मृत्यु को वीरता से अंगीकार करने वाले महापुरुष: गुरु तेग बहादुर जी

Great men who bravely embraced death: Guru Tegh Bahadur Ji
 
Great men who bravely embraced death: Guru Tegh Bahadur Ji
(इंजी. अरुण कुमार जैन – विनायक फीचर्स)
भारत के इतिहास में जब भी साहस, त्याग, मानवता, सेवा और अदम्य धर्मनिष्ठा का स्मरण किया जाता है, सिख धर्म के महान संत और नौवें गुरु—गुरु तेग बहादुर जी—का नाम आदर और श्रद्धा से लिया जाता है। गुरु नानक देव जी की परंपरा में वे ऐसे दिव्य व्यक्तित्व थे जिन्होंने धर्म और मानवता की रक्षा के लिए केवल 54 वर्ष की आयु में अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया और औरंगज़ेब के जुल्मों और अत्याचार को चुनौती देते हुए अमर संदेश दिया कि “शीश कट सकता है, पर धर्म और आस्था नहीं।”

जन्म, संस्कार और प्रारंभिक जीवन

गुरु तेग बहादुर जी का जन्म 21 अप्रैल 1621 को अमृतसर (तत्कालीन लाहौर प्रांत) में हुआ। उनके पिता सिखों के छठवें गुरु श्री हरगोविंद सिंह जी, तथा माता माता ननकी जी थीं। जन्म के समय रखा गया नाम ‘त्यागमल’ मानो भविष्य के उस त्यागमयी जीवन का प्रतीक था जिसे वे आगे चलकर अनंत ऊँचाइयों तक पहुँचाने वाले थे।
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सिख गुरु-परिवार में पले-बढ़े होने के कारण उन्हें बाल्यावस्था से ही वीरता, घुड़सवारी, धनुर्विद्या और तलवारबाजी की शिक्षा मिली। युवावस्था में उनका विवाह माता गुजरी जी से हुआ और 1666 में पटना साहिब में उनके पुत्र का जन्म हुआ, जो आगे चलकर दसवें सिख गुरु—गुरु गोविंद सिंह जी—के रूप में पूज्य बने।

नौवें गुरु के रूप में प्रतिष्ठा

20 मार्च 1664 को गुरु तेग बहादुर जी को सिख पंथ के नौवें गुरु का सम्मान प्रदान किया गया। 1665 में उन्होंने आनंदपुर साहिब की स्थापना की। देशभर के व्यापक भ्रमण के दौरान वे किरतपुर, रोपड़, सैफाबाद, कुरुक्षेत्र, प्रयाग, बनारस, पटना और असम जैसे क्षेत्रों में पहुँचे।
इन यात्राओं का उद्देश्य था—
• गरीबों की सहायता
• समाज में साहस, धैर्य और सेवा की भावना जगाना
• पीने के पानी के लिए कुएँ खुदवाना
• यात्रियों के रहने की व्यवस्था करना
• लोगों को रोजगार और अच्छे संस्कारों के लिए प्रेरित करना
वे मानते थे कि मानवता का उत्थान तभी संभव है जब समाज एक-दूसरे का सहारा बने।

औरंगज़ेब का अत्याचार और धर्म रक्षा का संकल्प

उसी काल में मुगल सम्राट औरंगज़ेब द्वारा जबरन धर्मांतरण की नीति से देश भयभीत था। हिंदू समाज गुरु तेग बहादुर जी के पास रक्षा की प्रार्थना लेकर पहुँचा। जन्म से ही निर्भीक और धर्ममय संस्कारों से पोषित गुरु ने बिना किसी भय के कहा:

शीश दे सकता हूँ, पर धर्म नहीं छोड़ सकता।”

उनकी यह अडिगता औरंगज़ेब को खल गई। 1675 में उन्हें गिरफ्तार कर दिल्ली लाया गया और 24 नवंबर 1675 को चांदनी चौक में जल्लाद जलालुद्दीन ने उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। जहाँ आज शीशगंज गुरुद्वारा स्थित है, वहीं उन्होंने अंतिम सांस ली।
उनके एक श्रद्धालु ने जोखिम उठाकर गुरु जी की देह रकाबगंज साहिब ले जाकर अंतिम संस्कार किया। बलिदान के पश्चात मात्र नौ वर्ष की आयु में उनके पुत्र गुरु गोविंद सिंह जी को दसवें गुरु का दायित्व सौंपा गया।
गुरु तेग बहादुर जी के शौर्य और बलिदान से उन्हें ‘हिंद की चादर’ की उपाधि मिली—क्योंकि उन्होंने पूरे हिंदू समाज को अपने शीश की चादर से संरक्षण दिया।

बलिदान स्थलों का विकास

1783 में उनके अनुयायी बघेल सिंह द्वारा चांदनी चौक में शीशगंज गुरुद्वारे का निर्माण कराया गया, जिसका बाद में 1857 और 1930 में विस्तार हुआ। आज भी भारतीय सेना की सिख रेजीमेंट राष्ट्रपति को सलामी देने के उपरांत इसी गुरुद्वारे में श्रद्धांजलि देकर अपने कृतज्ञ भाव प्रकट करती है।

आध्यात्मिक कृति और देश का सम्मान

गुरु तेग बहादुर केवल वीर ही नहीं, बल्कि विलक्षण आध्यात्मिक चिंतक भी थे। गुरु ग्रंथ साहिब में उनके 115 शबद संकलित हैं, जो मानवता, वैराग्य, धैर्य और ईश्वर प्रेम का संदेश देते हैं। उनका 400वाँ प्रकाश पर्व 2022 में मनाया गया, जिसमें भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने भाग लेकर श्रद्धांजलि दी। इस अवसर पर उनकी स्मृति में स्मारक सिक्का और डाक टिकट जारी किए गए।

350वाँ बलिदान दिवस (24 नवंबर 2025)

24 नवंबर 2025 को गुरु तेग बहादुर जी के 350वें बलिदान दिवस पर राष्ट्र कृतज्ञता के साथ उन्हें नमन करता है। उनका जीवन प्रेरणा देता है कि धर्म, मानवता, राष्ट्र और नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिए साहस व त्याग से बढ़कर कोई मार्ग नहीं।

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