गोस्वामी तुलसीदास का समन्वयवादी साहित्य आज भी समाज को दिखाता है नई राह: राष्ट्रीय संगोष्ठी में विद्वानों ने रखे विचार
अल्लीपुर, हरदोई। गोस्वामी तुलसीदास की रचनाएं केवल भक्ति और धार्मिक भावनाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनमें सामाजिक समरसता, मानवीय मूल्यों और भारतीय संस्कृति का व्यापक संदेश समाहित है। उनके साहित्य में दिखाई देने वाला समन्वय का भाव आज के दौर में भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इन्हीं विचारों को केंद्र में रखते हुए डॉ. राम मनोहर लोहिया महाविद्यालय, अल्लीपुर, हरदोई में ‘समन्वय के कवि गोस्वामी तुलसीदास की रचनाधर्मिता’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
महाविद्यालय एवं अंतरराष्ट्रीय रामायण एवं वैदिक शोध संस्थान, अयोध्या (संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में शिक्षाविदों, साहित्यकारों, शोधकर्ताओं, पत्रकारों, चिंतकों और क्षेत्र के गणमान्य लोगों ने भाग लिया। संगोष्ठी के साथ प्रतिभा सम्मान समारोह का भी आयोजन किया गया, जिसमें मेधावी विद्यार्थियों तथा जनपद के वरिष्ठ साहित्यकारों और पत्रकारों को सम्मानित किया गया।
दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ
राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथियों और विद्वानों ने मां सरस्वती तथा गोस्वामी तुलसीदास के चित्र पर दीप प्रज्ज्वलित एवं माल्यार्पण कर किया। इसके बाद उदय वीर सिंह ‘उदय’ की सरस्वती वंदना ने कार्यक्रम के वातावरण को आध्यात्मिक और साहित्यिक ऊर्जा से भर दिया।
कार्यक्रम की प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए डॉ. देवी प्रसाद तिवारी ने संगोष्ठी के उद्देश्य और विषय की प्रासंगिकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि तुलसीदास को केवल मध्यकालीन कवि के रूप में देखना उनके साहित्यिक योगदान को सीमित करना होगा। उन्होंने भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों, विचारधाराओं और दार्शनिक परंपराओं के बीच समन्वय स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया।उन्होंने कहा कि तुलसीदास ने ज्ञान, भक्ति और कर्म के बीच संतुलन स्थापित किया, जो उनके साहित्य की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है।

तुलसी साहित्य में दिखाई देता है व्यापक समन्वय: प्रो. अवस्थी
मुख्य अतिथि प्रो. अवनिशेज अवस्थी, पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, ने तुलसीदास के समन्वयवादी चिंतन पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि तुलसीदास का साहित्य भारतीय संस्कृति के मूल सिद्धांतों को व्यापक रूप में अभिव्यक्त करता है।
उन्होंने कहा कि तुलसी का समन्वय केवल शैव और वैष्णव परंपराओं के बीच सामंजस्य तक सीमित नहीं था। उनके साहित्य में भाषा, समाज, संस्कृति, दर्शन और शासन व्यवस्था से जुड़े विभिन्न पक्षों को जोड़ने का प्रयास दिखाई देता है।
प्रो. अवस्थी ने कहा कि तुलसीदास ने अवधी और संस्कृत, सगुण और निर्गुण, ज्ञान और भक्ति तथा शासक और आमजन के बीच मौजूद दूरी को कम करने का काम किया। वर्तमान समय में जब समाज विभिन्न प्रकार के विभाजन और तनाव का सामना कर रहा है, तुलसी का समन्वयवादी चिंतन सामाजिक सद्भाव और व्यापक शांति के लिए उपयोगी हो सकता है।उन्होंने कहा कि ‘रामचरितमानस’ को केवल धार्मिक ग्रंथ मानना उचित नहीं है। यह जीवन के विविध पक्षों और मानवीय मूल्यों को समझने वाला महत्वपूर्ण महाकाव्य है, जिसकी प्रासंगिकता समय के साथ बनी हुई है।

सामाजिक समरसता के लिए तुलसी के विचार महत्वपूर्ण: राज किशोर
मुख्य वक्ता राज किशोर, प्रांत प्रमुख, सामाजिक समरसता, अवध प्रांत ने तुलसीदास के साहित्य और सामाजिक समरसता के बीच संबंध पर अपने विचार साझा किए।
उन्होंने कहा कि तुलसीदास ने अपने समय में सामाजिक विषमताओं के बीच लोगों को जोड़ने का प्रयास किया। ‘रामचरितमानस’ में भगवान राम के चरित्र के माध्यम से समानता, आत्मीयता और सामाजिक सहभागिता का संदेश मिलता है।
उन्होंने शबरी, निषादराज और वानर-भालुओं से जुड़े प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि तुलसी के साहित्य में समाज के विभिन्न वर्गों के प्रति सम्मान और अपनत्व का भाव दिखाई देता है। वर्तमान समय में सामाजिक एकता को मजबूत करने के लिए तुलसीदास के विचारों को समझना और उन्हें व्यवहार में उतारना आवश्यक है।

