Impact of Graha Dosh & Sade Sati on Children : क्या छोटे बच्चों पर भी पड़ता है शनि की 'साढ़े साती' और ग्रह दोषों का असर? जानिए किस उम्र से शुरू होता है ग्रहों का प्रभाव

Astrology Tips: Do Saturn's 'Sade Sati' and planetary afflictions affect young children too? Find out at what age planetary influences begin.
 
Impact of Graha Dosh & Sade Sati on Children : क्या छोटे बच्चों पर भी पड़ता है शनि की 'साढ़े साती' और ग्रह दोषों का असर? जानिए किस उम्र से शुरू होता है ग्रहों का प्रभाव

Impact of Graha Dosh & Sade Sati on Children: जब भी परिवार में कोई परेशानी आती है या कुंडली में शनि की साढ़े साती, ढैय्या अथवा राहु-केतु का दोष दिखता है, तो माता-पिता अपने छोटे बच्चों के भविष्य और स्वास्थ्य को लेकर भी चिंतित हो जाते हैं। अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या मासूम बच्चों की कुंडली के ग्रह दोष भी उन पर बुरा असर डालते हैं?

ज्योतिष शास्त्र और आध्यात्मिक गुरुओं के अनुसार, एक निश्चित आयु तक छोटे बच्चों पर उनकी स्वयं की कुंडली के ग्रह दोषों का कोई सीधा प्रभाव नहीं पड़ता है। आइए जानते हैं कि किस उम्र तक बच्चे ग्रहों के प्रभाव से मुक्त रहते हैं और इस बारे में धर्मशास्त्र व प्रसिद्ध कथावाचक क्या कहते हैं।

 किस उम्र तक बच्चों पर असर नहीं करते ग्रह दोष?

प्रसिद्ध कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर जी के अनुसार, यदि कोई ज्योतिषी आपसे कहे कि आपके 5 साल के बच्चे की कुंडली में राहु-केतु खराब हैं या उस पर साढ़े साती चल रही है, तो ऐसी बातों को लेकर बिल्कुल भी परेशान होने की आवश्यकता नहीं है।

  • 16 वर्ष से कम आयु: जब तक बच्चा 16 वर्ष से छोटा होता है, तब तक कोई भी ग्रह दोष उस पर सीधा नकारात्मक प्रभाव नहीं डालता।

  • 12 वर्ष तक कर्मों की जिम्मेदारी नहीं: 12 वर्ष की आयु तक बच्चा अपने कर्मों का स्वयं जिम्मेदार नहीं होता। इस दौरान उसके जीवन में जो भी सुख-दुख या कष्ट आते हैं, वे मुख्य रूप से उसके माता-पिता के ग्रहों और संचित कर्मों का परिणाम होते हैं।

 ज्योतिष शास्त्र का क्या है मत?

वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार:

  1. जन्म से लेकर 12 वर्ष की आयु तक बालक का अपना कोई संचित कर्म फलित नहीं होता।

  2. इस बाल्यावस्था के दौरान यदि बच्चा अक्सर बीमार रहता है या कष्ट पाता है, तो उसका संबंध माता-पिता की कुंडली के ग्रह गोचर और कर्मों से होता है।

  3. जैसे-जैसे बच्चा किशोरावस्था (12 से 16 वर्ष के बाद) में प्रवेश करता है और स्वयं निर्णय लेने योग्य बनता है, तब जाकर उसकी निजी कुंडली के ग्रहों और दशाओं का प्रभाव उसके जीवन पर दिखना शुरू होता है।

 बच्चों की सुरक्षा और सुखमय जीवन के लिए सरल उपाय

माता-पिता को बचपन से ही बच्चों में अच्छे संस्कार और धार्मिक आदतें डालनी चाहिए ताकि उनका भविष्य सुरक्षित और मंगलमय बने:

  • हनुमान चालीसा का पाठ: बच्चों को प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करने या सुनने की आदत डालें।

  • द्वादश ज्योतिर्लिंग स्मरण: बच्चों को भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों के नाम याद कराएं और उनका नित्य जाप करवाएं।

  • संस्कार और सद्कर्म: 12 वर्ष की उम्र तक बच्चों से शुभ एवं परोपकारी कार्य कराएं, क्योंकि इस दौरान उनके कर्मों का प्रत्यक्ष प्रभाव पूरे परिवार पर पड़ता है।

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