फिल्मों और सोशल मीडिया पर हिंसक कंटेंट का असर: अनंतपुर की घटना ने बच्चों की सुरक्षा और समाज की जिम्मेदारी पर उठाए सवाल
समाज में मनोरंजन के नाम पर हिंसा को किस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है और उसका बच्चों की सोच पर क्या प्रभाव पड़ सकता है, यह सवाल एक बार फिर गंभीर चर्चा का विषय बन गया है। आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में दसवीं कक्षा की छात्राओं पर 21 वर्षीय युवक हेमंत द्वारा कथित तौर पर इलेक्ट्रिक आरी (चेनसॉ) से हमला किए जाने की घटना ने स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
बताया जा रहा है कि यह हमला कक्षा के भीतर हुआ, जिससे वहां मौजूद छात्राएं बुरी तरह डर गईं। घटना के दौरान कुछ छात्राओं के भयभीत होकर अपना नियंत्रण खो देने की बात भी सामने आई है। स्कूल जैसी जगह, जहां बच्चे सुरक्षित माहौल में शिक्षा हासिल करने आते हैं, वहां इस तरह की हिंसक घटना बेहद चिंताजनक है।
इस घटना के बाद फिल्मों, वेब सीरीज और मोबाइल पर उपलब्ध हिंसात्मक कंटेंट के प्रभाव को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। 'धुरंधर' और 'एनिमल' जैसी फिल्मों का उदाहरण देते हुए यह बहस सामने आई है कि जब समाज हिंसा को मनोरंजन के रूप में स्वीकार करने लगता है, तो क्या उसका असर नई पीढ़ी की सोच और व्यवहार पर पड़ सकता है?

हालांकि, किसी व्यक्ति के हिंसक व्यवहार के लिए किसी फिल्म या कंटेंट को सीधे जिम्मेदार ठहराने से पहले तथ्यों और विशेषज्ञों की राय को समझना जरूरी है। किसी भी अपराध के पीछे कई सामाजिक, मानसिक और व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं। फिर भी बच्चों और किशोरों तक पहुंच रहे हिंसात्मक कंटेंट की उम्र के अनुसार निगरानी और जिम्मेदार प्रस्तुति बेहद जरूरी है।
आज मोबाइल और इंटरनेट के माध्यम से बच्चे बहुत कम उम्र में तरह-तरह की सामग्री देख रहे हैं। ऐसे में अभिभावकों, शिक्षकों, फिल्म निर्माताओं, डिजिटल प्लेटफॉर्म और नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि बच्चों तक पहुंचने वाले कंटेंट को लेकर गंभीरता दिखाई जाए।
बच्चों को डर और हिंसा नहीं, संवेदना और जिम्मेदारी का संदेश मिलना चाहिए। मनोरंजन की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी जुड़ी है। स्कूलों में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के साथ-साथ बच्चों को बेहतर और सकारात्मक सामग्री उपलब्ध कराना भी समय की मांग है।
