अभिव्यक्ति की आड़ में बढ़ती जातीय वैमनस्यता: राष्ट्र की एकता के लिए गंभीर खतरा

डॉ. सुधाकर आशावादी द्वारा लिखित यह लेख समाज में बढ़ती जातीय वैमनस्यता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दुरुपयोग और राष्ट्र की अखंडता के समक्ष चुनौतियों पर एक गंभीर कटाक्ष करता है। लेख में मुख्य रूप से इस बात पर चिंता व्यक्त की गई है कि किस प्रकार संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ और सोशल मीडिया के अनियंत्रित विमर्श ने देश के सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुँचाया है।
 
अभिव्यक्ति की आड़ में बढ़ती जातीय वैमनस्यता: राष्ट्र की एकता के लिए गंभीर खतरा

(लेखक: डॉ. सुधाकर आशावादी | साभार: विभूति फीचर्स)

वर्तमान समय में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक दोधारी तलवार बन गई है। जिस प्रकार इस अधिकार की आड़ में देश के भीतर अराजक और विघटनकारी प्रदर्शनों को हवा दी जा रही है, वह किसी भी जागरूक नागरिक के लिए चिंता का विषय है। जातीय नफरत और विभाजनकारी एजेंडे भले ही सत्ता को अस्थिर करने वाली शक्तियों को सुखद लगें, लेकिन राष्ट्र की नींव के लिए ये किसी दीमक से कम नहीं हैं।

अभिव्यक्ति की आड़ में बढ़ती जातीय वैमनस्यता: राष्ट्र की एकता के लिए गंभीर खतरा

सोशल मीडिया और संचार माध्यमों की भूमिका

लेख में स्पष्ट किया गया है कि सोशल मीडिया और आधुनिक संचार माध्यमों का उपयोग आज सकारात्मक संवाद के बजाय समाज को बांटने वाले विमर्श के लिए अधिक हो रहा है। सवाल यह उठता है कि शांति और सद्भाव बनाए रखने के लिए जिम्मेदार तंत्र, इन अराजक तत्वों के मंसूबों को रोकने के बजाय उन पर मौन क्यों है?

अनदेखी के शिकार बुनियादी मुद्दे

डॉ. आशावादी ने देश के ज्वलंत मुद्दों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है:

  • जनसंख्या विस्फोट: बिना किसी स्पष्ट और कठोर नीति के बढ़ती जनसंख्या अर्थव्यवस्था और प्राकृतिक संसाधनों पर बोझ बन रही है।

  • समान नागरिक संहिता (UCC): राजनीतिक स्वार्थों के चलते समान नागरिक संहिता जैसे महत्वपूर्ण सुधार को लंबे समय से ठंडे बस्ते में डाल कर रखा गया है।

  • घुसपैठ और संरक्षण: वोट बैंक की राजनीति के कारण कुछ दल घुसपैठियों को संरक्षण देकर सत्ता का आनंद ले रहे हैं, जो भविष्य में राष्ट्र की सुरक्षा के लिए संकट बन सकता है।

शिक्षा और युवाओं का भटकाव

राष्ट्र निर्माण में जिस युवा शक्ति और मेधा का उपयोग शिक्षण कक्षों में होना चाहिए था, वह आज सड़कों पर 'ढपली' बजाकर विरोध प्रदर्शनों में नष्ट हो रही है। आजादी के नाम पर किस प्रकार की 'आजादी' की मांग की जा रही है, यह समझ से परे है। लेख में एक बड़ा सत्य उजागर किया गया है कि आज जहाँ आम जनमानस में जातिगत भेदभाव कम हो रहा है, वहीं शिक्षा और राजनीति के क्षेत्र में जानबूझकर नफरत की दीवारें खड़ी की जा रही हैं।

राष्ट्र हित सर्वोपरि: सुधार की आवश्यकता

लोकतंत्र में विचारों की भिन्नता स्वीकार्य है, लेकिन राष्ट्र की एकता और अखंडता की कीमत पर मतभेदों को हवा देना अक्षम्य है। लेख का निष्कर्ष कुछ ठोस समाधान प्रस्तुत करता है:

  1. प्रतिबंध: सोशल मीडिया और समाचार चैनलों पर नफरत परोसने वाले विमर्श पर तत्काल अंकुश लगे।

  2. दंड का प्रावधान: बिना प्रमाणिक तथ्यों के समाज को भड़काने वाले किसी भी कथन या विमर्श को दंडनीय अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।

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