वैचारिक विमर्श: आत्मीय संबंधों में घटता भरोसा और बढ़ती सामाजिक क्रूरता, आखिर कहाँ जा रहा है हमारा समाज?
-(डॉ. सुधाकर आशावादी-विनायक फीचर्स)
संपादकीय डेस्क: समकालीन समाज में जिस तेजी से हिंसक और अमानवीय घटनाएं बढ़ रही हैं, उसने मानवीय संवेदनाओं पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। आज अखबारों के पन्ने और न्यूज़ चैनलों की सुर्खियां ऐसी जघन्य वारदातों से भरी होती हैं, जिन्हें पढ़कर रूह कांप जाती है। कहीं तथाकथित 'लव जिहाद' के नाम पर युवतियों की निर्मम हत्या हो रही है, तो कहीं बरसों पुरानी दोस्ती का कत्ल महज चंद स्वार्थों के लिए कर दिया जाता है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन वारदातों को अंजाम देने वाले कोई अजनबी नहीं, बल्कि अक्सर वे लोग होते हैं जिन पर पीड़ित ने सबसे ज्यादा भरोसा किया था।
ऐसे में यह बुनियादी प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या आज के दौर में हमारे आत्मीय और पवित्र संबंधों में 'विश्वास का अकाल' पड़ गया है?
रिश्तों की छांव में पनपता अविश्वास
पारंपरिक रूप से भारतीय समाज में जिन पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों को सुरक्षा का कवच माना जाता था, आज वही रिश्ते अविश्वास और डर का कारण बनते जा रहे हैं।
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अपनों से ही खतरा: आज स्थिति यह है कि एक ही छत के नीचे रह रहे वैवाहिक जोड़ों के बीच भी सुरक्षा की गारंटी नहीं दिखती। दोस्ती, जिसे सुख-दुख का सबसे पवित्र साझा मंच माना जाता था, वहां भी पीठ में छुरा घोंपने की प्रवृत्तियां बढ़ रही हैं।
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जंगलराज जैसी मानसिकता: समाज में बेखौफ होकर हत्या और हिंसा जैसे जघन्य अपराधों को अंजाम देना यह दर्शाता है कि इंसानों के भीतर आदिम युग की हिंसक प्रवृत्तियां दोबारा हावी हो रही हैं। ऐसा लगता है कि आत्म-अस्तित्व की आड़ में दूसरों को मिटा देने की जो प्रवृत्ति जंगलों में पाई जाती है, उसने अब सभ्य मानव समाज में भी घुसपैठ कर ली है।
अपराधियों का तुष्टीकरण और जाति-धर्म की लामबंदी
लेखक समाज के एक और स्याह पहलू की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहते हैं कि आज अपराध से भी ज्यादा खतरनाक स्थिति तब पैदा होती है, जब उस अपराध के पक्ष और विपक्ष में समाज खड़ा हो जाता है।
एक कड़वी सच्चाई: आज किसी भी अपराधी की पृष्ठभूमि देखकर लोग उसकी जाति और धर्म के आधार पर गुटों में लामबंद होने लगते हैं। तथाकथित निष्पक्ष मीडिया का एक वर्ग भी अपराधियों के पक्ष में इस तरह का विमर्श (नैरेटिव) गढ़ने की कोशिश करता है, जिससे उनके अमानवीय कृत्यों को कम करके देखा जा सके। समाज में एक ऐसा वर्ग सक्रिय हो चुका है, जो पीड़ित के न्याय से ज्यादा अपराधी के मानवाधिकारों की पैरवी करने में अपनी ऊर्जा लगाता है।
सुस्त कानूनी प्रक्रिया और कड़े दंड विधान की आवश्यकता
इस पूरी समस्या की जड़ में हमारी ढीली और लंबी चलने वाली कानूनी प्रक्रिया भी एक बड़ा कारण है।
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कानूनी दांवपेच का फायदा: वस्तुस्थिति यह है कि जघन्य से जघन्य अपराधों के प्रत्यक्ष प्रमाण होने के बावजूद, अपराधी महंगे वकीलों और कानूनी दांवपेच के सहारे वर्षों तक सजा से बचे रहते हैं। वे जेलों में लंबे समय तक सरकारी सुविधाओं पर जीवित रहते हैं, जिससे उनके मन से कानून का खौफ पूरी तरह खत्म हो जाता है। यही निडरता उन्हें और अन्य अपराधियों को बेखौफ होकर नई वारदातों को अंजाम देने की शह देती है।
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बदलाव का समय: अब वह समय आ चुका है जब हमें अपनी न्याय प्रणाली और दंड विधान की समीक्षा करनी होगी। समाज में बढ़ती इस क्रूरता और रोज-रोज होने वाली हिंसक पुनरावृत्तियों पर अंकुश लगाने के लिए जघन्य अपराधियों के खिलाफ त्वरित अदालत (Fast Track Court) और अत्यंत कठोर दंड का प्रावधान अनिवार्य किया जाना चाहिए, ताकि कानून का डर समाज में शांति बहाल कर सके।

