दुःख की घड़ी में

in times of sorrow
 
दुःख की घड़ी में

(सुधाकर आशावादी – विनायक फीचर्स)

मास्टर जी के निधन पर स्थिति बड़ी विचित्र थी—अर्थी को कंधा देने तक के लिए चार लोग भी पूरे नहीं हो पाए। कहने को उनका परिवार बड़ा था, घर-बार भी सम्पन्न, पर अंतिम यात्रा में न परिवार आगे आया, न पड़ोसी। बेटे ने किसी तरह अंतिम संस्कार की औपचारिकता निभाई।

करीब बीस वर्षों से मास्टर जी अपनी पेंशन पर शांतिपूर्वक जीवन बिता रहे थे। पुरानी पहचान वाले कुछ लोग मृत्यु-समाचार पाकर पहुँचे भी, पर औपचारिक संवेदना प्रकट कर चुपचाप लौट गए। उनसे परिचय था, पर उनके परिवार से कोई नाता कभी जुड़ा ही नहीं।

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पुत्र ने धार्मिक रीति-रिवाज़ पूरे मन से निभाए—गायत्री मंत्र का पाठ, गरुड़ पुराण का आयोजन और तेरहवीं पर भव्य भोज। शहर के प्रमुख अखबारों में सूचना छपवाई, अनेक व्यंजनों की व्यवस्था करवाई। उसे आशा थी कि बिरादरी, समाज के सम्मानित लोग और जनप्रतिनिधि अवश्य आएँगे तथा मास्टर जी की सेवाओं को श्रद्धांजलि देंगे।

तेरहवीं के दिन बड़ा मंडप सजा था। फूलों के बीच मास्टर जी का चित्र रखा था। प्रवचन चल रहे थे—जीवन की क्षणभंगुरता, जन्म-मृत्यु के चक्र पर चर्चा हो रही थी। परंतु शोक व्यक्त करने वालों की संख्या अपेक्षा से बहुत कम थी। जो लोग उपस्थित थे, वे भी परिजनों से अधिक अपने परिचितों से बातचीत में व्यस्त नजर आए। औपचारिकता निभाई जा रही थी, भाव से अधिक दिखावे में।
मास्टर जी के साथ वर्षों तक पढ़ाने वाले एक वृद्ध शिक्षक ने धीरे से कहा—
“मास्टर जी ने अपने को हमेशा समाज से अलग रखा। कभी किसी के सुख-दुःख में शामिल नहीं हुए। आज यही कारण है कि उनकी विदाई में भीड़ नहीं जुट पाई। अगर वे लोगों के साथ खड़े होते, तो आज लोग उनके साथ खड़े होते।”

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