जलवायु संकट के मुहाने पर खड़ी मानवता: आर्थिक प्रगति और पर्यावरणीय विनाश का द्वंद्व

तेजी से गहराता वैश्विक तापमान का संकट
जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल, गैस) के अत्यधिक उपयोग, वनों की कटाई और अनियंत्रित औद्योगिक गतिविधियों से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है।
-
तापमान वृद्धि: पृथ्वी के वायुमंडल में कैद होती गर्मी के कारण मौसमी चक्र अनियंत्रित हो गया है।
-
समुद्री ऊष्मा तरंगें (Marine Heatwaves): समुद्रों का बढ़ता तापमान जलीय जीवन, जैव विविधता और तटीय आर्थिकी को तबाह कर रहा है।
-
समुद्री अम्लीकरण और जलस्तर: महासागर, जो धरती की 50 से 85 फीसदी ऑक्सीजन पैदा करते हैं और मुख्य कार्बन सिंक हैं, तेजी से अम्लीय हो रहे हैं और उनका बढ़ता जलस्तर तटीय शहरों के अस्तित्व पर सवाल खड़ा कर रहा है।
कार्बन निष्कासन (CDR) की सीमाएं
पेरिस समझौते के तहत वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने के लिए केवल उत्सर्जन रोकना काफी नहीं है; वायुमंडल से कार्बन सोखकर सुरक्षित रखने (कार्बन डाइऑक्साइड निष्कासन - CDR) की भी जरूरत है। हालांकि, मौजूदा समय में विश्व के पास बड़े पैमाने पर CDR लागू करने के लिए आवश्यक तकनीक और संसाधनों का अभाव है। यह तकनीक अभी शुरुआती दौर में है और इसके व्यापक पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन होना बाकी है।
आर्द्रभूमि (Wetlands): प्रकृति का सबसे मजबूत सुरक्षा कवच संकट में
दलदली जमीन और आर्द्रभूमियां कार्बन अवशोषण के लिहाज से सबसे असरदार प्राकृतिक तंत्र हैं। बाढ़ के मैदानों की दलदली भूमि को पुनर्जीवित करने से कार्बन उत्सर्जन में लगभग 39% तक की कमी लाई जा सकती है। इसके बावजूद:
-
वर्ष 1970 से अब तक विश्व स्तर पर 35% वेटलैंड्स खत्म हो चुके हैं।
-
भारत ने पिछले तीन दशकों में अपनी करीब 30% आर्द्रभूमि गंवा दी है।
-
वर्तमान में भारत 75 से अधिक रामसर साइट्स और 13 लाख हेक्टेयर से अधिक आर्द्रभूमि क्षेत्र के साथ दक्षिण एशिया में अग्रणी है। अकेले मध्य प्रदेश में 12,741 वेटलैंड्स का सीमांकन हो चुका है, लेकिन भोपाल और जबलपुर जैसे शहरों में बिल्डरों और रसूखदारों द्वारा इन पर किया जा रहा अवैध कब्जा गंभीर चिंता का विषय है।
व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर आवश्यक पहल
जलवायु आपदा को रोकने की जिम्मेदारी केवल सरकारों की नहीं, बल्कि हर नागरिक की है। दैनिक जीवन में छोटे बदलाव बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं:
-
हरित आवागमन: निजी वाहनों के बजाय सार्वजनिक परिवहन, साइकिल या पैदल चलने को प्राथमिकता देना।
-
संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग: कचरे में कमी लाना, 'रीयूज' और 'रीसाइकिल' की नीति अपनाना तथा ऊर्जा की बर्बादी रोकना।
-
स्थायी खान-पान: पौधों पर आधारित (प्लांट-बेस्ड) आहार को बढ़ावा देकर पशुपालन से होने वाले उत्सर्जन को सीमित करना।
यदि आर्थिक तरक्की के मौजूदा मॉडल को पर्यावरण संरक्षण के साथ संतुलित नहीं किया गया, तो दशकों की मानव प्रगति एक झटके में जलवायु आपदा की भेंट चढ़ जाएगी।
