बदलते वैश्विक परिदृश्य में विदेशी भाषाओं का महत्व

Importance of foreign languages ​​in the changing global scenario
 
Importance of foreign languages ​​in the changing global scenario
(विवेक रंजन श्रीवास्तव – विनायक फीचर्स)
भाषा मानव सभ्यता के लिए उतनी ही आवश्यक है जितनी श्वास जीवन के लिए। यह केवल संवाद का साधन नहीं बल्कि संस्कृति, ज्ञान और अवसरों की वाहक भी है। आज की वैश्विक दुनिया में जब राष्ट्र सीमाओं से परे व्यापार, तकनीक और संस्कृति में एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं, तब विदेशी भाषाओं का ज्ञान किसी भी समाज की प्रगति का मूल आधार बन गया है।

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हिंदी भाषी समाज के लिए यह अवसर और चुनौती दोनों है कि वे अपनी मातृभाषा की गरिमा बनाए रखते हुए अन्य वैश्विक भाषाओं को सीखें। अंग्रेजी अब भी दुनिया की सबसे प्रभावशाली भाषा है, लेकिन केवल उसी पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था अब बहुध्रुवीय हो चुकी है, इसलिए चीनी, जापानी, जर्मन, रूसी और कोरियन जैसी भाषाओं का महत्व लगातार बढ़ रहा है।

वैश्विक भाषाओं की स्थिति

अंग्रेजी: लगभग 150 करोड़ लोग बोलते हैं। यह शिक्षा, विज्ञान, तकनीकी और व्यापार की प्रमुख भाषा है।
मंदारिन (चीनी): करीब 110 करोड़ लोगों की भाषा, जो चीन की आर्थिक शक्ति के कारण व्यापार और विनिर्माण में अनिवार्य बन चुकी है।
जापानी: 12 करोड़ लोग बोलते हैं। तकनीकी, रोबोटिक्स और इलेक्ट्रॉनिक्स में जापान की श्रेष्ठता इसे विशेष महत्व देती है।
जर्मन: लगभग 9.5 करोड़ वक्ता। जर्मनी की इंजीनियरिंग, ऑटोमोबाइल और उच्च शिक्षा प्रणाली के कारण इसकी मांग लगातार बनी हुई है।
रूसी: करीब 25 करोड़ लोगों की भाषा और संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाओं में शामिल। ऊर्जा, अंतरिक्ष और रक्षा में इसका महत्व सदैव प्रासंगिक है।
कोरियन: लगभग 8 करोड़ लोग बोलते हैं। दक्षिण कोरिया की तकनीक और "के-पॉप व के-ड्रामा" के प्रभाव से इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है।

हिंदी का वैश्विक परिप्रेक्ष्य

हिंदी स्वयं दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी भाषा है, जिसे 60 करोड़ से अधिक लोग मातृभाषा के रूप में बोलते हैं। लेकिन केवल हिंदी जानना आज पर्याप्त नहीं है। वैश्विक नौकरी, व्यापार और तकनीकी क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा के लिए अंग्रेजी के साथ अन्य प्रमुख भाषाओं का ज्ञान भी जरूरी है।
शिक्षा और प्रशिक्षण के अवसर
दुनिया भर के विश्वविद्यालय विदेशी भाषाओं को औपचारिक रूप से पढ़ा रहे हैं।
जापान फाउंडेशन, गोएथे इंस्टीट्यूट, कन्फ्यूशियस इंस्टिट्यूट और रशियन कल्चरल सेंटर जैसे संगठन विदेशी छात्रों को प्रशिक्षित करते हैं।
भारत में जेएनयू, बीएचयू, दिल्ली विश्वविद्यालय और पुणे विश्वविद्यालय सहित कई संस्थानों में विदेशी भाषाओं के विभाग सक्रिय हैं।
ऑनलाइन प्लेटफार्म जैसे कोर्सेरा, डुओलिंगो और एडएक्स ने इन भाषाओं को सीखना और आसान बना दिया है।

आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से महत्व

भारत का व्यापार चीन, जापान, कोरिया, जर्मनी और रूस के साथ तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में संबंधित भाषाओं का ज्ञान सीधे व्यापारिक और तकनीकी अवसर प्रदान करता है। कई बार किसी व्यापार वार्ता में सामने वाले की भाषा का एक वाक्य भी गहरा विश्वास पैदा कर देता है।
तकनीकी क्षेत्रों में भी यह बेहद महत्वपूर्ण है। जापान और कोरिया एआई और रोबोटिक्स में अग्रणी हैं, जर्मनी मशीन निर्माण में, चीन विनिर्माण में और रूस ऊर्जा व अंतरिक्ष अनुसंधान में। इनसे जुड़ने के लिए संबंधित भाषाओं की समझ रणनीतिक निवेश साबित होती है।

संस्कृति और कूटनीति का सेतु

भाषा केवल रोजगार का साधन नहीं बल्कि सांस्कृतिक जुड़ाव का माध्यम भी है। कोरियन भाषा सीखने वाले युवा के-पॉप संस्कृति से जुड़ रहे हैं, जापानी भाषा जानने वाले छात्र अनुशासन और सौंदर्यबोध को आत्मसात कर रहे हैं, जबकि जर्मन सीखने वाले विद्यार्थी विज्ञान और दर्शन के साथ-साथ साहित्य की धरोहर तक पहुंच बना रहे हैं।

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