काव्य पाठ ने बांधा समां
संगोष्ठी के दौरान विशिष्ट अतिथि ज्ञान प्रकाश ‘आकुल’ और श्री प्रख्यात ने प्रभावशाली काव्य पाठ प्रस्तुत किया। दोनों कवियों की प्रस्तुतियों ने सभागार में मौजूद श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया।
ज्ञान प्रकाश ‘आकुल’ ने अपनी कविताओं के माध्यम से तुलसीदास की भक्ति भावना, उनके समन्वयवादी दृष्टिकोण और तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों को रेखांकित किया। वहीं श्री प्रख्यात ने तुलसी साहित्य के दार्शनिक पक्ष और उनकी छंद योजना पर केंद्रित ओजपूर्ण काव्य प्रस्तुति दी।
उनकी प्रस्तुतियों ने यह संदेश दिया कि तुलसी का साहित्य केवल भक्ति भावना का प्रतिनिधित्व नहीं करता, बल्कि उसमें मानवीय संवेदना, दर्शन और गहन चिंतन का भी समावेश है।

तुलसी साहित्य में लोककल्याण की भावना: डॉ. सुशील चंद्र त्रिवेदी
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. सुशील चंद्र त्रिवेदी ‘मधुपेश’, अखिल भारतीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय साहित्य परिषद एवं संस्थापक/प्रबंधक, सार्वजनिक शिक्षोन्नयन संस्थान ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में तुलसी साहित्य के लोककल्याणकारी पक्ष पर प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि तुलसीदास की रचनाओं में परहित और सामाजिक कल्याण की भावना प्रमुखता से दिखाई देती है। उनका समन्वयवादी दृष्टिकोण भारतीय सनातन परंपरा के मूल भाव को अभिव्यक्त करता है।
उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्र में इस प्रकार के साहित्यिक और सांस्कृतिक आयोजन नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे कार्यक्रम युवाओं में नैतिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना विकसित करने में भी सहायक हैं।

मेधावी विद्यार्थियों को किया गया सम्मानित
राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे चरण में महाविद्यालय के बीए, बीएससी, बीकॉम, एमए, एमएससी और बीएड के द्वितीय एवं चतुर्थ सेमेस्टर में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले छात्र-छात्राओं को सम्मानित किया गया।
मेधावी विद्यार्थियों को प्रशस्ति पत्र, मेडल और स्मृति चिह्न प्रदान किए गए। अतिथियों ने विद्यार्थियों की उपलब्धियों की सराहना करते हुए उन्हें आगे भी निरंतर अध्ययन, ज्ञानार्जन और समाजहित में कार्य करने के लिए प्रेरित किया।

वरिष्ठ साहित्यकारों और पत्रकारों का अभिनंदन
कार्यक्रम में जनपद के वरिष्ठ साहित्यकारों और पत्रकारों के योगदान को भी सम्मान दिया गया। साहित्य एवं पत्रकारिता के माध्यम से समाज को दिशा देने वाले कई विशिष्ट लोगों को अंगवस्त्र और प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।
सम्मानित व्यक्तियों में डॉ. नरेश चंद्र शुक्ला, डॉ. बी. एस. पांडे, डॉ. ईश्वर चंद्र वर्मा, देश दीपक शुक्ला, अजित आनंद मणि, डॉ. शीला पांडेय, डॉ. राहुल सिंह, महेश मिश्र और वेद प्रकाश अवस्थी सहित अन्य साहित्यकार एवं पत्रकार शामिल रहे।
अतिथियों ने कहा कि अपनी लेखनी के माध्यम से समाज और साहित्य को समृद्ध करने वाले ये रचनाकार जनपद की महत्वपूर्ण साहित्यिक धरोहर हैं।

डॉ. शीर्षेन्दु शील त्रिवेदी ने किया संयोजन
पूरे कार्यक्रम का सफल संयोजन डॉ. शीर्षेन्दु शील त्रिवेदी ‘विपिन’, संयोजक एवं प्राचार्य, डॉ. राम मनोहर लोहिया महाविद्यालय द्वारा किया गया।
कार्यक्रम का संचालन श्री राजकुमार सिंह ‘प्रखर’ ने प्रभावी और साहित्यिक शैली में किया। उन्होंने अपनी धाराप्रवाह प्रस्तुति तथा अवसरानुकूल काव्य पंक्तियों के माध्यम से पूरे आयोजन को जीवंत बनाए रखा।
आभार के साथ हुआ समापन
समापन अवसर पर डॉ. देश दीपक शुक्ला ने महाविद्यालय परिवार और आयोजन समिति की ओर से मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथियों, वक्ताओं, साहित्यकारों, पत्रकारों, शिक्षकों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय रामायण एवं वैदिक शोध संस्थान, अयोध्या (संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश) के सहयोग के लिए विशेष धन्यवाद ज्ञापित किया। राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ। इसके बाद उपस्थित अतिथियों और प्रतिभागियों के लिए जलपान की व्यवस्था की गई। पूरे कार्यक्रम में साहित्य, संस्कृति, शिक्षा और सामाजिक समरसता का संदेश प्रमुखता से दिखाई दिया।


