सुरक्षा मानकों की अनदेखी: आखिर कब तक अग्निकुंड बनते रहेंगे देश के होटल?
- डॉ. सुधाकर आशावादी
गर्मियों के मौसम में देश भर के पर्यटन स्थलों और होटलों में सैलानियों की भारी भीड़ उमड़ना एक सामान्य बात है। लेकिन जब यही होटल प्रशासनिक लापरवाही और लालच के कारण मौत का जाल बन जाएं, तो यह बेहद चिंताजनक हो जाता है। हाल ही में दिल्ली के मालवीय नगर में हुआ भीषण अग्निकांड इसका जीता-जागता और खौफनाक उदाहरण है, जहाँ मात्र छह कमरों की अनुमति वाले एक होटल को अवैध रूप से 33 कमरों में तब्दील कर दिया गया था। जब इस इमारत में आग लगी, तो अधिकांश विदेशी नागरिकों सहित 21 मासूम जिंदगियां जिंदा जलकर खाक हो गईं। इसके बाद ही दमकल विभाग और प्रशासन की नींद टूटी।
जांच में सामने आईं ये जानलेवा खामियां
हादसे के बाद हुई शुरुआती जांच में जो तथ्य सामने आए हैं, वे रोंगटे खड़े करने वाले हैं:
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एकमात्र निकास मार्ग: पूरी इमारत में आने-जाने और आपातकाल में निकलने के लिए केवल एक ही मुख्य दरवाजा था।
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अवैध संचालन: होटल के पास न तो संचालन की अनिवार्य अनुमति थी और न ही दमकल विभाग से कोई अनापत्ति प्रमाण पत्र (Fire NOC) लिया गया था।
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बंद खिड़कियां: आपातकालीन स्थिति में बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था और कमरों की अधिकांश खिड़कियों को पूरी तरह सील कर दिया गया था, जिससे लोगों को भागने या हवा मिलने का कोई मौका नहीं मिला।
इतिहास से सबक लेने में नाकाम प्रशासन
विडंबना यह है कि हमारा प्रशासन पिछले हादसों से कोई सीख नहीं लेता। वर्ष 2006 में मेरठ के विक्टोरिया पार्क में एक वातानुकूलित तंबू में लगे इलेक्ट्रॉनिक्स मेले के दौरान भीषण आग लगी थी, जिसमें 65 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी। उस हादसे की मुख्य वजह भी प्रवेश और निकास मार्ग का एक ही होना था।
होटल, नर्सिंग होम, सिनेमाहॉल या रेस्तरां जैसे सार्वजनिक स्थानों के संचालन में सबसे बुनियादी नियम यह होता है कि आपातकाल में लोगों की जान कैसे बचाई जाए। लेकिन देश में सुरक्षा नियमों को ताक पर रखकर लगातार लोगों की जान से खिलवाड़ किया जा रहा है।
भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ते सुरक्षा मानक
यदि आज देश के छोटे-बड़े महानगरों और शहरों में बनी बहुमंजिला इमारतों व होटलों का बारीकी से सर्वेक्षण किया जाए, तो स्थिति बेहद डरावनी मिलेगी। संकरी गलियों और छोटी जगहों पर बनी इन इमारतों में:
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न तो आग से बचाव के पर्याप्त उपकरण हैं।
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न ही भवन निर्माण के तय मानकों (Building Bye-laws) का पालन किया गया है।
सच्चाई यह है कि निर्माण की अनुमति से लेकर एनओसी (NOC) मिलने तक की पूरी व्यवस्था भ्रष्टाचार की गिरफ्त में है, जिसका खामियाजा सीधे तौर पर निर्दोष पर्यटकों को भुगतना पड़ता है।
एक अनुत्तरित सवाल!
आखिर हमारा सिस्टम किसी बड़े हादसे का इंतजार क्यों करता है? प्रशासन समय रहते होटलों में आग बुझाने के मूलभूत संसाधनों और यात्रियों की क्षमता के अनुसार निकास मार्गों की जांच क्यों नहीं करता? क्या दमकल विभाग और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की नजर में आम नागरिकों की जान की कोई कीमत नहीं रह गई है? जब तक इन जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसे अग्निकांडों को रोक पाना नामुमकिन है।


