वैचारिक विमर्श: वोट बैंक की राजनीति के आगे दम तोड़ता राष्ट्र धर्म, कब जागेगा समाज का प्रबुद्ध वर्ग?
(डॉ. सुधाकर आशावादी - विभूति फीचर्स)
चल रहे हैं दौर विष के देवता के आवरण में, रात की काली लता है भोर के नवजागरण में। देश का दुर्भाग्य मित्रों क्या भला तुलसी लिखेंगे, साथ देते हैं जटायु, आज के सीता हरण में।
साहित्यिक एवं वैचारिक कोना: किसी भी भूभाग को मात्र नक्शे पर रेखाएं खींच देने या वहां आबादी के बस जाने से 'राष्ट्र' की संज्ञा नहीं दी जा सकती। एक भूभाग तब तक राष्ट्र नहीं बनता, जब तक कि उसके भीतर निवास करने वाले नागरिकों के दिलों में संपूर्ण राष्ट्र के प्रति समर्पण, त्याग और एकात्मता का भाव न हो।

दुर्भाग्यवश, आज आधुनिकता के दौर में भी हमारे समाज की सोच का दायरा संकुचित होता जा रहा है। अपने और पराए के भेद से ऊपर उठकर जब व्यक्ति केवल व्यक्तिगत स्वार्थ, फिर जातिवाद और अंततः क्षेत्रवाद की संकीर्ण सीमाओं में बंध जाता है, तो राष्ट्र की अवधारणा कमजोर होने लगती है। भारतीय राजनीति का वर्तमान ताना-बाना इसी संकीर्णता पर टिका हुआ है।
धर्मनिरपेक्षता का मुखौटा और जातीय संकीर्णता का कड़वा सच
दिखावे के लिए समाज के तथाकथित दिशानायक और राजनीतिक नेतृत्व स्वयं को पंथनिरपेक्ष (Secular) घोषित करते हैं, लेकिन उनका अंतर्निहित जातीय लगाव और संकीर्ण सोच समय-समय पर उनके आचरण और बयानों से जगजाहिर होती रहती है। देश की विघटनकारी शक्तियां भी इसी ताक में रहती हैं कि कैसे समाज को जाति, मजहब, क्षेत्र और भाषा के आधार पर बांटकर आपस में लड़ाया जाए और अपना राजनीतिक उल्लू सीधा किया जाए।
इन षड्यंत्रकारी चालों का सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि देश का आम नागरिक अपने मूल राष्ट्रीय कर्तव्यों, राष्ट्र चिंतन और राष्ट्र समर्पण जैसे दायित्वों से विमुख हो जाता है। इसी का दुष्परिणाम समाज को सांप्रदायिक दंगों, जातीय वैमनस्य और सामाजिक टकराव के रूप में भुगतना पड़ता है। आज स्थिति यह है कि किसी भी आपराधिक घटना को मानवीय दृष्टिकोण से देखने के बजाय 'जातीय चश्मे' से देखा जाता है, मानो किसी एक व्यक्ति के अपराध के लिए उसकी पूरी जाति उत्तरदायी हो।
राजनीतिक दलों के घड़ियाली आंसू और विसंगतिपूर्ण नीतियां
वोट बैंक का गणित: राजनीतिक दल किसी भी पीड़ित का दर्द समझने से पहले उसकी जाति और मजहब का आकलन करते हैं। घड़ियाली आंसू बहाने और सांत्वना देने की स्क्रिप्ट भी उन्हीं स्थानों के लिए लिखी जाती है, जहां पीड़ित वर्ग का वोट बैंक उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और चुनावी वैतरणी को पार लगाने में सहायक सिद्ध हो सके।
विश्व के किसी भी अन्य लोकतांत्रिक देश में समाज को विभाजित करने वाली ऐसी भेदभावपूर्ण नीतियां देखने को नहीं मिलतीं, जैसी आज हमारे देश में प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर लागू हैं।
