हिमालय को उजाड़कर खुशहाली की उम्मीद कैसे?

How can we expect prosperity by destroying the Himalayas?
 
How can we expect prosperity by destroying the Himalayas?
(अंजनी सक्सेना –विभूतिफीचर्स)  हिमालय सिर्फ बर्फ से ढके पहाड़ों का नाम नहीं, बल्कि भारत की जीवनरेखा है। यहां के वन, नदियां, जलवायु और जैव विविधता पूरे देश की पर्यावरणीय और आर्थिक सेहत को संजोए रखते हैं। लेकिन हाल के दशकों में अंधाधुंध दोहन, अवैध कटाई, खनन और अनियोजित निर्माण कार्यों ने इस पर्वतीय स्वर्ग को गंभीर संकट में डाल दिया है।

देवदार की कटाई और संकट का बढ़ता दायरा

पर्यावरणीय अध्ययनों के अनुसार, हिमालयी वनों के संसाधनों के बेतरतीब उपयोग ने यहां वनस्पति संकट को चरम पर पहुंचा दिया है। लाखों देवदार के पेड़ों की कटाई ने न सिर्फ स्थानीय पारिस्थितिकी को कमजोर किया, बल्कि दून घाटी और कार्बेट नेशनल पार्क जैसे क्षेत्रों में भी असंतुलन बढ़ाया।
टिहरी-गढ़वाल में सुंदरलाल बहुगुणा और उनके साथियों ने जब अवैध कटाई का विरोध किया और पेड़ों को ‘रक्षा सूत्र’ बांधकर बचाने का प्रयास किया, तो यह आंदोलन ‘चिपको’ की तरह लोकप्रिय हुआ। बावजूद इसके, सरकारी उदासीनता और राजनीतिक-आर्थिक हितों ने वनों को बचाने के प्रयासों को कमजोर कर दिया।

पर्यटन और खनन का दुष्प्रभाव

बड़े पैमाने पर खनन लीज, सीमेंट फैक्ट्रियां और पर्यटन अवसंरचना ने हालात और बिगाड़ दिए। गंगोत्री, यमुनोत्री और बद्रीनाथ तक होटलों और ढाबों की भरमार से प्रदूषण बढ़ा है। एक अध्ययन के अनुसार, गंगोत्री ग्लेशियर हर साल करीब 15 मीटर पीछे हट रहा है, जिससे जल स्रोतों पर खतरा मंडरा रहा है।

इतिहास से सबक न लेना

1830 के दशक में अंग्रेज व्यापारी फैडरिक विल्सन ने देवदार की कटाई का जो सिलसिला शुरू किया, वह आज भी थमा नहीं। गढ़वाल गैजेटियर के मुताबिक, उसने 600 एकड़ में फैले दो लाख से अधिक देवदार के पेड़ काटे। दुर्भाग्य यह है कि आज भी सड़क, होटल और अन्य निर्माण परियोजनाओं के नाम पर हजारों पेड़ गिराए जा रहे हैं। धराली जैसी हालिया आपदाएं इसी का परिणाम हैं।

सरकारी नीतियां और पर्यावरणीय उपेक्षा

पूर्व पर्यावरण मंत्री तक पर आरोप लगे कि उन्होंने हिमालयी क्षेत्रों में आलीशान होटलों के लिए नदियों के बहाव मार्ग तक मोड़ने की कोशिश की। आज भी कई निर्माण परियोजनाएं नदियों का रास्ता रोककर बनाई जा रही हैं, जिससे न केवल पारिस्थितिकी बल्कि स्थानीय समुदाय भी संकट में हैं।

प्लास्टिक प्रदूषण और नदियों की दुर्दशा

हरिद्वार और ऋषिकेश जैसे तीर्थस्थलों पर गंगा के किनारों पर प्रतिदिन हजारों टन प्लास्टिक कचरा जमा हो रहा है। पहाड़ी इलाकों में बोतलबंद पानी और प्लास्टिक थैलियों का इस्तेमाल बेहिसाब बढ़ा है, जिससे भूमिगत जलस्तर गिर रहा है और नदियां प्रदूषित हो रही हैं।

वैज्ञानिक चेतावनियां

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते वनों का पुनर्विकास नहीं किया गया, तो भविष्य में हालात और भी गंभीर होंगे। हिमालयी क्षेत्रों से संवेदनशील गांवों को हटाने तक की सिफारिश की जा रही है, ताकि बड़े पैमाने पर होने वाली आपदाओं को रोका जा सके।

विकास और पर्यावरण का संतुलन

प्रगति और विकास जरूरी हैं, लेकिन यह संतुलित और योजनाबद्ध होना चाहिए। अनियंत्रित निर्माण और बेढंगे दोहन से न केवल हिमालय की पारिस्थितिकी, बल्कि पूरे देश का जल, मौसम और सुरक्षा तंत्र प्रभावित होगा।
आखिरकार, हिमालय जो हमारी सुरक्षा की दीवार और जीवन रेखा है, उसे उजाड़कर हम खुशहाली की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?

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