गुरु रविदास विश्राम धाम मंदिर – आस्था, समानता और संघर्ष का प्रतीक

Guru Ravidas Vishram Dham Temple – A Symbol of Faith, Equality and Struggle
 
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एडवोकेट एम. आर. बाली
(गुरु रविदास विश्राम धाम मंदिर चमारवाला जोहर तुगलकाबाद कमेटी (रजिस्टर्ड) दिल्ली के जनरल सेक्रेटरी)
।। ऐसा चाहूँ राज मैं जहाँ मिले सभन को अन्न
छोड़ बढ़े सभ सम बसे रविदास रहे प्रसन्न ।।

तुगलकाबाद, दिल्ली स्थित गुरु रविदास विश्राम धाम मंदिर लाखों श्रद्धालुओं की आस्था, समानता और सामाजिक न्याय का जीवंत प्रतीक है। छह वर्षों से अधिक लंबे संघर्ष के बाद, यह ऐतिहासिक मंदिर पुनः उसी पावन स्थल पर निर्मित किया जा रहा है, जहाँ संत शिरोमणि गुरु रविदास जी महाराज की स्मृतियाँ जुड़ी हैं। यह केवल एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि जाति-मुक्त समाज, भाईचारे, प्रेम और समानता का संदेश देने वाला आध्यात्मिक केंद्र बनने जा रहा है।

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ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

मान्यता है कि वर्ष 1509 में स्वयं गुरु रविदास जी इस स्थल पर पधारे थे। उस समय दिल्ली के शासक सिकंदर लोदी उनकी शिक्षाओं से प्रभावित होकर आश्रम हेतु विशाल भूमि दान में दी थी। वर्ष 1803 के राजस्व अभिलेखों में खसरा नंबर 123, 124, 124 मिं. और 122 के अंतर्गत लगभग 12 बीघा 7 बीसा (लगभग 12,350 वर्ग गज) भूमि दर्ज है।
यहाँ गुरु रविदास मंदिर के साथ-साथ संतों की चार समाधियाँ और “चमारवाला जोहर” नामक पवित्र तालाब स्थित था, जिसके जल के बारे में जनश्रुति है कि उसमें चर्म रोगों को ठीक करने के गुण हैं।
मंदिर का जीर्णोद्धार और उद्घाटन 1 मार्च 1959 को तत्कालीन केंद्रीय मंत्री बाबू जगजीवन राम द्वारा किया गया था। “गुरु रविदास जयंती समारोह समिति, तुगलकाबाद” नामक समिति 14 सितंबर 1959 को सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 के अंतर्गत पंजीकृत हुई थी और वही मंदिर का प्रबंधन देखती रही।

कानूनी संघर्ष और ध्वस्तीकरण

1986 के बाद दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) के नोटिस के पश्चात भूमि विवाद का लंबा कानूनी संघर्ष प्रारंभ हुआ। मामला हाई कोर्ट से होते हुए ट्रायल कोर्ट तक पहुँचा। 31 जुलाई 2018 को तकनीकी आधार पर केस खारिज कर दिया गया, यह कहते हुए कि समिति ‘एडवर्स पज़ेशन’ सिद्ध नहीं कर सकी। 20 नवंबर 2018 को हाई कोर्ट में अपील भी खारिज हुई।
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इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की गई, जिसे 8 अप्रैल 2019 को भूमि खाली करने के आदेश के साथ निरस्त कर दिया गया। अंततः 10 अगस्त 2019 को मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया।
देश-विदेश में विरोध और ऐतिहासिक फैसला
मंदिर ध्वस्तीकरण के बाद देश और विदेश में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। “मिशन तुगलकाबाद” के बैनर तले संत सुखदेव वाघमारे, संत वीर सिंह हितकारी और संत के.सी. रवि के नेतृत्व में आंदोलन चलाया गया।
श्रद्धालुओं की भावनाओं को देखते हुए माननीय सुप्रीम कोर्ट ने 21 अक्टूबर 2019 के निर्णय में स्वीकार किया कि यह स्थल गुरु रविदास जी की स्मृति से जुड़ा है। कोर्ट ने सरकार द्वारा गठित भक्तों की समिति को 400 वर्ग मीटर भूमि देने तथा पवित्र तालाब व समाधियों के विकास का आदेश दिया।

पुनर्निर्माण की दिशा में प्रयास

2 दिसंबर 2019 को सरकार ने संत सुखदेव वाघमारे को चेयरमैन बनाकर नौ सदस्यीय समिति गठित की। बाद में 23 दिसंबर 2019 को संत निरंजन दास को चेयरमैन नियुक्त किया गया। 12 फरवरी 2021 को समिति को विधिवत पंजीकृत कराया गया।
लगातार प्रयासों और मासिक प्रार्थना सभाओं के पश्चात 23 सितंबर 2025 को आवश्यक प्रीमियम जमा कर समिति ने DDA से भूमि का आधिकारिक कब्ज़ा प्राप्त किया। उसी स्थल के समीप गुरुजी की प्रतिमा के साथ अस्थायी मंदिर स्थापित किया गया, जहाँ विशाल प्रार्थना सभा आयोजित हुई।
कार्यक्रम में पठानकोट से संत गुरुदीप गिरी जी महाराज, विश्व हिन्दू परिषद के चेयरमैन आलोक कुमार, हरियाणा से आचार्य डॉ. सुनील दास जी तथा उत्तर प्रदेश से वरिष्ठ पत्रकार मौर्यांकुर प्रभात सहित अनेक गणमान्य उपस्थित रहे।

भविष्य की योजना

समिति वर्तमान में मंदिर के अंतिम नक्शे को स्वीकृति देने, भव्य मुख्य द्वार, मुख्य मार्ग से मंदिर तक कंक्रीट सड़क, समाधियों और पवित्र तालाब के पुनर्विकास तथा सुविधाजनक टॉयलेट कॉम्प्लेक्स के निर्माण पर गंभीरता से कार्य कर रही है।
यह मंदिर ‘बेगमपुरा’ की अवधारणा — अर्थात दुःख और भय से मुक्त समाज — को साकार करने का केंद्र बनेगा। यह स्थल आने वाली पीढ़ियों को प्रेम, दया, समानता और सामाजिक समरसता का संदेश देता रहेगा।
समिति सभी श्रद्धालुओं एवं समाज के सजग नागरिकों से इस पावन कार्य में सहयोग और सहभागिता का विनम्र अनुरोध करती है।

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