नेता मार्केट में गर्मी, गिरते ही बढ़ जाता है रेट
(मुकेश "कबीर" — विभूति फीचर्स)
आजकल लगभग हर बाजार में मंदी की चर्चा है। शेयर बाजार हो, रियल एस्टेट हो या आम जरूरतों का बाजार—हर तरफ खरीदारी सुस्त बताई जा रही है। लेकिन एक बाजार ऐसा है जहां इन दिनों जबरदस्त तेजी है। यह है 'नेता मार्केट'। यानी सांसदों और विधायकों की राजनीतिक खरीद-फरोख्त का वह बाजार, जहां सरकार का बहुमत थोड़ा डगमगाया नहीं कि बोली लगनी शुरू।
इस बाजार में सस्ता, सुंदर और टिकाऊ वाला फार्मूला बिल्कुल नहीं चलता। यहां असली मांग है—गिरता हुआ, सरेंडर करता हुआ और बिकाऊ। बाजार का भी अपना दर्शन है कि जो चीज गिरती है, वही उठाई जाती है। उठता हुआ नेता भला क्यों बिकेगा? वह तो खुद दूसरों को उठाने या गिराने के मिशन में लगा रहता है। और टिकाऊ नेता की तो हालत ही खराब है—वह बिकेगा कैसे? आखिर टिकाऊ और बिकाऊ एक ही सिक्के के दो पहलू तो हो नहीं सकते।
खैर, परिभाषाओं में उलझने से क्या फायदा। असली मुद्दा यह है कि नेता मार्केट में इन दिनों रौनक है। राज्य हो या केंद्र, जैसे ही कहीं सरकार बहुमत के आंकड़े से नीचे जाने की आशंका पैदा होती है, बाजार के दलाल सक्रिय हो जाते हैं और राजनीतिक भाव-ताव शुरू हो जाता है।
हालांकि इस बाजार के भी कुछ नियम हैं। आप यह जानकर खुश हो सकते हैं कि राजनीति में अभी भी नियम-कायदे पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।
पहला नियम है—स्थानीय माल की खरीदारी स्थानीय स्तर पर ही होगी। अगर किसी राज्य में विधायक उपलब्ध नहीं हैं तो दूसरे राज्य से विधायक उठाकर लाने की सुविधा अभी बाजार में उपलब्ध नहीं है। महाराष्ट्र में कमी हो तो बिहार से माल मंगाने का नियम नहीं है। यही सिद्धांत सांसदों पर भी लागू होता है। देश के सांसदों की खरीदारी देश की सीमा के भीतर ही करनी होगी। आखिर देसी माल की अपनी अहमियत है।
विदेशी सांसदों का क्या भरोसा! कहीं दिल्ली पहुंचते ही खराब निकल गए तो? और अगर जरूरत से ज्यादा टिकाऊ निकले तो स्थानीय नेताओं का बाजार ही चौपट हो जाएगा। दोनों ही स्थितियां लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय हो सकती हैं।
वैसे देश और राजनीति दो अलग-अलग चीजें हैं, लेकिन कभी-कभी दोनों का मिलना जरूरी हो जाता है। जैसे तेज प्यास लगने पर शेर और बकरी एक ही घाट पर पानी पी लेते हैं। देश भी बेचारे उस बकरी जैसा ही है। उससे सबको कुछ न कुछ मिलता है, मगर सबसे ज्यादा प्रयोग भी उसी का होता है।
बकरी को प्यार से पाला जाता है। कभी-कभी उसे काजू, किशमिश और बादाम तक खिलाए जाते हैं। लेकिन इतिहास गवाह है कि सबसे ज्यादा कुर्बानी भी उसी की होती है। मुफ्त का मेवा खाते समय बकरी को यह ख्याल नहीं आता कि आखिर इतनी मेहरबानी के पीछे मंशा क्या है। उसे लगता है—जो इतने प्यार से काजू खिला रहा है, वह भला नुकसान क्यों करेगा?
यही मुफ्त की रेवड़ी वाला दर्शन हमारी राजनीति में भी खूब चलता है। जनता के सामने जब काजू-किशमिश की प्लेट सजती है तो सवाल पूछने का समय किसके पास है? चुनावी मौसम में योजनाओं का झोला खुलता है और नाराज मतदाता के सामने तरह-तरह की रेवड़ियां पेश कर दी जाती हैं।
कभी बहनों के लिए योजना, कभी युवाओं के लिए सुविधा, कभी किसानों के लिए राहत और कभी किसी दूसरे वर्ग के लिए कोई नया पैकेज। झोला बड़ा होना चाहिए, क्योंकि राजनीति में पता नहीं कब किसे क्या चाहिए पड़ जाए।
और अगर कभी कोई माननीय खुद नाराज हो जाए तो वही झोला उठाकर जाने की धमकी भी दे देता है। हालांकि अधिकांश मामलों में झोला उठता जरूर है, लेकिन माननीय कहीं जाते नहीं। बस राजनीतिक भौकाल थोड़ा बढ़ जाता है।
आजकल असली ताकत भी शायद इसी भौकाल में है। आप वास्तव में कितने मजबूत हैं, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो गया है कि आपको देखकर बाकी लोग आपको कितना मजबूत समझते हैं। राजनीति में जिसका भौकाल बड़ा, उसका भाव बड़ा। और जिसका भाव बड़ा, वही नेता मार्केट का प्रीमियम माल!
यही वजह है कि राजनीतिक बाजार में इन दिनों गर्मी बनी हुई है। कहीं जोड़-तोड़, कहीं मान-मनौव्वल, कहीं नाराजगी, कहीं समर्थन और कहीं समर्थन वापस लेने की धमकी—लोकतंत्र का बाजार अपने पूरे रंग में है।
अब देखना यह है कि नेता मार्केट की यह तेजी कितने दिन कायम रहती है। बाजार गर्म है, खरीदार बेचैन हैं और माल अपनी कीमत का इंतजार कर रहा है।
हम भी इंतजार करेंगे...
कयामत तक!
क्योंकि लोकतंत्र के इस बाजार में दर्शक बनने के अलावा आम आदमी आखिर कर भी क्या सकता है?