आज सरकारी दृष्टिकोण भी अमानवीय प्रतीत होता है। सरकारें किसी व्यक्ति के पिछड़ेपन का पैमाना उसकी आर्थिक स्थिति, जीवन यापन के संसाधनों की कमी या उसकी वास्तविक लाचारी को नहीं मानतीं। सरकारी चश्मे से पूरी की पूरी जाति को पिछड़ा या समृद्ध घोषित कर दिया जाता है। इस व्यवस्था में यह मान लिया गया है कि किसी खास वर्ग में कोई व्यक्ति गरीब या असहाय हो ही नहीं सकता, जो कि जमीनी हकीकत से कोसों दूर है।
आधुनिकता के दौर में 'सवर्ण-दलित' का कुत्सित खेल
यह एक बड़ी विडंबना है कि जैसे-जैसे देश तकनीकी रूप से समृद्ध हो रहा है, वैज्ञानिक सोच बढ़ रही है, ठीक उसी अनुपात में राजनीतिक स्वार्थ आम आदमी को 'दलित-सवर्ण' और 'अगड़ा-पिछड़ा' के खांचों में बांटने के कुत्सित प्रयासों में लगा है।
आजादी के बाद से वंचितों के कल्याण के नाम पर बने विशेष कानूनी प्रावधानों और व्यवस्थाओं के दुरुपयोग पर देश के कर्णधारों ने आंखें मूंद रखी हैं। जब देश की सर्वोच्च अदालतें (न्याय के मंदिर) सामाजिक समरसता और मानवीय दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर कोई संतुलित निर्णय सुनाती हैं, तो जातीय क्षत्रप राजनीतिक शह पर सड़कों पर उतरकर अराजकता फैलाने से भी नहीं चूकते।
संवैधानिक व्यवस्था की दुहाई देकर उसी संविधान के निर्णयों का विरोध करना, आज की राजनीति का सबसे बड़ा अंतर्विरोध बन चुका है। आरक्षण जैसी कल्याणकारी व्यवस्था का लाभ भी चंद रसूखदार जातियों और उनके परिवारों तक ही सीमित होकर रह गया है। यदि आज एक निष्पक्ष राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण कराया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि इस व्यवस्था का लाभ समाज के उस अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक आज भी नहीं पहुंच सका है, जिसके उत्थान के लिए यह व्यवस्था बनाई गई थी।
प्रशासनिक तंत्र की शिथिलता और समाज का उत्तरदायित्व
वर्तमान में देश के सामने विकट चुनौतियां हैं। सत्ता के शीर्ष पर भले ही चेहरे बदलते रहें, लेकिन कार्यपालिका और प्रशासनिक तंत्र के आचरण में कोई बुनियादी सुधार नजर नहीं आता। राजस्व विभाग के भ्रष्ट तंत्र की मिलीभगत से भूमाफिया फल-फूल रहे हैं।
जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक व्यवस्था का हाल यह है कि ग्राम पंचायतों से लेकर उच्च स्तर के जनप्रतिनिधियों तक, अधिकांश का मुख्य उद्देश्य जनसेवा नहीं, बल्कि येन-केन-प्रकारेण अपना और अपने परिवार का आर्थिक व भौतिक उत्थान करना रह गया है। राष्ट्र के प्रति अपने नैतिक कर्तव्यों का निर्वहन आज किसी भी प्रतिनिधि की प्राथमिकताओं में शामिल नहीं है।
प्रबुद्ध वर्ग की एकजुटता ही एकमात्र विकल्प
यह विषय अत्यंत गंभीर, व्यापक और आत्ममंथन की मांग करता है। इस वैचारिक पतन और सामाजिक विघटन को रोकने के लिए अब देश के प्रबुद्ध वर्ग—साहित्यकारों, लेखकों, अधिवक्ताओं, शिक्षकों, समाजशास्त्रियों, अर्थशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों—को आगे आना होगा। इस बौद्धिक वर्ग को एकजुट होकर राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को पहचानना होगा, ताकि वे संकीर्ण राजनीति के चक्रव्यूह में फंसे समाज को सही और राष्ट्रवादी दिशा में मार्गदर्शन प्रदान कर सकें।
