हमीरपुर पुल हादसा: अखिलेश यादव के बयान से यूपी की राजनीति में उबाल,

Hamirpur bridge accident: Akhilesh Yadav's statement stirs up UP politics
 
हमीरपुर पुल हादसा: अखिलेश यादव के बयान से यूपी की राजनीति में उबाल
क्या करोड़ों रुपये की लागत से बनने वाली सरकारी योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही हैं? अगर एक निर्माणाधीन पुल सिर्फ मौसम की आंधी में ताश के पत्तों की तरह ढह सकता है, तो कल को जब उस पर हजारों वाहनों का ट्रैफिक गुजरेगा, तब आम जनता की सुरक्षा का क्या होगा? और सबसे बड़ा सवाल... हमीरपुर के इस दर्दनाक हादसे पर पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ऐसा क्या कह दिया, जिसने उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में एक नया भूचाल ला दिया है?

उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में बेतवा नदी पर हुआ एक भीषण हादसा अब सिर्फ एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं रह गया है, बल्कि इसने सूबे की सियासत में एक बड़ा तूफान खड़ा कर दिया है। एक निर्माणाधीन पुल का बड़ा हिस्सा अचानक गिर जाने के कारण कई बेकसूर मजदूरों को अपनी जान गंवानी पड़ी, कई लोग गंभीर रूप से घायल हैं और अब इस त्रासदी को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तीखे आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो चुका है।

 आंधी-तूफान या सरकारी लापरवाही? उठ रहे हैं गंभीर सवाल

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बुनियादी सवाल यह खड़ा होता है कि जो पुल अभी आकार ही ले रहा था, वह सामान्य आंधी-तूफान के थपेड़ों को भी क्यों नहीं बर्दाश्त कर सका? क्या इस घटना को सिर्फ एक 'प्राकृतिक आपदा' कहकर पल्ला झाड़ा जा सकता है, या फिर इसके पीछे घटिया निर्माण सामग्री, तकनीकी चूक और भ्रष्टाचार का कोई बड़ा खेल छिपा हुआ है?

इसी संवेदनशील मुद्दे को लेकर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने योगी सरकार पर चौतरफा हमला बोला है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (पहले ट्विटर) पर इस घटना को बेहद दुखद बताते हुए मृतकों के परिवारों के लिए न्याय की मांग की।

अखिलेश यादव ने सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए आरोप लगाया कि वर्तमान शासनकाल में विकास के नाम पर होने वाले अधिकांश निर्माण कार्यों में भारी कमीशनखोरी चल रही है। उन्होंने कहा कि यही वजह है कि कहीं पुल गिर रहे हैं, कहीं पानी की टंकियां ध्वस्त हो रही हैं, तो कहीं रेलवे स्टेशनों की दीवारें और सरकारी इमारतों की छतें पहली बारिश भी नहीं झेल पा रही हैं।अखिलेश यादव का सबसे चर्चित बयान: "जो पुल महज हवा के झोंके से जमींदोज हो जा रहे हैं, उन पर भविष्य में जब भारी ट्रैफिक का संचालन होगा, तब क्या स्थिति होगी... यह कल्पना करके ही रूह कांप जाती है।" विपक्ष का यह सवाल सीधे तौर पर आम जनता की सुरक्षा और सरकारी दावों की प्रामाणिकता पर चोट करता है।

रोम जल रहा था और नीरो बंसी बजा रहा था" – सपा प्रवक्ता का तंज

सपा के वरिष्ठ प्रवक्ता मनोज काका ने भी इस मुद्दे पर सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सीधे सवाल करते हुए पूछा कि इन लगातार गिरते पुलों और ढांचों की नैतिक जिम्मेदारी आखिरकार कौन तय करेगा? मनोज काका ने तंज कसते हुए कहा कि जिस तरह प्रदेश में पेपर लीक की घटनाओं पर युवाओं का भविष्य दांव पर लगता है, ठीक उसी तरह निर्माण कार्यों में होने वाली ये धांधलियां जनता के पैसे और उनकी जिंदगी के साथ खिलवाड़ हैं। उन्होंने इस स्थिति की तुलना ऐतिहासिक मुहावरे से करते हुए कहा कि "जब रोम जल रहा था, तब नीरो चैन की बंसी बजा रहा था।

 क्या था पूरा हादसा? (Ground Reality of Hamirpur Incident)

अगर जमीनी हकीकत की बात करें, तो हमीरपुर जिले में बेतवा नदी के ऊपर एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़े पुल का निर्माण कार्य चल रहा था। स्थानीय कनेक्टिविटी के लिहाज से यह प्रोजेक्ट बेहद अहम था। लेकिन बीती रात आए तेज अंधड़ और मौसम के बिगड़े मिजाज के बीच इस निर्माणाधीन पुल का एक बड़ा हिस्सा अचानक भरभराकर ढह गया।

हादसा इतना अचानक और भयावह था कि वहां काम कर रहे रात के शिफ्ट के कई मजदूर मलबे के नीचे दब गए। सूचना मिलते ही स्थानीय प्रशासन और राहत-बचाव दल (Resuscitation and Rescue Teams) मौके पर पहुँचे। कई घंटों के कड़े रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद मलबे से लोगों को निकाला गया, लेकिन तब तक 6 मजदूरों की मौत हो चुकी थी। कई अन्य घायल मजदूरों का अस्पताल में इलाज चल रहा है।

 सरकारी मुआवजा बनाम जवाबदेही

हादसे के तुरंत बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गहरा दुख प्रकट करते हुए प्रशासनिक अधिकारियों को घायलों के समुचित इलाज और राहत कार्य में तेजी लाने के कड़े निर्देश दिए। साथ ही सरकार की तरफ से मृतकों के आश्रितों को पांच-पांच लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की गई है।

लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों और विपक्ष का मानना है कि केवल मुआवजे की घोषणा कर देने से असली सवाल खत्म नहीं हो जाते। मुख्य मुद्दा यह है कि इस तकनीकी खराबी या लापरवाही के पीछे जो भी अधिकारी, इंजीनियर या ठेकेदार शामिल हैं, क्या उन पर कोई कड़ी कानूनी कार्रवाई होगी? क्या इस पूरे मामले की कोई निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच कराई जाएगी?

ढहती साख और सुरक्षा का संकट

यह कोई पहला मौका नहीं है जब देश या प्रदेश में किसी बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना की गुणवत्ता को लेकर इस तरह के गंभीर सवाल उठे हों। पिछले कुछ समय में देश के विभिन्न हिस्सों से बुनियादी ढांचों के ढहने की खबरें आती रही हैं। हमीरपुर की यह हालिया घटना एक बार फिर सरकारी निर्माण कार्यों की निगरानी प्रणाली (Monitoring System) और ऑडिट व्यवस्था पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है। अब देखना यह होगा कि शासन इस संवेदनशील मामले की जांच को किस अंजाम तक पहुँचाता है और क्या वास्तव में दोषियों पर सख्त एक्शन लिया जाता है या फिर यह मामला भी वक्त के साथ फाइलों में दबकर रह जाएगा।

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