्व है।

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