स्वास्थ्य सेवाएँ: योग्यता बनाम समझौता

The game of paralyzing health services
 
स्वास्थ्य सेवाएँ: योग्यता बनाम समझौता

(डॉ. सुधाकर आशावादी – विनायक फीचर्स)   किसी भी राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए यह अनिवार्य है कि आम नागरिक को उपलब्ध कराई जाने वाली स्वास्थ्य सेवाएँ निपुण, प्रशिक्षित और योग्य चिकित्सकों द्वारा संचालित हों। स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील क्षेत्र को अक्षम और अयोग्य चिकित्सकों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। यही कारण है कि विशेष रोगों के उपचार हेतु चिकित्सकों को विशेषज्ञ बनाने के लिए एम.डी. एवं एम.एस. जैसे स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों की व्यवस्था की गई है, जिनमें प्रवेश का माध्यम नीट पीजी परीक्षा है।

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अब तक इस परीक्षा में प्रवेश के लिए स्पष्ट और पूर्व निर्धारित अर्हता मानक रहे हैं—अनारक्षित वर्ग के लिए न्यूनतम 50 प्रतिशत तथा आरक्षित वर्ग के लिए 40 प्रतिशत अंक। किंतु इस वर्ष पीजी पाठ्यक्रम की अनेक सीटें न्यूनतम अर्हता पूर्ण न होने के कारण रिक्त रहने की आशंका के चलते स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा एक अत्यंत विवादास्पद निर्णय लिया गया है। सामान्य वर्ग के लिए पर्सेंटाइल को 50 प्रतिशत से घटाकर मात्र 7 प्रतिशत तथा आरक्षित वर्ग के लिए 40 प्रतिशत से घटाकर शून्य पर्सेंटाइल कर दिया गया है।

स्वास्थ्य मंत्रालय भले ही इस कटौती को सीटें भरने की आवश्यकता के नाम पर उचित ठहराए, किंतु सामान्य समझ रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस निर्णय को तर्कसंगत और जनहितकारी नहीं मान सकता। जब स्वास्थ्य सेवाओं में गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता, तब सात प्रतिशत या शून्य पर्सेंटाइल पर पीजी में प्रवेश को कैसे जायज़ ठहराया जा सकता है?
विचारणीय तथ्य यह भी है कि शिक्षा, स्वास्थ्य एवं अन्य आवश्यक जनोपयोगी सेवाओं में निपुणता के मानकों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। ऐसे क्षेत्रों में यदि अर्हता से समझौता किया जाएगा, तो उसके दुष्परिणाम सीधे जनमानस के जीवन पर पड़ेंगे। यदि बिना न्यूनतम योग्यता के किसी अभ्यर्थी को चिकित्सा जैसे गंभीर विषय में विशेषज्ञ बनने की अनुमति दे दी जाए, तो इस बात की क्या गारंटी है कि वह भविष्य में मरीजों का समुचित और सुरक्षित उपचार कर सकेगा?
विडंबना यह है कि आरक्षण की अवधारणा को इसी प्रकार के अतार्किक और अविवेकपूर्ण निर्णयों के माध्यम से विकृत किया जा रहा है। कहीं शून्य अंक प्राप्त करने वाले व्यक्ति को विषय विशेषज्ञ बनाकर शिक्षक नियुक्त किया जा रहा है, तो कहीं चिकित्सा जैसे जीवन-मरण से जुड़े क्षेत्र में गुणवत्ता को ही उपहास का विषय बना दिया गया है।
आवश्यक है कि जनसामान्य के जीवन से जुड़े गंभीर विषयों को गंभीरता और दूरदर्शिता के साथ देखा जाए। देश के स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बुनियादी क्षेत्रों में गुणवत्ता के विरुद्ध किसी भी प्रकार का समझौता राष्ट्रहित में नहीं हो सकता। नीट पीजी परीक्षा में न्यूनतम अर्हता प्राप्त न करने वाले अभ्यर्थियों को स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में प्रवेश देने के लिए दी गई इस छूट पर तत्काल पुनर्विचार किया जाना चाहिए।
अन्यथा स्वास्थ्य सेवाओं को पंगु बनाने की दिशा में उठाया गया यह कदम न केवल जनस्वास्थ्य के लिए घातक सिद्ध होगा, बल्कि दीर्घकाल में राष्ट्र के लिए भी अत्यंत नुकसानदायक साबित होगा—इसमें कोई संदेह नहीं है।

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