मंजूषा कला की ऐतिहासिकता एवं सांस्कृतिक विस्तार
पारंपरिक विषयवस्तु: बिहुला-विषहरी की लोकगाथा
मंजूषा कला का मूल आधार बिहुला-विषहरी की पौराणिक गाथा है। यह कथा मुख्य रूप से तीन पात्रों के इर्द-गिर्द घूमती है:
-
मनसा विषहरी: भगवान शिव की मानसपुत्री और सर्पों की देवी, जो पृथ्वी लोक पर अपनी पूजा का अधिकार चाहती हैं।
-
चांदो सौदागर: चम्पानगर के परम शिव भक्त और एक प्रतापी व्यापारी, जो मनसा देवी की पूजा का विरोध करते हैं।
-
सती बिहुला: चांदो सौदागर के पुत्र बाला की पत्नी, जो अपने पति को सर्पदंश से बचाने और जीवित करने के लिए संघर्ष व समन्वय की प्रतीक बनती हैं।
अंग प्रदेश का समृद्ध सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक फलक
लेखक के अनुसार, मंजूषा कला को केवल एक लोकगाथा तक सीमित न रखकर इसमें अंग भूमि के निम्नलिखित गौरवशाली प्रसंगों को भी समाहित किया जाना चाहिए: शिव-भूमि: अंग प्रदेश का जुड़ाव भगवान शिव से गहरा है। यहीं के उत्तरवाहिनी गंगा तट (सुलतानगंज) से विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला का आगाज़ होता है। समुद्र मंथन व कामदेव भस्म पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी क्षेत्र में स्थित मंदार पर्वत को मथनी बनाकर समुद्र मंथन किया गया था, जहाँ से निकले विष का पान कर शिव 'नीलकंठ' कहलाए। कामदेव भी शिव के त्रिनेत्र से यहीं भस्मीभूत हुए थे, जिसके कारण इस क्षेत्र का नाम 'अंग' पड़ा।
रामायण एवं महाभारत काल रामायण काल में यहाँ के राजा रोमपाद के प्रयास से ऋषि श्रृंगी ने दशरथ के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ किया था। महाभारत काल में यह भूमि दानवीर कर्ण के राज्य के रूप में अमर हुई। धार्मिक व दार्शनिक केंद्र यह भूमि १२वें जैन तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य, सम्राट अशोक की माता शुभ्रदांगी, बौद्ध भिक्षुणी विशाखा, और विक्रमशिला के आचार्य दीपंकर की कर्मभूमि रही है। भगवान बुद्ध और भगवान महावीर ने भी चम्पा की गग्गरा पुष्करिणी में वर्षावास किया था।
पुरातात्विक साक्ष्य (Archaeological Evidences)
विभिन्न इतिहासकारों (जैसे एन.एल. डे, आर.सी. मजूमदार आदि) के शोध बताते हैं कि यह लोकगाथा कोई कोरी कल्पना नहीं है, बल्कि इसके ठोस प्रमाण मिलते हैं
| पुरातात्विक स्थल | प्राप्त अवशेष / साक्ष्य |
| विक्रमशिला बौद्ध महाविहार (8वीं से 12वीं सदी) | खुदाई में सर्प आकृतियों से युक्त देवी विषहरी की दो प्राचीन मूर्तियां मिलीं, जो 100- वर्ष पुरानी पूजन परंपरा को दर्शाती हैं। |
| चम्पानगर (प्राचीन अंग की राजधानी) | पटना विश्वविद्यालय की खुदाई में नाग-नागिन व मातृ देवियों की मूर्तियां और सर्प आकृति उत्कीर्ण एक प्रस्तर (पत्थर) स्तंभ मिला, जो प्राचीन नाग मंदिर के होने की पुष्टि करता है। |
भौगोलिक एवं पर्यावरणीय दृष्टिकोण
तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के जूलॉजी (प्राणि विज्ञान) विभाग के एक शोध के अनुसार, इस क्षेत्र में सर्प-पूजन के पीछे एक व्यावहारिक भौगोलिक कारण भी है: यह क्षेत्र मध्य गंगा-घाटी में स्थित है, जहाँ दलदली ज़मीन और घने जंगलों के कारण मानसून में बड़ी संख्या में सांप निकलते हैं। यहाँ कुल18 प्रजातियों के सांप पाए जाते हैं, जिनमें से ६ अत्यंत विषैले हैं। इसी प्राकृतिक प्रकोप से रक्षा के लिए लोक-जीवन में सर्प देवी मनसा की पूजा शुरू हुई। बिहुला-विषहरी की कथा में भी इन सर्पों का बेहद जीवंत वर्णन है।
भविष्य की राह विषयवस्तु का विस्तार
बिहार संग्रहालय के कला-मर्मज्ञ निदेशक अशोक कुमार सिन्हा की अध्यक्षता में आयोजित एक कार्यशाला में लेखक श्री शिवशंकर सिंह पारिजात ने यह महत्वपूर्ण सुझाव दिया कि मंजूषा कला को वैश्विक स्तर पर और अधिक समृद्ध बनाने के लिए बिहुला-विषहरी की कथा के साथ-साथ अंग प्रदेश के सांस्कृतिक, पुरातात्विक और ऐतिहासिक प्रसंगों को भी चित्रों में उकेरा जाना चाहिए। इस पहल पर वरिष्ठ मंजूषा कलाकार उलूपी झा सहित अन्य विशेषज्ञों ने भी सहमति जताई है, ताकि मधुबनी पेंटिंग की तरह मंजूषा भी वैश्विक कला बाज़ार में नए आयाम स्थापित कर सके।
