जमाखोरों और मुनाफाखोरों पर निगाह जरूरी
हर वर्ष बरसात के मौसम में प्याज की आपूर्ति प्रभावित होने के कारण उसके दाम बढ़ जाते हैं। चिंता की बात यह है कि ऐसी स्थिति बार-बार सामने आने के बावजूद सरकार इससे स्थायी सबक नहीं लेती और कीमतें बढ़ने के बाद सक्रिय होती है। यही स्थिति चीनी के मामले में भी देखने को मिली, जब कीमतों में वृद्धि के बाद सरकार को आयात का निर्णय याद आया। आयातित चीनी के आने में समय लगेगा और तब तक उपभोक्ताओं को महंगी चीनी खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।
यदि सरकार के पास प्याज का बफर स्टॉक उपलब्ध है तो उसे समय रहते बाजार में उतारा जाना चाहिए, ताकि आपूर्ति बनी रहे और कीमतों में अनावश्यक वृद्धि न हो। कृषि प्रधान देश होने के बावजूद आज भी हमें दलहन और तिलहन का बड़े पैमाने पर आयात करना पड़ता है। आजादी के आठ दशक बाद भी हम इन फसलों के उत्पादन में आत्मनिर्भर क्यों नहीं हो पाए हैं, इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
हमारी सरकारी मशीनरी की एक पुरानी कार्यशैली रही है कि समस्या सामने आने के बाद उसके समाधान के लिए कदम उठाए जाते हैं। इस व्यवस्था में बदलाव जरूरी है। महंगाई और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण केवल केंद्र सरकार की जिम्मेदारी नहीं हो सकती, बल्कि राज्य सरकारों को भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
फसलों के उत्पादन, भंडारण और वितरण की नियमित निगरानी के साथ-साथ जमाखोरी और मुनाफाखोरी पर भी कड़ी नजर रखनी होगी। बाजार में कृत्रिम कमी पैदा करने वालों के खिलाफ समय रहते प्रभावी कार्रवाई हो, तभी आम उपभोक्ताओं को राहत मिल सकेगी। सरकारों को संकट आने का इंतजार करने के बजाय पहले से तैयारी और बेहतर प्रबंधन की नीति अपनानी होगी।
