पति, पत्नी, प्रेमी और पंचायत

Husband, Wife, Lover and Panchayat
 
पति, पत्नी, प्रेमी और पंचायत
(मुकेश "कबीर" – विभूति फीचर्स)
आपने पति-पत्नी और वो वाली कहानियाँ तो खूब सुनी होंगी, लेकिन उत्तर प्रदेश के रामपुर की एक पंचायत में हाल ही में ऐसा मामला सामने आया जिसने सबको चौंका दिया। मामला है – पति, पत्नी और प्रेमी का!
शादीशुदा महिला ने पंचायत से निवेदन किया कि उसे 15 दिन पति और 15 दिन प्रेमी के साथ रहने की इजाज़त दी जाए। खबर फैली तो सोशल मीडिया पर ऐसी हलचल मच गई जैसे किसी "काने लड़के" की शादी तय होते ही उसकी मूंछों पर ताव आ जाता है।

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अब बेचारे सरपंच जी की मुश्किल समझिए – चारों युग बीत गए, लेकिन ऐसा अजीबो-गरीब केस न किसी दरबार में आया न अदालत में। हमने तो सरपंच को यही सलाह दी कि अगर सूझ न रहा हो तो अमेरिका वाले "भूरा भाई" से मदद ले लीजिए। आखिर समझौते करवाने में उनका वर्ल्ड रिकॉर्ड है, हालांकि उनके अपने मामलों में अदालत अक्सर उल्टा फैसला सुना देती है।

मगर असली पेच तो तब फंसा जब सवाल उठा कि महीना अगर 31 दिन का हुआ तो महिला 31वें दिन किसके साथ रहेगी? इस पर हमारे भोपाली मित्र ने तुरंत समाधान सुझाया – “दिन पति के साथ और रात प्रेमी के साथ।” पहली बार हमें उन पर गर्व हुआ कि कोई तो है जो सच्चा न्याय करना जानता है।
अब सोचिए, अगर फैसला पंचायत पर छोड़ा जाता तो महाभारत छिड़ जाती। सरपंच कहते – जनसेवा की शपथ ली है, तो हम ही त्याग करेंगे। लेकिन तभी पंच खड़े हो जाते – “महिला हमारे वार्ड की है, सेवा का मौका हमें मिलना चाहिए।” दूसरा पंच कहता – “पति हमारे वार्ड का है, हमें वंचित नहीं किया जा सकता।” तीसरा पंच फिर टांग अड़ा देता – “प्रेमी हमारे इलाके का है, हक तो हमारा बनता है।” और दरोगा जी? वो तो सबसे आगे – “जनसेवा में हम कब पीछे रहते हैं!”
इतना रायता फैलता कि आखिरकार पति ने ही समझदारी दिखाते हुए कह दिया – “हे भवानी, मुझे माफ करो और प्रेमी के साथ ही रहो।”
भाई, पतिदेव ने तो एक झटके में सारे झंझट खत्म कर दिए। आज फिर "मोगैंबो खुश हुआ।" उनका त्याग भी उसी तरह याद रखा जाएगा जैसे नेताजी बहुमत साबित न कर पाने पर कुर्सी छोड़ते हैं और उनके अनुयायी उसे "महान बलिदान" बताते हैं। फर्क बस इतना है कि नेताजी ने कुर्सी छोड़ी और इन्होंने बहू छोड़ी।
वैसे त्याग तो त्याग होता है, वजह की पड़ताल करना तो मूर्खों का काम है। समझदार लोग तो केवल परिणाम देखते हैं।
और जो लोग गीता की बातें करने लगे – कि "गीता तो परिणाम नहीं, केवल कर्म को महत्व देती है" – तो जनाब! यह कुरुक्षेत्र नहीं, रामपुर है। वही रामपुर जहाँ विधायक की भैंस खोने पर पूरी यूपी पुलिस भैंस ढूंढने में लग गई थी। तब ही इंसानों को समझ आ गया था कि यहां भैंस की कीमत इंसान से ज्यादा है।
तो भैया, रायता फैलते देख तमाशा मत बनाइए। अपने-अपने घर देखिए, वहां सब सही है क्या? कहीं फिफ्टी-फिफ्टी न सही तो ट्वेंटी-ट्वेंटी तो खेला ही जा रहा होगा। जमाना टेस्ट मैचों का तो रहा नहीं!
फिलहाल पंचायत के पास और भी जरूरी काम हैं – सबसे पहले तो यह पता करना कि प्रेमी सिर्फ एक ही है या और भी हैं। ताकि तय हो सके कि महीने को कितने हिस्सों में बांटना पड़ेगा। इट्स वेरी अर्जेन्ट!

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